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MAMATA BANERJEE एक देश एक चुनाव से सहमत नहीं, चिट्ठी लिखकर दर्ज कराया विरोध

केंद्र की मोदी सरकार 'वन नेशन-वन इलेक्शन' को लेकर कमेटी गठित कर चुकी है. इस 8 सदस्यीय कमेटी की अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कर रहे हैं. लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस चीफ ममता बनर्जी ने आज इसे लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कर दी है.

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टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी (File Photo)
टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी (File Photo)

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस चीफ ममता बनर्जी एक देश एक चुनाव (one nation one election) से सहमत नहीं हैं. उन्होंने विधि सचिव (Law Secretary) को चिट्ठी लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है. अपने पत्र में ममता ने लिखा,'मौजूदा परिस्थितियों में मुझे खेद है कि आपके द्वारा फ्रेम किए गए एक देश एक चुनाव के कंसेप्ट को लेकर मैं सहमत नहीं हूं. हम आपके प्रस्ताव और सूत्रीकरण (formulation) से भी सहमत नहीं हैं. आपके पत्र से वन नेशन वन इलेक्शन का कंसेप्ट क्लियर नहीं हो रहा है.

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दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार 'वन नेशन-वन इलेक्शन' को लेकर कमेटी गठित कर चुकी है. इस 8 सदस्यीय कमेटी की अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद कर रहे हैं. जबकि कमेटी के सदस्य के रूप में अमित शाह, अधीर रंजन चौधरी, गुलाम नबी आजाद, एनके सिंह, सुभाष कश्यप, हरीश साल्वे और संजय कोठारी को नियुक्त किया गया है. हालांकि, लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर कमेटी का हिस्सा बनने से इनकार कर चुके हैं.

अलग चुनाव से संसाधनों पर बोझ

बता दें कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस कमेटी के अध्यक्ष हैं. कोविंद राष्ट्रपति के रूप में समकालिक चुनावों के समर्थक रहे हैं. 29 जनवरी 2018 को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कोविंद ने कहा था कि देश में शासन की स्थिति से जूझ रहे नागरिक भारत के किसी न किसी हिस्से में बार-बार होने वाले चुनावों को लेकर चिंतित हैं, जो अर्थव्यवस्था और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं. बार-बार चुनाव न केवल मानव संसाधनों पर भारी बोझ डालते हैं, बल्कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है. इसलिए, एक साथ चुनाव के विषय पर निरंतर बहस की आवश्यकता है और सभी राजनीतिक दलों को इसमें शामिल होने की जरूरत है.

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1967 तक होते थे एक साथ चुनाव

बता दें कि आजाद भारत में 'एक देश-एक चुनाव' की बात बहुत पहले से कही जाती रही है. पहले की सरकारों में भी इस पर बात होती रही है. हालांकि कुछ रिपोर्ट आदि से आगे कभी मामला नहीं बढ़ा. थोड़ा और पीछे चलें तो यह भी एक सत्य-तथ्य है कि, भारत में, 1967 तक एक साथ चुनाव कराने का चलन था. लेकिन 1968 और 1969 में कुछ विधान सभाओं और दिसंबर 1970 में लोकसभा के विघटन के बाद, चुनाव अलग से कराए जा रहे हैं. हालांकि दोबारा से एक साथ चुनाव कराने की संभावना 1983 में चुनाव आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में उठाई गई थी. इसके बाद में तीन अन्य रिपोर्ट में इस अवधारणा से जुड़े और पहलुओं पर गहनता से अध्ययन किया गया.

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