पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नेता शुभेंदु अधिकारी, पार्टी के अन्य कई बागी विधायकों के साथ अमित शाह की उपस्थिति में बीजेपी में शामिल हुए तो सोशल मीडिया पर मजाक उड़ना शुरू हो गया. लोग कुछ इस तरह तंज कस रहे थे कि “अफवाहों पर ध्यान न दें. दीदी अब भी टीएमसी में हैं.”
बंगाल में दीदी के नाम से मशहूर ममता बनर्जी के लिए ये बहुत बड़ा झटका है क्योंकि वे अपने पूरे राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ी बगावत झेल रही हैं. तृणमूल के मंत्रियों, विधायकों, सांसदों और जमीनी कार्यकर्ताओं के एक धड़े में उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लेकर नाराजगी है. इन नेताओं का आरोप है कि ये दोनों पार्टी को मनमाने तरीके से चला रहे हैं.
हालांकि, भगवा खेमे के पास ज्यादा खुश होने के लिए कुछ नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल तृणमूल नेताओं ने पार्टी छोड़ी है और बीजेपी में गए हैं. इनमें से कई नेता 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले पार्टी छोड़कर बीजेपी में गए थे. मुकुल रॉय, अर्जुन सिंह, सब्यसाची दत्ता और निसिथ प्रमाणिक कुछ महत्वपूर्ण नाम हैं जो काफी पहले बीजेपी में शामिल हो चुके हैं.
तृणमूल में शुभेंदु की अच्छी साख थी. उनकी बीजेपी में एंट्री के बाद भाजपा अब आक्रामक मुद्रा में हैं और ऐसा दिखाना चाह रही है कि ममता का खेल अब खत्म हो गया. लेकिन दीदी ऐसी लड़ाका हैं जो बिना लड़े कभी हथियार नहीं डालतीं. जमीनी नेता होने के नाते वे अपने कार्यकर्ताओं से फीडबैक ले रही हैं और अपनी पार्टी की चिंताओं से बखूबी वाकिफ हैं. तो बंगाल में भाजपा का मुकाबला करने के लिए ममता की वास्तव में क्या रणनीति है?
बागियों को दरकिनार करना
ममता की पहली रणनीति है कि शुभेंदु और अन्य बागी नेताओं को उनके गढ़ में ही घेरा जाए और उनके ग्रामीण वोट-बैंक में सेंध लगाई जाए. ममता को बहुत पहले से पता था कि शुभेंदु अधिकारी पार्टी छोड़ेंगे. डेढ़ महीने पहले उन्होंने अपने पार्टी के सहयोगियों से कहा था कि शुभेंदु बीजेपी में जा रहे हैं. यही वजह है कि ममता ने शुभेंदु से खुद कभी बात नहीं की और अपने सिपहसालार सौगत रॉय और पार्थ चटर्जी को उनसे बातचीत करने के लिए कहा. यहां तक कि जब शुभेंदु कोरोना संक्रमित थे, तब ममता ने उनके पिता शिशिर अधिकारी को फोन किया और उनके बारे में पूछताछ की, लेकिन उनसे बात नहीं की.
तृणमूल की धारणा है कि शुभेंदु सीबीआई द्वारा चिट फंड केस की जांच से डर गए है और इसलिए पाला बदल रहे हैं. साथ ही, शुभेंदु ने सौगत राय से ये कबूल किया था कि उन्हें ममता से नहीं बल्कि अभिषेक बनर्जी और प्रशांत किशोर से समस्या है. अब ममता ने अपने कई नेताओं को पूर्वी मिदनापुर के 16 विधानसभा क्षेत्रों में लगाया है, जो कि शुभेंदु अधिकारी का गढ़ है. ये नेता लंबे समय से पूर्वी मिदनापुर में अधिकारी परिवार के खिलाफ मुखर रहे हैं.
शुभेंदु के पास तीन मंत्रालय थे. इसके अलावा वे न सिर्फ हल्दिया बंदरगाह श्रमिक संगठन, बल्कि वहां की गतिविधियों को भी नियंत्रित करते थे. वे पूर्वी मिदनापुर में कई सहकारी बैंकों के अध्यक्ष भी थे. जाहिर है कि उनके तमाम विरोधी हैं और अब ममता उन्हें प्रोत्साहित कर रही हैं.
बागियों के गढ़ पर धावा
ममता जल्द से जल्द शुभेंदु को तृणमूल से हटाने की इच्छुक थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि पार्टी का सदस्य रहकर शुभेंदु ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं. चुनाव होने में अभी कई महीनों का वक्त है, ऐसे में ममता को उनके खिलाफ प्रचार करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा.
मुख्यमंत्री की योजना है कि पूर्वी मिदनापुर पर खास ध्यान दिया जाए. जिले में 350 ब्लॉक और 70 डिवीजन हैं और ममता इन सभी डिवीजनों में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करेंगी. वह सीधे मतदाताओं तक पहुंचेंगी और उन्हें बताएंगी कि शुभेंदु ने कैसे उनकी पीठ में ‘छुरा घोंपा’. एक तरफ वे जनता के बीच पीड़ित बनकर प्रचार करेंगी और दूसरी तरफ अपनी विकास योजनाओं से ग्रामीण जनता को लाभ पहुंचाने के बारे में प्रचार करेंगी.
तृणमूल प्रचार करेगी कि शुभेंदु ने अपनी विचारधारा के साथ समझौता करते हुए "मुस्लिम विरोधी" बीजेपी में शामिल हो गए. पूर्वी मिदनापुर, पश्चिम मिदनापुर और झारग्राम जिलों की 35 विधानसभा सीटों पर अल्पसंख्यक आबादी की अच्छी संख्या है और तृणमूल को लगता है कि शुभेंदु को अब उनका वोट नहीं मिलेगा. चाहे जंगल महल में शांति स्थापित करने की बात हो या नंदीग्राम में अधिग्रहण विरोधी आंदोलन, तृणमूल कांग्रेस को अल्पसंख्यकों का व्यापक समर्थन रहा है.
नये चेहरों पर दांव
ममता सभी मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं देना चाहती हैं. प्रशांत किशोर के अनुसार, कई विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों में सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रहे हैं और तृणमूल सुप्रीमो कई सीटों पर नये चेहरों की तलाश में हैं. पार्टी सूत्रों के अनुसार, जिन विधायकों को ये पता चला है कि उन्हें इस बार टिकट नहीं मिलने वाला है, अब वे बीजेपी में जाना चाहते हैं. हालांकि, ममता का मानना है कि इससे पार्टी में नए चेहरे उभर कर सामने आएंगे.
बंगाली बनाम बाहरी
ममता अगले महीने से चुनाव प्रचार शुरू करेंगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जनवरी में बंगाल यात्रा पर जाने वाले हैं, जिसके बाद बीजेपी इसे 'मोदी बनाम ममता' की लड़ाई बना देगी. हालांकि, ममता इसे 'मोदी बनाम ममता' की लड़ाई नहीं बनाना चाहतीं. ममता और उनकी पार्टी के अन्य नेता बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए सवाल करेंगे. तृणमूल ये कोशिश करेगी कि ममता के सामने बीजेपी में कौन है? इस संदर्भ में बंगाली अस्मिता का सवाल भी उठेगा.
कोलकाता में बिहारियों, मारवाड़ियों, गुजरातियों और जैनियों की बड़ी आबादी रहती है और बीजेपी कथित रूप से इन समुदायों के बीच दबा छुपा अभियान चला रही है कि तृणमूल एक 'बंगाली पार्टी' है. इसके विरुद्ध ममता ये प्रचार करेंगी कि उनकी पार्टी गैर-बंगालियों के खिलाफ नहीं है, लेकिन 'बाहरी' का मुद्दा अलग है.
तृणमूल ये प्रचार करेगी कि कैलाश विजयवर्गीय की तरह के ‘बाहरी’ लोग बंगालियों की पहचान को नष्ट कर देंगे, रवींद्रनाथ टैगोर के राष्ट्रगान को बदल देंगे, बंगाल की सहिष्णुता और समावेशी संस्कृति नष्ट कर कर देंगे और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करेंगे. बीजेपी लगातार तृणमूल पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगा रही है तो ममता रामकृष्ण परमहंस के आदर्शों के साथ जनता के बीच पहुंच रही हैं, जिनके हिंदुत्व के विचार में सबके लिए जगह थी.
सोशल मीडिया कैंपेन
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय बंगाल में चुनावी तैयारियों की देखरेख के लिए नियुक्त केंद्रीय टीम का हिस्सा हैं. मालवीय ममता सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया अभियान चलाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. इसका मुकाबला करने के लिए तृणमूल कांग्रेस रैलियों और बैठकों के अलावा मौजूदा सरकार के विकास कार्यों को सोशल मीडिया पर भी प्रचारित करेगी. तृणमूल ने कई लोकप्रिय फिल्मी सितारों और गायकों को भी सड़कों पर उतारने का फैसला किया है जो यह बताएंगे कि कैसे बंगाल की संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है.
(ये लेख जयंत घोषाल ने लिखा है जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मीडिया एडवाइजर हैं.)