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Nagaland Firing: नगालैंड में सियासी उबाल, क्या बचेगी सीएम नेफ्यू रियो की कुर्सी?

Nagaland Civilian Death: नगालैंड में असम राइफल्स की फायरिंग में आम लोगों की मौत से तनाव बढ़ गया है. मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने तो नगालैंड में लागू AFSPA को तत्काल हटाने की मांग की है. एनडीपीपी और बीजेपी के रिश्ते पर भी इसका असर हो सकता है.

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स्टोरी हाइलाइट्स
  • नगालैंड फायरिंग मामले पर राजनीति शुरू होने की संभावना
  • मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने की AFSPA हटाने की मांग

नगालैंड के मोन जिले में शनिवार को सशस्त्र बलों द्वारा की गई फायरिंग में 14 नागरिकों की मौत के बाद से इस मामले पर राजनीति शुरू होने की संभावना बढ़ गई है. वहीं, यह घटना नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो के लिए परेशानी का सबब बन सकती है. 

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क्या है मामला 

शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, नगालैंड के मोन जिले के ओटिंग गांव में उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान फायरिंग में 14 गांववालों की मौत हो गई. इस हिंसा में एक जवान को भी अपनी जान गंवानी पड़ी. मज़दूरों का एक समूह कोयला खदान में काम करने के बाद अपने गांव लौट रहा था. असम राइफल्स के जवानों ने इन लोगों को प्रतिबंधित संगठन एनएससीएन (के) के युंग आंग गुट का सदस्य समझा और उनकी गाड़ी पर कथित तौर पर फायरिंग कर दी. ओटिंग में अंतिम संस्कार पर नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने नगालैंड में लागू AFSPA (Armed Forces Special Powers Act) को तत्काल हटाने की मांग की है.

असम राइफल्स ने रविवार को कहा कि उन्हें इस घटना पर खेद है, जबकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मारे गए लोगों के परिवारों को न्याय दिलाने का वादा किया. असम राइफल्स केंद्रीय गृह मंत्रालय के दायरे में आती है. मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने शांति की अपील करते हुए कहा है कि एक विशेष जांच दल घटना की जांच करेगा.

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मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो के लिए मुश्किल है आने वाला समय

सशस्त्र बलों की फायरिंग में नागरिकों की मौत से राज्य में आक्रोश है. पिछले काफी समय से केंद्र सरकार कई नगा समूहों के साथ शांति-संधि को अंतिम रूप देने में लगी हुई है, जिनमें एनएससीएन जैसे उग्रवादी संगठन शामिल हैं. ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि मोन जिले की यह घटना इस प्रक्रिया में बाधा डाल सकती है. कई नागरिक समाज समूहों की मदद से शांति प्रक्रिया को बढ़ावा मिला था, लेकिन इस घटना ने बहुतों को नाराज़ कर दिया है. रियो राज्य के निर्विवादित नेता बनने की कोशिशों में लगे हैं, लेकिन निर्दोष नागरिकों की हत्या से उनकी लोकप्रियता और राज्य में उनकी पकड़ ढीली होने की संभावना है. 

रियो का राजनीतिक ताना-बाना
 
2014 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में मंत्री पद की उम्मीद में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी थी. उस समय, वह एनपीएफ़ के नेता थे, जो एनडीए का हिस्सा रहा है. लेकिन जब वे कामयाब नहीं हुए, तो उन्होंने राज्य की राजनीति में फिर से लौटना चाहा. बीजेपी समर्थित एनपीएफ सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री टी.आर. जेलियांग ने उनकी कोशिशों को कामयाब नहीं होने दिया. तब रियो ने एक नई पार्टी एनडीपीपी बनाई और 2018 के बाद मुख्यमंत्री के रूप में वापसी की. यहां खास बात यह रही कि बीजेपी ने उन्हें सपोर्ट किया, जिसने तब तक राज्य में एनपीएफ के साथ गठबंधन तोड़ लिया था.

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60 सदस्यों वाली नगालैंड विधानसभा में एनडीपीपी के पास 21, एनपीएफ के पास 25 और बीजेपी के पास 12 सीटें हैं. बीजेपी, पड़ोसी राज्य मणिपुर में एनपीएफ की सहयोगी है. हाल ही में, जब रियो को लगा कि बीजेपी फिर से एनपीएफ के साथ गठबंधन करने की कोशिश कर रही है, तो रियो ने एनपीएफ को सरकार में शामिल होने के लिए न्योता दे दिया और अपनी कुर्सी पर आने वाले किसी भी तरह के खतरे को दूर कर लिया. इस पर कहा यह गया कि नगा शांति प्रक्रिया सुचारू रूप से सके, इसके लिए राज्य में सर्वदलीय सरकार की ज़रूरत थी. इससे केंद्र सरकार निश्चित रूप से नाराज़ हुई, जिसे डर है कि एनपीएफ को बोर्ड में लाकर रियो ईसाई बहुल राज्य में बीजेपी का सफाया करने की कोशिश कर रहे हैं.

रियो सरकार को किससे खतरा?

मोन जिले की इस हालिया घटना, पर जब राज्य सरकार जनता के आक्रोश का सामना कर रही है, तो  बीजेपी रियो सरकार के लिए खतरा बन सकती है, क्योंकि अब बीजेपी, एनपीएफ के नेतृत्व वाली सरकार का गठन कर सकती है. मणिपुर में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने जा रहे हैं, जिसका असर भी इस राजनीतिक खेल पर पड़ सकता है. 

हालांकि, ऐसा कहना आसान है, करना नहीं. ऐसा इसलिए, क्योंकि असम राइफल्स केंद्र सरकार के अधीन आती है और रियो इसका दोष केंद्र सरकार पर मढ़ने की कोशिश कर सकते हैं. इससे दोनों दलों के बीच के संबंधों में कड़वाहट और बढ़ सकती है. दोनों ही हालातों में आने वाले दिनों में नगालैंड का सियासी माहौल सस्पेंस भरा होगा.

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