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मोदी कैबिनेट में ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह पक्की होने के क्या हैं सियासी मायने?

स्थानीय बीजेपी नेताओं को मालूम है कि सिंधिया की जुगलबंदी सीधे दिल्ली में बैठे बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से है. ऐसे में बीजेपी में सिंधिया लंबी रेस के घोड़े हैं. जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए थे तो सबसे बड़ा सवाल था कि क्या महल की राजनीति करने वाले सिंधिया को भारतीय जनता पार्टी स्वीकार कर पाएगी? 

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ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिला नागरिक उड्डयन मंत्रालय (फोटो- आजतक)
ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिला नागरिक उड्डयन मंत्रालय (फोटो- आजतक)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस से निकलकर बीजेपी में हुए शामिल
  • मध्यप्रदेश कैबिनेट में इनके समर्थकों को मिली जगह
  • सीएम शिवराज ने भी दोस्ती निभाने में नहीं छोड़ी कसर

आखिरकार कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आने के करीब 15 महीने बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) मोदी कैबिनेट में मंत्री बन गए. सिंधिया के बीजेपी में जाने के एक दिन बाद से ही उनका केंद्र में मंत्री बनना तय माना जा रहा था लेकिन इंतज़ार थोड़ा लंबा हो गया. सिंधिया के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद इतना साफ हो गया है कि बीजेपी में उनका कद लगातार बढ़ता जा रहा है जो मध्यप्रदेश की राजनीति में भी असर ज़रूर डालेगा. 

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खुद केंद्रीय मंत्री, समर्थकों को बनवाया MP में मंत्री
ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) भले ही अब केंद्र में मंत्री बन गए हैं, लेकिन इससे काफी पहले उन्होंने अपने समर्थक विधायकों को मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री बनवा दिया था. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मार्च 2020 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में अपने समर्थकों के साथ सियासी सफर शुरू किया था. इन्हीं 15 महीनों के दौरान, उनके साथ आए 14 विधायक फिलहाल शिवराज सरकार में मंत्री हैं. सिंधिया अब खुद केंद्रीय मंत्री बन गए हैं. 

इन्हीं 15 महीनों के दौरान सिंधिया बीजेपी में मजबूत होते गए. इसकी एक और तस्वीर हाल ही में शिवराज कैबिनेट के मंत्रियों को ज़िले का प्रभारी मंत्री बनने पर दिखी. इस सूची में भी ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव साफ तौर पर दिखा. क्योंकि ग्वालियर-चंबल संभाग के सभी जिलों में सिंधिया समर्थक मंत्रियों को ही प्रभार दिया गया है. यानी इतना तो तय है कि सत्ता से लेकर संगठन तक सिंधिया की पकड़ मजबूत होती जा रही है. क्योंकि मंत्रियों को प्रभार सरकार के साथ साथ संगठन की मुहर के बाद ही सौंपे जाते हैं.

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और पढ़ें- Jyotiraditya Scindia ministry: सिंधिया को नागरिक उड्डयन मंत्रालय मिला, पिता माधव राव को भी मिला था ये विभाग

बीजेपी नेताजों से प्रगाढ़ होते संबंध
हाल ही में मालवा में चार दिनों के दौरे पर आए सिंधिया ने नीमच, मंदसौर, रतलाम, धार और उज्जैन में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के घर-घर जाकर उनसे मुलाकात की. इस दौरान बीजेपी नेताओं ने जिस तरह सिंधिया से गर्मजोशी से मुलाकात की और उनका अभिवादन किया, इससे संकेत तो यही मिले कि हर कोई खुद को सिंधिया से जोड़ कर रखना चाहता है. क्योंकि उनमें अब भविष्य की संभावनाएं साफ दिख रही हैं. 

स्थानीय बीजेपी नेताओं को मालूम है कि सिंधिया की जुगलबंदी सीधे दिल्ली में बैठे बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से है. ऐसे में बीजेपी में सिंधिया लंबी रेस के घोड़े हैं. जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आए थे तो सबसे बड़ा सवाल था कि क्या महल की राजनीति करने वाले सिंधिया को भारतीय जनता पार्टी स्वीकार कर पाएगी? 

हालांकि अब एक साल बाद अगर देखा जाए तो सिंधिया बीजेपी संगठन के साथ संतुलन बनाने में काफी हद तक कामयाब होते दिख रहे हैं. दरअसल, ज्योतिरादित्य सिंधिया को महाराज या श्रीमंत कहा जाता है क्योंकि वो ग्वालियर राजघराने से आते हैं लेकिन बीजेपी कैडर आधारित राजनीतिक पार्टी है. ऐसे में सवाल था कि क्या यहां सिंधिया टिकेंगे? 

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ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने बदले हुए व्यवहार से इसका काफी हद तक जवाब दे दिया है. बीजेपी में आने के बाद सिंधिया अब खुद कार्यकर्ताओं और नेताजों से मिलने उनके घर जा रहे हैं. कार्यकर्ताओं के घर जाकर खाना खा रहे हैं और जनता से उनका कनेक्ट अब बढ़ता दिख रहा है. 

ग्वालियर-चंबल के महाराज तो सिंधिया ही!

कांग्रेस में रहते कोई नेता ग्वालियर-चंबल संभाग में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बराबरी नहीं कर सका था. हालांकि बीजेपी में आने के बाद माना जा रहा था कि बीजेपी के जो नेता इस संभाग से आते हैं उनके और सिंधिया के बीच मुकाबला रहेगा लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा. सरकार और संगठन में सिंधिया की पैठ साफ़ तौर पर दिख रही है और ग्वालियर-चंबल संभाग में उनका दबदबा भी. 

भले ही मोदी कैबिनेट में शामिल होना रहा हो, अपने समर्थकों के लिए शिवराज कैबिनेट में जगह बनाना हो या फिर प्रभारी मंत्रियों की सूची में अपने समर्थक मंत्रियों को ग्वालियर-चंबल संभाग के प्रभार दिलवाना हो यह सब दिखाता है कि ग्वालियर-चंबल संभाग के दूसरे बीजेपी नेताओं से फिलहाल सिंधिया एक कदम आगे ही है. 

बता दें कि इन नेताओं में एक केंद्रीय मंत्री, सांसद और प्रदेश के कद्दावर मंत्री हैं. हालांकि सिंधिया इससे बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते. हाल ही में भोपाल आने पर वो बकायदा इन नेताओं से बकायदा इनके घर पर जाकर मिले थे और लंबी बातचीत भी की थी. 

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शिवराज-महाराज की जोड़ी

ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में आने के बाद विरोधियों ने इसे शिवराज बनाम सिंधिया बनाने की खूब कोशिश की लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी शिवराज किसी को भी अपना बनाना बखूबी जानते हैं. इसकी झलक उसी दिन दिख गई थी जब बीजेपी में आने के बाद पहली बार भोपाल आए सिंधिया को शिवराज ने घर पर डिनर पर बुलाया और खुद शिवराज की पत्नी साधना सिंह ने अपने हाथों से सबको खाना परोसा. 

इसके बाद कई मौके ऐसे आए जब शिवराज और सिंधिया की जुगलबंदी सार्वजनिक रूप से दिखी खासतौर से 28 सीटों पर हुए उपचुनाव के दौरान जब कई जगहों पर दोनों नेताओं ने साथ में प्रचार किया. अभी भी सिंधिया भोपाल यदि आते हैं तो शिवराज से मिलने ज़रूर जाते हैं. ऐसे में कांग्रेस जहां शिवराज बनाम सिंधिया की खिचड़ी पकाने में लगी थी तो दोनों नेताओं ने इसे शिवराज-महाराज की जोड़ी बना दिया. 

अब सिंधिया के केंद्रीय मंत्री बनने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिलहाल शिवराज के ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहने पर भी मुहर लगा दी है यानी दोनों के बीच टकराव की किसी भी संभावना पर पूरी तरह से विराम लग गया है. दूसरी तरफ माना जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर काफी सकारात्मक रुख रखते हैं इसलिए फिलहाल मध्यप्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें भी अब खारिज हो चुकी है. 

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