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शिक्षक से 'महामहिम' तक का सफ़र, पहली महिला आदिवासी और सबसे युवा राष्ट्रपति बनीं द्रौपदी मुर्मू

Draupadi Murmu Oath Ceremony: नवनिर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की शपथ ली. शपथ समारोह सुबह 10:15 बजे संसद के सेंट्रल हॉल में हुआ. सीजेआई एन. वी. रमणा ने उन्हें राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई. इसके बाद उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई.

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आज देश की 15वीं राष्ट्रपति के तौर पर लेंगी शपथ (पीटीआई)
आज देश की 15वीं राष्ट्रपति के तौर पर लेंगी शपथ (पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मयूरगंज के बैदपोसी गांव में 20 जून 1958 को जन्मीं
  • भुवनेश्वर के रमादेवी विमेंस कॉलेज से ग्रेजुएशन किया

Draupadi Murmu Oath Ceremony: द्रौपदी मुर्मू ने 20 जून को अपना 64वां जन्मदिन मनाया था. उस दिन तक उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि आने वाला कल उन्हें देश का अगला राष्ट्रपति बनने का तोहफा देने आ रहा है. 21 जून को बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उन्हें एनडीए का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा कर दी थी. वह चुनाव जीतीं और आज देश के 15वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली. ओडिशा के मयूरभंज के एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने राष्ट्रपति होने तक का सफर तय किया है.

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द्रौपदी मुर्मू आजादी के बाद पैदा होने वाली पहली और सबसे कम उम्र की राष्ट्रपति होंगी. द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को हुआ था. 25 जुलाई को उनकी उम्र 64 साल 1 महीना और 8 दिन होगी. इससे पहले यह रिकॉर्ड नीलम संजीव रेड्डी के नाम था. जब वह राष्ट्रपति बने तो उनकी उम्र 64 साल दो महीने और 6 दिन थी. मुर्मू राष्ट्रपति बनने वाली दूसरी महिला भी हैं.

द्रौपदी मुर्मू ने 1994 से 1997 के बीच रायरंगपुर के श्री अरबिंदो इंटेग्रेटेल एजुकेशन एंड रिसर्च में एक शिक्षिका के रूप में काम किया. 1997 में उन्होंने अधिसूचित क्षेत्र परिषद में एक निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. एक शिक्षिका के रूप में उन्होंने प्राथमिक विद्यालय में अलग-अलग विषयों को पढ़ाया.

पति-बेटों के निधन के बाद घर को स्कूल बना दिया

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द्रौपदी मुर्मू का जन्म मयूरभंज जिले के बैदापोसी गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम बिरंची नारायण टुडू है. वह आदिवासी संथाल परिवार से ताल्लुक रखती हैं. वह कुसुमी तहसील के छोटे से गांव उपरबेड़ा में स्थित एक छोटे से स्कूल से पढ़ी हैं. भुवनेश्वर के रामादेवी महिला महाविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की.

द्रौपदी मुर्मू का विवाह श्याम चरण मुर्मू से हुआ था. दंपति के दो बेटे और एक बेटी हुई, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उन्होंने पति और अपने दोनों बेटों को खो दिया. द्रौपदी मुर्म के पति और 2 बेटों का निधन हो जाने के बाद उन्होंने अपने घर को एक बोर्डिंग स्कूल में बदल दिया. जहां आज भी स्कूल संचालित किया जाता है.

टीचर के बाद सरकारी विभाग में क्लर्क बन गईं

मुर्मू ने एक टीचर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और फिर उन्होंने ओडिशा के सिंचाई विभाग में एक कनिष्ठ सहायक यानी क्लर्क के पद पर भी नौकरी की.

मुर्मू ने नौकरी से मिलने वाले वेतन से घर खर्च चलाया और बेटी इति मुर्मू को पढ़ाया-लिखाया. बेटी ने भी कॉलेज की पढ़ाई के बाद एक बैंक में नौकरी हासिल कर ली. इति मुर्मू इन दिनों रांची में रहती हैं और उनकी शादी झारखंड के गणेश से हो चुकी है. दोनों की एक बेटी आद्याश्री है.

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1997 में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की

द्रौपदी मुर्मू ने साल 1997 में रायरंगपुर नगर पंचायत के पार्षद चुनाव में जीत दर्ज कर अपने राजनीतिक जीवन का आगाज किया था. उन्होंने भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया. साथ ही वह भाजपा की आदिवासी मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रहीं.

द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के मयूरभंज जिले की रायरंगपुर सीट से 2000 और 2009 में बीजेपी के टिकट पर दो बार विधायक बनीं. ओडिशा में नवीन पटनायक के बीजू जनता दल और भाजपा गठबंधन की सरकार में द्रौपदी मुर्मू को 2000 और 2004 के बीच वाणिज्य, परिवहन और बाद में मत्स्य और पशु संसाधन विभाग में मंत्री बनाया गया.  मुर्मू ने 2014 का विधानसभा चुनाव रायरंगपुर से लड़ा था, लेकिन वह बीजद उम्मीदवार से हार गई थी. 

झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं

द्रौपदी मुर्मू मई 2015 में झारखंड की 9वीं राज्यपाल बनाई गई थीं. उन्होंने सैयद अहमद की जगह ली थी. झारखंड हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस चीफ जस्टिस वीरेंद्र सिंह ने द्रौपदी मुर्मू को राज्यपाल पर की शपथ दिलाई थी.

झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनने का खिताब भी द्रौपदी मुर्मू के नाम रहा. साथ ही वह किसी भी भारतीय राज्य की राज्यपाल बनने वाली पहली आदिवासी हैं. वह झारखंड में सबसे लंबे वक्त (छह साल से कुछ अधिक वक्त) तक राज्यपाल रहीं.

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झारखंड के राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद द्रौपदी मुर्मू अपने पैतृक घर रायरंगपुर लौट गई थीं. यहां उन्होंने अपना ध्यान और सामाजिक कार्यों में लगाया.

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