मुस्लिम समुदाय के बुद्धिजीवियों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ मेल-मिलाप का दौर जारी है. आरएसएस नेताओं के साथ मुस्लिम उलेमा भी मिले हैं. पिछले साल अगस्त से अभी तक आरएसएस के साथ मुस्लिम बुद्धिजीवियों और उलेमाओं की दो मुलाकातें हो चुकी हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इस मेल-मिलाप की पहल मुस्लिम पक्ष की ओर कई गई थी या फिर संघ खुद आगे आया है?
मुस्लिमों के साथ लगातार हो रही मुलाकात के बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि संघ अपनी इमेज को बदलना चाहता है और मुसलमानों के बीच अपनी पैठ बनाने की कवायद में है. मुस्लिमों तक संघ की पहुंच कायम करने के सवाल पर आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि हमारा किसी से द्वेष नहीं है. न किसी मत से और न ही किसी धर्म से. सभी को राष्ट्र के लिए काम करना चाहिए. किसी की इच्छा मिलने की है तो हम जरूर मिलते हैं.
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि आरएसएस के नेता मुस्लिम बुद्धिजीवियों और उनके आध्यात्मिक नेताओं से उनके निमंत्रण पर ही मिल रहे हैं. संघ उन तक नहीं पहुंच रहा है, बल्कि यह उनकी ओर से सकारात्मक कदमों का जवाब दे रहा है. मिलने और चाय पीने में कोई समस्या नहीं है. दत्तात्रेय होसबाले ने साफ कर दिया कि संघ ने खुद पहल नहीं की थी, बल्कि मुसलमानों की पहल और बुलावे पर ही बुद्धजीवियों और उलेमाओं से मुलाकात की है.
संघ से मिलने वाले मुस्लिम क्या मानते हैं?
संघ नेताओं के साथ मुलाकात करने वाले मुस्लिम बुद्धिजीवियों की फेहरिश्त में शामिल रहे पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने aajtak.in से बात करते हुए स्वीकार किया कि उनकी तरफ से ही आरएसएस नेताओं से मिलने की पहल की गई है. देश में सांप्रदायिक सौहार्द मजबूत करने और हिंदू-मुस्लिमों के बीच गहरी होती खाई को पाटने के लिए आरएसएस से मिलने के लिए हम लोगों ने कदम बढ़ाया था, क्योंकि बातचीत से ही समस्या का हल निकलता है. इसके बाद ही संघ प्रमुख से मिलने के लिए पत्र लिखा गया था, जिस पर वे 22 अगस्त 2022 को हम लोगों से मिले थे. इसी साल जनवरी में हमारी दूसरी मुलाकात संघ नेताओं से दिल्ली में हुई.
संघ के साथ मुस्लिमों की पहली मुलाकात
बता दें कि संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलने की पहल मुस्लिम बुद्धिजीवियों की ओर से की गई थी. ये पहल उस समय हुई है, जब बीजेपी प्रवक्ता नुपुर शर्मा के पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी से देश में स्थिति बिगड़ रही थी. 22 अगस्त 2022 को संघ प्रमुख से दिल्ली के झंडेवालान स्थित संघ के अस्थायी कार्यालय में पांच मुस्लिम स्कॉलर मिले थे. इनमें पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी जमीरुद्दीन शाह और कारोबारी सईद शेरवानी शामिल थे.
मुलाकात में क्या-क्या मुद्दे उठे थे?
संघ के साथ मुलाकात पर एसवाई कुरैशी ने बताया था कि मोहन भागवत से मुलाकात के दौरान कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई. आरएसएस चीफ ने हमें बताया कि लोग गोहत्या और काफिर (गैर-मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाला शब्द) से नाखुश थे. इस पर हमने संघ प्रमुख से साफ तौर पर कहा कि अगर कोई गोहत्या में शामिल है तो उसे कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए. इसके अलावा, काफिर शब्द पर कहा कि इसका इस्तेमाल अविश्वासियों के लिए किया जाता है. यह कोई मुद्दा नहीं है, जिसे सुलझाया नहीं जा सकता.
मुस्लिम पक्ष की ओर से संघ प्रमुख से कहा गया था कि हमें भी इस बात पर बहुत दुख होता है जब किसी भारतीय मुसलमान को पाकिस्तानी या जेहादी कहा जाता है. साथ ही मुसमलानों को बदनाम किया जाता है. विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय की आबादी और बहुविवाह की प्रथा से जुड़े मामले में. एसवाई कुरैशी ने कहा कि हमने चर्चा के दौरान इस बात को भी रखा कि 99 फीसदी मुस्लिम बाहर से नहीं आए हैं, बल्कि यहीं के रहने वाले हैं.
एसवाई कुरैशी ने बताया कि मोहन भागवत ने मुस्लिम बुद्धजीवियों से कहा था कि देश के लिए सांप्रदायिक सद्भाव जरूरी है और ऐसी बैठकें होती रहनी चाहिए. मुस्लिम स्कॉलरों को उन्होंने कृष्ण गोपाल, इंद्रेश कुमार और रामलाल के संपर्क में रहने की सलाह दी थी. इसके बाद हम सब ने मुस्लिम उलेमाओं और मुस्लिम संगठन के लोगों के साथ बैठक कर आरएसएस के साथ बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए बात रखी थी, जिसे सभी ने स्वीकार किया और अच्छी पहल बताई थी.
संघ और मुस्लिमों की दूसरी मुलाकात
संघ के साथ मुस्लिम बुद्धिजीवियों की दूसरी बैठक 14 जनवरी 2023 को नजीब जंग के पुरानी दिल्ली वाले घर पर हुई. इसमें जमात-ए-इस्लामी से लेकर जमीयत उलेमा ए हिंद संगठन के दोनों गुट शामिल हुए थे. जमात-ए-इस्लामी हिंद से मोहतशिम खान, जमीयत ए उलेमा हिंद के महमूद मदनी गुट से नियाज फारूकी जबकि अरशद मदनी गुट से फजलुर्रहमान कासमी और अजमेर दरगाह से जुड़े सलमान चिश्ती ने शिरकत की थी. संघ के साथ मुस्लिमों के बीच यह बैठक इसीलिए अहम थी, क्योंकि पहली बार मुस्लिम बुद्धजीवियों के साथ उलेमा शामिल हुए थे.
संघ से संवाद जारी रखना चाहते मुस्लिम
आरएसएस और मुस्लिमों के बीच मुलाकात और बातचीत के सिलसिले को मुस्लिम उलेमा और संगठन बनाए रखने के पक्ष में हैं. जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष सलीम इंजीनियर ने कहा था कि युद्ध में जो लोग होते हैं, उनके बीच भी बातचीत होती है. हम तो युद्ध में नहीं हैं. संघ के लोग बातचीत करना चाहते हैं तो फिर हमारा भी फर्ज बनता है कि उनके साथ संवाद का सिलसिला जारी रखें. उन्होंने कहा कि जमात की राय है कि आरएसएस के साथ बातचीत जारी रहनी चाहिए, क्योंकि सरकार पर उनका गहरा प्रभाव है. बीजेपी सरकार की दशा व दिशा तय करने में आरएसएस की अहम भूमिका जगजाहिर है.
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कहा था कि बीजेपी और आरएसएस से कोई मजहबी दुश्मनी नहीं, सिर्फ कुछ गलतफहमियों को बढ़ाने वाले मामलों को लेकर मतभेद है. हम संघ के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं. आइए आगे बढ़िए और गले मिलिए. हमें सनातन धर्म के बढ़ने से कोई परेशानी नहीं, लेकिन किसी को इस्लाम के बढ़ने से भी दिक्कत नहीं होनी चाहिए.
साथ ही जमीयत से जुड़े हुए नियाज अहमद फारूकी ने कहा कि हमें बीजेपी-आरएसएस से कोई दुश्मनी नहीं है. अगर वो करीब आने की कोशिश करते हैं तो स्वागत है, लेकिन नफरत का माहौल खत्म होना चाहिए और संविधान के मुताबिक काम हो. यह बात पूरी तरह से साफ है कि संघ के साथ बातचीत के सिलसिले को मुस्लिम पक्ष ने शुरू किया और उसे आगे भी बनाए रखना चाहता है तो आरएसएस भी इसी पक्ष में है.