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किसान आंदोलन से हुए नुकसान की भरपाई के लिए बीजेपी ने बनाई ये प्लानिंग, पार्टी दूर करेगी भ्रम

2022 में यूपी विधानसभा चुनाव होना है. हरियाणा में भी गठबंधन की सरकार है और दुष्यंत चौटाला पर भी काफी दबाव है. राकेश टिकैत के आंसुओं के बाद जिस ढंग से जाट समुदाय लामबंद हो रहा है, उसके बाद से बीजेपी भी अपनी काउंटर रणनीति बनाने में लगी है.

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नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन जारी है (फाइल फोटो)
नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों का प्रदर्शन जारी है (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • राकेश टिकैत के आंसुओं के बाद से जाट समुदाय लामबंद हो रहा
  • नफा-नुकसान का अनुमान लगाकर पार्टी आगे बढ़ेगी

पंजाब, हरियाणा, यूपी के जाट बहुल इलाकों में किसान आंदोलन के असर का आकलन करने में बीजेपी पिछले कई दिनों से लगी हुई थी कि कहीं पार्टी का डैमेज ना हो जाए. इसकी भरपाई के लिए पार्टी किसान नेताओं को किसानों के बीच भेजने की रणनीति में लगी है. 

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पार्टी ने किसान नेताओं के साथ बैठक कर तीन कृषि कानूनों के फायदे समझाने और उनकी बात सुनने के लिए खापों में, पंचायतों में और गांव-गांव भेजने के लिए अपनी पार्टी के किसान नेताओं को जिम्मा सौंपा है, ताकि अगर कहीं किसान आंदोलन से जाट बहुल इलाकों में कहीं डैमेज हुआ हो तो उसकी भरपाई जल्दी की जा सके, इसलिए पिछले 2 दिन से पार्टी में बैठकों का दौर जारी है और जल्दी ही बीजेपी के किसान नेता किसानों और जनता के बीच जाकर कृषि कानूनों के फायदे बताएंगे और  उनका भ्रम दूर करेंगे. 

लेकिन इसी बीच पंजाब नगर निकायों के चुनाव नतीजों ने बीजेपी को अंदर से परेशानी में डाल दिया है. ऐसा नहीं है कि झटका सिर्फ बीजेपी को लगा है. अकाली दल और आम आदमी पार्टी भी तकरीबन साफ है. ये तो पंजाब की बात है, लेकिन असली सिरदर्द तो बीजेपी को यूपी और हरियाणा से है. करीब 40 लोकसभा सीटों पर जाट वोट महत्वपूर्ण है और किसान आंदोलन में सिखों और जाटों के आक्रामक रवैये का असर तो पंजाब में दिख गया, लेकिन यूपी में दिखना अभी बाकी है. 

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2022 में यूपी विधानसभा चुनाव होना है. हरियाणा में भी गठबंधन की सरकार है और दुष्यंत चौटाला पर भी काफी दबाव है. राकेश टिकैत के आंसुओं के बाद जिस ढंग से जाट समुदाय लामबंद हो रहा है, उसके बाद से बीजेपी भी अपनी काउंटर रणनीति बनाने में लगी है.

गृह मंत्री अमित शाह ने की बैठक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मंगलवार को पार्टी के यूपी, हरियाणा और राजस्थान के जाट नेताओं के साथ बैठक की. माना जा रहा है कि जमीनी स्तर पर आंदोलन के असर का फीडबैक लेने के लिए ये बैठक हुई. गौरतलब है कि जाट बेल्ट के बीजेपी नेताओं और मंत्रियों ने पिछले तीन महीने से अपने चुनाव क्षेत्र में  सार्वजनिक कार्यक्रम करने में परेशानी आ रही है. 

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमान और जाटों में गहरी खाई पैदा हुई थी जिसकी वजह से अजीत सिंह की आरएलडी को 2 लोकसभा सीटों पर जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा और जाट भारी संख्या में बीजेपी के साथ लामबंद हो गए.

मुस्लिम और जाट नेता एक साथ मंच पर आए

किसान आंदोलन और विशेषकर 28 जनवरी को राकेश टिकैत के आंसुओं ने वो दूरी मिटाने का काम किया. पहली बार सात सालों के बाद शामली की किसान महापंचायत में मुस्लिम और जाट नेता एक साथ मंच पर आए. दूसरी बात राकेश टिकैत और अजीत सिंह के बीच भी जाट बंटे हुए थे. 29 जनवरी को गाजीपुर बार्डर पहुंचकर जयंत चौधरी ने वो भी दूरी पाट दी. वैसे भी जाट कभी बीजेपी का परंपरागत वोट नहीं रहा था, लेकिन नरेंद्र मोदी के जादू और मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट बीजेपी के साथ हो लिए.

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केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने की बैठक

अब पंजाब के नगर निकायों के नतीजों से पंजाब की हवा तो पता चली है, लेकिन जाटों का रुख पंचायत चुनावों में साफ होगा. मार्च और अप्रैल में यूपी में पंचायत चुनाव होने हैं. बीजेपी ने इन चुनावों को विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मानकर बहुत पहले से तैयारी की थी, लेकिन किसान आंदोलन की वजह से बीजेपी को अब नई तरीके से रणनीति बनानी पड़ रही है. आंदोलन का नफा-नुकसान का अनुमान लगाकर पार्टी आगे बढ़ेगी. 

इधर, केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के यहां किसान नेताओं की बुधवार को बैठक हुई. भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय किसान मोर्चा के अध्यक्ष  और सांसद राजकुमार चाहर बोले कि जो विपक्ष ने किसानों के बीच भ्रम का जाल फैलाने की कोशिश की है. उसको दूर किया जाएगा. 

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