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जाट पॉलिटिक्स, हुड्डा का कद... हरियाणा कांग्रेस से किरण चौधरी की विदाई के क्या कारण हैं?

किरण चौधरी और उनकी बेटी श्रुति चौधरी ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया है. किरण चौधरी की कांग्रेस से विदाई के पीछे वजह लोकसभा चुनाव में बेटी श्रुति को टिकट नहीं मिलने से नाराजगी को बताया जा रहा है. लेकिन क्या बात बस इतनी सी ही है?

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भूपेंद्र सिंह हुड्डा और किरण चौधरी (फाइल फोटो)
भूपेंद्र सिंह हुड्डा और किरण चौधरी (फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव नतीजे आए अभी 15 दिन ही हुए हैं कि हरियाणा में कांग्रेस को बड़ा झटका लग गया है. कांग्रेस विधायक किरण चौधरी ने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है और अपनी बेटी श्रुति चौधरी के साथ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गई हैं. किरण चौधरी हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसी लाल की पुत्रवधु हैं. किरण की बेटी श्रुति पूर्व सांसद हैं और पार्टी छोड़ने तक हरियाणा कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष भी थीं. किरण चौधरी, कुमारी शैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला के साथ एसआरके गुट का भी हिस्सा थीं जो हरियाणा में कांग्रेस का पर्याय बन चुके भूपेंद्र सिंह हुड्डा को चुनौती देता आया है.

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कांग्रेस हरियाणा की सत्ता से पिछले दो चुनाव से दूर है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस हरियाणा की एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. पार्टी इस बार सूबे की 10 में से पांच सीटें जीतने में सफल रही. लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन के बाद 10 साल बाद सूबे की सत्ता में वापसी की आस लगाए कांग्रेस के लिए किरण का पार्टी छोड़ जाना बड़ा झटका माना जा रहा है. इससे अक्टूबर-नवंबर महीने तक होने वाले हरियाणा चुनाव में कांग्रेस के अभियान पर कितना असर पड़ेगा, बात इसे लेकर भी हो रही है.

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई ने कहा कि कांग्रेस में पहले जो भगदड़ की स्थिति देखी गई है, उसकी एक वजह ये भी थी कि नेताओं में इसे लेकर विश्वास का अभाव था कि वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत सकते हैं. हालिया आम चुनाव के बाद तस्वीर बदली है, खासकर हरियाणा में. मुझे नहीं लगता कि किरण चौधरी के जाने से कांग्रेस को ज्यादा नुकसान हो सकता है. फिर भी, अब कांग्रेस नेतृत्व को चाहिए कि वह कुमारी शैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला से संवाद करे, यह भरोसा दिलाए कि उन्हें हाशिए पर नहीं जाने दिया जाएगा. साथ ही नेतृत्व को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सूबे में पार्टी के सबसे बड़े चेहरे भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी हताश और निराश ना हों.

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किरण ने क्यों छोड़ी कांग्रेस?

किरण के कांग्रेस छोड़ने की वजह को लेकर बात करने से पहले हरियाणा कांग्रेस की चर्चा जरूरी है. हरियाणा में दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा कांग्रेस का पर्याय बन चुके हैं तो वहीं एक दूसरा गुट है कुमारी शैलजा और रणदीप सिंह सुरजेवाला का जिसमें किरण चौधरी भी थीं और इसे एसआरके गुट भी कहा जाता था. लोकसभा चुनाव में किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी भी कांग्रेस से टिकट की दावेदार थीं.

श्रुति महेंद्रगढ़-भिवानी लोकसभा सीट से 2009 में सांसद रही हैं. 2014 और 2019 में भी वह इस सीट से कांग्रेस की उम्मीदवार थीं लेकिन दोनों बार चुनाव हार गई थीं. कांग्रेस ने इस बार श्रुति की जगह विधायक राव दान सिंह को मैदान में उतारा था. बेटी को टिकट नहीं मिलने से किरण नाराज थीं ही, हुड्डा के करीबी को उम्मीदवार बनाए जाने से इसे और हवा मिल गई. कांग्रेस अध्यक्ष को भेजे अपने इस्तीफे में किरण ने कहा भी है- हरियाणा में पार्टी व्यक्तिगत जागीर बन गई है जिसमें हमारे जैसी ईमानदार आवाजों के लिए कोई जगह नहीं बची है.

हुड्डा का कद है वजह?

किरण चौधरी 40 साल से कांग्रेस में थीं. हुड्डा को दबदबे के दौर में भी कुमारी शैलजा और रणदीप सिंह हुड्डा के साथ चुनौती देती आईं किरण के पार्टी छोड़ने की वजह बस बेटी को टिकट नहीं मिलने की वजह से पनपी नाराजगी ही है? बात इसे लेकर भी हो रही है. कहा जा रहा है कि हरियाणा में कांग्रेस नेतृत्व जाट-दलित को साथ लाकर वोटों का नया समीकरण गढ़ने की रणनीति पर काम कर रहा है. पार्टी के पास हुड्डा जैसा बड़ा  जाट चेहरा पहले से ही है, मल्लिकार्जुन खड़गे ने खुद कुमारी शैलजा को यह भरोसा दिलाया है कि नेतृत्व उनके साथ अन्याय नहीं होने देगा. किरण भी जाट समाज से आती हैं, ऐसे में जाट पॉलिटिक्स की पिच पर हुड्डा के सामने पार्टी में उनको उतनी तरजीह मिलती नजर नहीं आई.

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इसके उलट, बीजेपी जाट पॉलिटिक्स की पिच पर हरियाणा में उतनी मजबूत नहीं है. लोकसभा चुनाव में पांच सीटों पर बीजेपी की हार के पीछे भी जाट और किसान की नाराजगी के चर्चे हैं. जननायक जनता पार्टी के साथ गठबंधन भी टूट चुका है, ऐसे में बीजेपी को एक बड़े जाट चेहरे की जरूरत थी और किरण चौधरी को तरजीह की. रशीद किदवई ने कहा कि जब कोई पार्टी किसी राज्य में लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहती है और फिर जब उसकी सत्ता में वापसी की उम्मीद जगती है, क्षत्रपों की यह महत्वाकांक्षा होती है कि पार्टी उन्हें प्रोजेक्ट करे. ये स्वाभाविक है. अब यह कांग्रेस नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह इस तरह की चीजों को कैसे मैनेज करता है.

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एक पहलू ये भी है कि लोकसभा चुनाव में टिकट वितरण पर हुड्डा की छाप साफ नजर आई. चुनाव नतीजे आने के बाद हुड्डा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिसमें कुमारी शैलजा को छोड़कर हरियाणा से जीते कांग्रेस के चारो सांसद मौजूद थे. हुड्डा की इस पीसी को यह संदेश देने की कोशिश के तौर पर देखा गया कि हरियाणा में कांग्रेस का मतलब हुड्डा ही हैं. कुमारी शैलजा ने पांच सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों की हार को लेकर नाम लिए बिना हुड्डा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा भी था- कांग्रेस मैं और मेरा की राजनीति से हारी.

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