मेघालय विधानसभा चुनाव की 60 सीटों के लिए 27 फरवरी को मतदान है. इन सीटों पर 375 उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं. जनजातीय रिश्तों के समीकरण और 'डबल इंजन' सरकार का फॉर्मूला लेकर बीजेपी बैक सीट से सत्ता के फ्रंट सीट पर बैठने के लिए अकेले रणभूमि में उतरी है. कांग्रेस अपने सियासी वजूद को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रही है तो ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी राज्य में कांग्रेस का विकल्प बनने की जुगत में है. नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी) जैसे क्षेत्रीय दल अपने सियासी आधार बचाए रखने और सत्ता की धुरी बनने के लिए जंग लड़ रहे हैं.
मेघालय में चतुष्कोणीय लड़ाई
मेघालय की 60 सीटों के लिए 375 उम्मीदवार मैदान में हैं. एनपीपी 57 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि कांग्रेस और बीजेपी ने 60-60 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. यूडीपी के 47 प्रत्याशी मैदान में हैं तो वीपीपी के 18 और एचएसडीपी के 11 प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं. टीएमसी ने 56 सीटों पर कैंडिडेट उतारे हैं और मेघालय में सीएम पद का चेहरा मुकुल संगमा को बना रखा है, जो कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता हुआ करते थे. इस तरह से एनपीपी, बीजेपी, कांग्रेस और टीएमसी के बीच चतुष्कोणीय लड़ाई होती नजर आ रही है.
2018 के सियासी समीकरण
साल 2018 में मेघालय में हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. उस चुनाव में कांग्रेस 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन सत्ता के सिंहासन तक नहीं पहुंच सकी थी. कोनराड संगमा की पार्टी एनपीपी 19 सीटें जीतकर दूसरे नंबर पर थी. यूडीपी के 6, पीडीएफ 4, बीजेपी और एचएसपीडीपी को दो-दो सीट पर सफलता मिली थी. कांग्रेस को सत्ता से रोकने के लिए कोनराड संगमा ने बीजेपी, यूडीपी, पीडीएफ, एचपीपीडीपी और एक निर्दलीय के साथ मिलकर सरकार बनाई और वह राज्य के मुख्यमंत्री बने थे.
5 साल में बदल गए समीकरण
मेघालय का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल चुका है. कांग्रेस की सियासी जमीन पर टीएमसी खड़ी है और उसकी जगह लेने के लिए मशक्कत कर रही है तो दूसरी तरफ एनपीपी और बीजेपी का गठबंधन टूट चुका है. ऐसे में एक तरफ टीएमसी-यूडीपी हैं तो दूसरी तरफ एनपीपी, तीसरी तरफ बीजेपी है तो चौथे कोने पर कांग्रेस है. दिलचस्प बात ये है कि इस बार चुनाव में कोई भी दल किसी के साथ नहीं है बल्कि अपने-अपने दम पर चुनावी मैदान में हैं. ऐसे में मुकाबला काफी रोचक हो गया है.
क्या सत्ता पर काबिज हो पाएगी बीजेपी?
बीजेपी 75 फीसदी ईसाई आबादी वाले मेघालय में 60 में से तीन से ज्यादा सीटें नहीं जीती हैं. मौजूदा समय में उसके पास दो विधायक हैं और दोनों शिलॉन्ग से है. बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसे इन्हीं दोनों सीट पर जीत मिली थी. हालांकि, सात सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे और 12 सीटों पर उसके प्रत्याशी तीसरे स्थान पर थे. बीजेपी का दावा है कि उसे इस बार 10-15 सीटें मिल सकती हैं. पार्टी की राज्य इकाई को कुछ मुद्दों पर अपने राष्ट्रीय रुख से पीछे हटने में भी कोई परहेज नहीं है. उदाहरण के तौर पर बीजेपी विधायक संबोर शुल्लई सार्वजनिक तौर पर लोगों को अधिक गोमांस खाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि मेघालय में गोमांस बड़ी संख्या में लोग खाते हैं.
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह गुरुवार से मेघलाय के चुनावी मैदान में उतर रहे हैं, जबकि पीएम मोदी 24 फरवरी को तुरा में रैली और शिलॉन्ग में रोड शो करेंगे. बीजेपी का साफ संदेश है कि पांच साल भले ही एनपीपी के साथ सरकार में रही हो, लेकिन अब सत्ता के फ्रंट सीट पर बैठने के लिए बैकफुट पर नहीं खेलगी. इसीलिए बीजेपी ने इस बार चुनाव में उम्मीदवारों का बड़ा रोस्टर तैयार किया है, जिसमें पांच बार के विधायक मार्टिन डैंगो है, जो एनपीपी छोड़कर आए हैं. संगमा की दक्षिण तुरा सीट पर बीजेपी ने पूर्व उग्रवादी नेता बर्नार्ड एन मारक को उतारा है.
कांग्रेस के सामने वजूद बचाए रखने की चुनौती
पांच साल पहले सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी कांग्रेस के लिए इस बार की राह आसान नहीं है. उनके विधायक-नेता पार्टी छोड़कर गए हैं. 2018 के बाद सबसे पहले कांग्रेस ने 4 विधायक गंवाए, जिसमें एक ने इस्तीफा दे दिया जबकि तीन का निधन हो गया. 2021 में मुकुल संगमा और 11 अन्य विधायक टीएमसी में शामिल हो गए और फिर पांच विधायकों ने एनपीपी के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन दे दिया और दो विधायक बीजेपी में शामिल हो गए. कांग्रेस कड़ी चुनौती से जूझ रही है और अपने सियासी आधार को दोबारा से हासिल करने के लिए उतरी है.
कांग्रेस ने लोकलुभाने वादे कर ईसाई बहुल सीटों पर खास फोकस कर रखा है. कांग्रेस ने पांच चुनावी वादों की घोषणा कर रखी है, जिसमें महिला सशक्तिकरण, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, ड्रग्स और बिजली कटौती मुक्त राज्य बनाने के साथ ही मेघालय को पांच सितारा राज्य में बदलने के संकल्प का जिक्र है.
क्या कांग्रेस का विकल्प बन पाएगी TMC?
मेघालय में कांग्रेस की सियासी जमीन पर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी खड़ी हुई है और राज्य में उसका विकल्प बनने की जुगत में है. टीएमसी द्वारा राज्य में जारी किए गए घोषणा पत्र में पार्टी की ओर से 10 वायदे किए गए हैं. टीएमसी शिक्षा, स्वास्थ्य में सुधार के साथ महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को लेकर उतरी है. टीएमसी अपनी पहली जीत हासिल करने के लिए पूर्व सीएम मुकुल संगमा के सियासी प्रभाव और प्रशांत किशोर की कंपनी आई-पैक के चुनावी प्रबंधन से उम्मीद लगाए बैठी है. मुकुल का प्रभाव क्षेत्र गारो हिल्स है, जहां पीए संगमा की राजनीतिक विरासत संभालने वाले कॉनराड संगमा और उनके नाते-रिश्तेदार अहम खिलाड़ी बने हुए हैं. गोरा हिल्स में कुल 24 विधानसभा सीटें आती है, जहां ईसाई मतदाता अहम हैं.
एनपीपी क्या सत्ता की धुरी बनी रहेगी?
मेघालय की सियासत में पीए संगमा को अपना सियासी आधार रहा है, जिसे कानराड संगमा संभाल रहे हैं. संगमा अकेले चुनावी मैदान में उतरे हैं और पांच साल तक सत्ता में रहने के चलते उन्हें राजनीतिक चुनौती से भी जूझना पड़ रहा है. बीजेपी से लेकर टीएमसी और कांग्रेस तक उन्हें घेर रही है तो क्षेत्रीय दल भी सवाल खड़े कर रहे हैं. क्षेत्रीय अस्मिता को बड़ा मुद्दा बना रहे हैं, लेकिन उम्मीदवार की निजी लोकप्रियता के आधार पर चुनावी जीत या हार निर्धारित करने वाले इस राज्य के बारे में स्थानीय मुद्दे, जिसमें ज्यादातर आदिवासी समुदायों से जुड़े हैं, ही महत्वपूर्ण साबित होंगे. इन्हीं के आसपास एनपीपी अपना एजेंडा सेट कर रही है.
संगमा बनाम संगमा का मुकाबला
मुकुल संगमा (नेता प्रतिपक्ष, मेघालय) और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राज्य के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा दोनों का सियासी असर गारो हिल्स के क्षेत्र में है. दोनों ही नेता गारो समुदाय से आते हैं. दोनों ही नेता राजनीतिक घराने से हैं. कॉनराड संगमा दिवंगत पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पूर्णो संगमा के पुत्र हैं. उनके भाई जेम्स संगमा राज्य सरकार में मंत्री हैं, जबकि उनकी बहन अगाथा संगमा गारो हिल्स से सांसद हैं. मुकुल संगमा ने अपनी राजनीति में खुद स्थापित किया है, लेकिन कॉनराड संगमा अपने पिता की विरासत संभाल रहे हैं. इस तरह से टीएमसी और एनपीपी की नजर गारो हिल्स की सीटों पर है.
खासी+जयंतिया बनाम गारो हिल्स
मेघालय तीन अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में बंटा हुआ है. खासी, जयंतिया और गारो हिल्स के इर्द-गिर्द है, जिन पर क्रमशः खासी, जयंतिया और गारो जनजातियों का गहरा आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव है. खासी और जयंतिया तो काफी हद तक भाषाई और सांस्कृतिक रूप से समान हैं, लेकिन गारो दोनों से काफी अलग है. मेघालय की सियासत भी आम तौर पर खासी-जयंतिया हिल्स और गारो हिल्स के बीच बंटी हुई है.
यूडीपी का क्या होगा चुनाव में?
राज्य में यूडीपी को लगता है कि उनके पास ऐसे नेता हैं जो छात्र राजनीति से पनपे हैं और वे राष्ट्रीय पार्टियों के नेताओं के मुकाबले यहां ज्यादा ताकतवर हैं. यूडीपी के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व विधायक पॉल लिंगदोह, महासचिव डॉ. जेमिनो मावथोह अपने छात्र जीवन से ही एक सामाजिक नेता रहे हैं, जबकि यूडीपी पूर्वी खासी हिल्स के जिला अध्यक्ष टिटोस्टारवेल च्यने भी छात्र राजनीति में शामिल थे. ऐसे में इन तीनों ही नेताओं में जमीनी स्तर पर अच्छी पकड़ है और ये कई मुद्दों को प्रभावित कर सकते हैं.
विश्लेषक सत्येंद्र कुमार कहते हैं कि छोटा राज्य होने के चलते मेघालय की सियासत काफी मायने रखती है. सियासी दलों के लिए उम्मीदवार का चयन मेघालय में खासा महत्वपूर्ण है. दरअसल चुनावी माहौल राजनीतिक पार्टियों के हिसाब से नहीं, बल्कि स्थानीय नेताओं के हिसाब से बनता-बिगड़ता है. विधानसभा सीटों में वोटर्स की औसत संख्या 25 से 32 हज़ार के बीच है, ऐसे में चुनाव में अच्छी तरह से माइक्रो-मैनेजमेंट योजना बनाने वाले नेता ही राजनीतिक दलों की पहली पसंद होते हैं. यूडीपी की ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है, ऐसे में यहां मामला यूडीपी बनाम ऑल हो जाता है. इस बार चुनावी जंग कई कोण में बंटी हुई है. इस तरह मेघालय की चुनावी जंग बेहद दिलचस्प हो गई है.