लोकसभा चुनाव के नतीजों ने बीजेपी को बड़े सबक दिए हैं. यही वजह है कि पार्टी आलाकमान अब अपनी चुनावी रणनीति में बड़े बदलाव करने जा रहा है. ग्राउंड कनेक्ट से लेकर युवा वर्ग को साधने की कवायद शुरू हो गई है. महाराष्ट्र, हरियाणा और बंगाल तक के माहौल में बदलाव देखा जा रहा है. जिन राज्यों में बीजेपी खुद मजबूत मान रही थी, वहां नतीजों ने नाराजगी का आइना दिखा दिया है. अब क्षेत्रीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाने की वकालत होने लगी है. सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दी जा रही है. पार्टी आलाकमान भी आंतरिक समीक्षाएं कर रहा है. बीजेपी अपने संदेश और प्रचार के तरीके को भी सुधारने की योजना बना रही है.
दरअसल, लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 400 पार का नारा दिया, लेकिन सिर्फ 240 सीटों पर ही सिमटकर रह गई. सरकार बनाने के लिए अपने दम पर बहुमत भी हासिल नहीं कर सकी. एनडीए के सहयोगियों की बदौलत बीजेपी ने देश में तीसरी बार सरकार तो बना ली, लेकिन अब उन गलतियों पर पर्दा डालने की बजाय सबक के तौर पर लिया जा रहा है. यही वजह है कि खराब प्रदर्शन को लेकर सबसे पहले उत्तर प्रदेश यूनिट से रिपोर्ट तलब की गई है. यूपी बीजेपी चीफ भूपेंद्र चौधरी ने मंगलवार को पार्टी आलाकमान से मुलाकात की और 15 पेज की अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. इस रिपोर्ट में 40 हजार कार्यकर्ताओं का फीडबैक होने का दावा किया गया है. इस रिपोर्ट में कार्यकर्ताओं के असंतोष और प्रशासन की मनमानी को हार की प्रमुख वजह बताया है. रिपोर्ट में आरक्षण में विसंगतियां, ठेके पर नौकरियों का भी जिक्र है.
हरियाणा में बीजेपी ने OBC दांव खेला?
इस साल के अंत तक हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की सरकार है. झारखंड में बीजेपी विपक्ष में है. बीजेपी ने अब इन चुनावी राज्यों में फोकस बढ़ा दिया है. पिछले दिनों में कुछ ऐसे फैसले लिए गए, जो सीधे तौर पर चुनाव से जोड़कर देखे जा रहे हैं. हरियाणा में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) पर फोकस करते देखा जा रहा है. चूंकि यहां किसान और जाट वोटर्स को बीजेपी से नाराज माना जा रहा है. ऐसे में बीजेपी गैर जाट पॉलिटिक्स पर भरोसा कर रही है और आलाकमान ने ओबीसी समुदाय के नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां देकर विजन भी साफ कर दिया है.
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आलाकमान ने अचानक मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री पद से हटाकर उनकी जगह पिछड़ा वर्ग से आने वाले नायब सैनी को जिम्मेदारी सौंप दी. बीजेपी ने अपनी सहयोगी पार्टी 'जजपा' के साथ गठबंधन भी तोड़ दिया था. पार्टी को उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव में इसका फायदा मिलेगा. हालांकि, नतीजे आए तो बड़ा नुकसान झेलना पड़ा. पिछले आम चुनाव में हरियाणा में क्लीन स्वीप करने वाली बीजेपी ने आधी सीटें खो दीं. यानी 10 में से 5 लोकसभा सीटों पर ही जीत मिल सकी. बीजेपी को 46.11 फीसदी और कांग्रेस 43.67 फीसदी वोट मिले.
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इस झटके के पीछे एंटी इनकंबेंसी फैक्टर एक बड़ी वजह बताई गई. संगठन इसे सबक के तौर पर ले रहा है. अब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने ब्राह्मण कार्ड खेला है और मोहन लाल बड़ौली को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. अब तक सैनी के पास प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी थी. हरियाणा के प्रदेश प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया जाट चेहरे हैं और राजस्थान के बड़े नेता माने जाते हैं. हरियाणा में ओबीसी और ब्राह्मण समुदायों को मिलाकर करीब 35 फीसदी वोटर्स हैं. राज्य में 21 प्रतिशत ओबीसी मतदाता हैं. जबकि जाट मतदाता 22.2 प्रतिशत हैं. करीब 20 फीसदी दलित आबादी है.
माना जा रहा है कि बीजेपी किसी वर्ग को नाराज नहीं करना चाहती है. यही वजह है कि जाट और किसानों को भी मनाने के लिए भरसक प्रयास किए जा रहे हैं. बीजेपी यहां करीब 10 सालों से गैर जाट ओबीसी की राजनीति कर रही है. बीजेपी ने 10 साल पहले पंजाबी खत्री समाज के चेहरे मनोहर लाल के हाथों में हरियाणा की कमान सौंपी थी और जाट सीएम की परंपरा को तोड़ा था. 90 सदस्यीय हरियाणा विधानसभा का चुनाव इस साल अक्टूबर-नवंबर में होगा.
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बीजेपी भले ही संगठन में हर वर्ग को साधने का संदेश दे रही है, लेकिन सरकार के फैसलों में युवाओं से लेकर ओबीसी वर्ग की झलक देखने को मिल रही है. मंगलवार को बीजेपी ने ओबीसी वोटरों को साधने के लिए क्रीमी लेयर बढ़ाने का ऐलान किया है. इसके साथ ही ओबीसी जातियों की B कैटेगरी के लिए भी नया कोटा तय किया है. हरियाणा सरकार ने इसका नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है. विधानसभा चुनाव से पहले इस ऐलान को बड़ा दांव माना जा रहा है, क्योंकि हरियाणा में सबसे बड़ा वोट बैंक ओबीसी का है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ओबीसी की क्रीमी लेयर बढ़ाने का ऐलान किया.
शाह ने कहा, हरियाणा सरकार ने OBC समाज के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए क्रीमी लेयर की सीमा को 6 लाख से बढ़ाकर 8 लाख रुपए कर दिया है और पंचायतों और म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में ग्रुप A के लिए 8% आरक्षण के साथ ही ग्रुप B के लिए भी 5% आरक्षण का प्रावधान किया है. हरियाणा में अब तक ओबीसी की क्रीमी लेयर 6 लाख रुपये थी. जबकि, केंद्र सरकार ने ओबीसी की क्रीमी लेयर 8 लाख रुपये तय कर रखी थी. हरियाणा में अब तक पंचायतों और नगर पालिकाओं में BC (A) में शामिल जातियों को ही 8% आरक्षण मिलता था.
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हरियाणा सरकार ने युवाओं को अपने पाले में लाने के लिए अग्निवीर को लेकर बड़ा ऐलान किया है. अग्निवीरों को पुलिस भर्ती और माइनिंग गार्ड की भर्ती में 10 फीसदी का आरक्षण दिया जाएगा. इसके अलावा ग्रुप सी और सी में 3 साल की आयु सीमा में छूट दी जाएगी. जो अग्निवीर चार साल बाद खुद काम शुरू करना चाहेगा उसे काम शुरू करने के लिए सरकार 5 लाख तक का बिना ब्याज लोन दिया जाएगा. दरअसल, हरियाणा में बड़ा वर्ग सेना की नौकरी को प्राथमिकता देता है. युवाओं की भी पहली पसंद सेना होती है. राज्य सरकार के इस फैसले से युवाओं को लाभ मिलेगा.
पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व कार्ड?
पश्चिम बंगाल में बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने मंगलवार को एक चौंकाने वाला बयान दिया. शुभेंदु ने कहा कि बीजेपी को 'सबका साथ सबका विकास' नारा बदल देना चाहिए. शुभेंदु का कहना था कि 'सबका साथ सबका विकास' की बात करने की जरूरत नहीं हैं. शुभेंदु का कहना था कि जो हमारे साथ, हम उसके साथ. सबका साथ, सबका विकास बंद करो. हमें अल्पसंख्यक मोर्चे की भी जरूरत नहीं है. अंत में उन्होंने जय श्री राम के नारे लगाए. हालांकि, विवाद बढ़ा तो शुभेंदु अधिकारी ने अपने बयान पर सफाई दी और कहा, मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि 'सबका साथ सबका विकास' प्रधानमंत्री मोदी का नारा है और मेरे कहने से यह नहीं बदलेगा. यह एनडीए सरकार का एजेंडा है. यह बीजेपी का भी एजेंडा है. मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैंने ऐसा क्यों कहा.
फिलहाल, शुभेंदु के बयान से साफ है कि बीजेपी अब बंगाल में हिंदू वोटर्स पर फोकस रखेगी. बंगाल बीजेपी का मानना है कि लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर्स ने एकजुट होकर टीएमसी को सपोर्ट किया है. जबकि हिंदू वोटर्स में विभाजन देखा गया. ऐसे में अब हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की जाएगी. इससे पहले बीजेपी को मुस्लिम वोटों को लुभाने के लिए मुस्लिम सम्मेलन आयोजित करवाते देखा गया है. इतना ही नहीं, बीजेपी ने बंगाल में ना सिर्फ मुस्लिम समुदाय में भरोसा बढ़ाने की कोशिश की, बल्कि इस वर्ग को टिकट भी दिए और चुनावी मैदान में भी उतारा. 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 6 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे.
हालांकि, पश्चिम बंगाल में बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड नया नहीं है. इससे पहले भी बीजेपी हिंदुत्व को लेकर मुखर देखी गई है. दरअसल, पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों को तृणमूल कांग्रेस का कोर वोट माना जाता है. लेफ्ट-कांग्रेस की भी इस पर नजर रहती है. मुस्लिम वोटर्स का बड़ा हिस्सा बीजेपी को रोकने के लिए वाम-कांग्रेस गठबंधन के बजाय तृणमूल कांग्रेस को तरजीह देता आ रहा है. यही वजह है कि बीजेपी हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए हरसंभव कोशिश करते आ रही है. बीजेपी ने हिंदू वोटर्स को अपने पाले में करने के लिए राज्य में धार्मिक कार्यक्रमों और आयोजनों को बढ़ावा दिया है. रामनवमी, हनुमान जयंती और दुर्गा पूजा के अवसरों पर बड़े स्तर पर आयोजन किए और आलाकमान को बुलाकर कार्यकर्ताओं में जोश भरने काम करती है.
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बंगाल में 'जय श्री राम' के नारे को बीजेपी ने एक प्रमुख राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल किया है. राज्य के विभिन्न हिस्सों में इस नारे के जरिए अपनी उपस्थिति को मजबूत करने की कोशिश की है. बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में मंदिरों के निर्माण और पुराने मंदिरों के पुनर्निर्माण को अपने एजेंडे में शामिल किया है. बीजेपी लगातार तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाकर घेरते आ रही है और हिंदू वोटर्स को यह संदेश देने की कोशिश रही है कि वे (TMC) आपके हितों की अनदेखी कर रहे हैं. बीजेपी ने बंगाल में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का समर्थन किया है और इसे हिंदू शरणार्थियों के लिए लाभकारी बताया है. इससे उन्होंने बंगाल में हिंदू शरणार्थियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास किया है. तृणमूल सरकार पर दुर्गा पूजा विसर्जन और मुहर्रम के दौरान प्रतिबंध लगाने जैसे मुद्दों पर आक्रामक रुख अपनाया है, इससे हिंदू मतदाताओं में एकजुटता और समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की गई है.
महाराष्ट्र में चुनाव से पहले कैश ही कैश...
महाराष्ट्र में भी इसी साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. महायुति ने सत्ता में वापसी के लिए पूरा जोर लगा दिया है. युवाओं से लेकर महिलाओं को अपने पाले में लाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की तर्ज पर योजनाओं को जमीन पर उतार दिया है. हालांकि, विपक्ष इसे सबक के तौर पर देख रहा है. एनसीपी (एस) सुप्रीमो शरद पवार कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में झटका लगने के बाद सरकार को लोगों की नाराजगी का एहसास हुआ है. यही वजह है कि अब महाराष्ट्र में नाराज भाई-बहनों को साधने के लिए सरकार नई योजना लेकर आई है. पवार कहना था कि ये योजना पूरी तरह से लोकसभा चुनाव में झटका लगने के कारण लाई गई है. वोटर्स को समझने की जरूरत है.
दरअसल, महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे सरकार ने 'लड़की बहिन योजना' शुरू की है. उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार को साफ किया कि अगले महीने रक्षाबंधन त्यौहार के दौरान इस योजना की पहली किस्त जारी की जाएगी. फडणवीस का कहना था कि हम 15 अगस्त से 19 अगस्त तक रक्षाबंधन के दौरान 'लड़की बहिन योजना' की पहली किस्त जारी करने की दिशा में काम कर रहे हैं. 'मुख्यमंत्री मांजी लड़की बहिन' योजना के तहत 21 से 60 वर्ष की विवाहित, तलाकशुदा और दूसरों पर निर्भर महिलाओं को 1,500 रुपये प्रति माह मिलेंगे. लाभार्थियों की वार्षिक पारिवारिक आय 2.5 लाख रुपये तक सीमित होनी चाहिए.
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परिवार का कोई भी सदस्य सरकारी नौकरी में नहीं होना चाहिए या आयकरदाता नहीं होना चाहिए. यानी पात्र महिलाओं को सालाना 18 हजार रुपये दिए जाएंगे. इस मदद के जरिए महिलाओं की वित्तीय जरूरतें पूरी होंगी और उनकी आर्थिक आजादी को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी. सरकार ने 46,000 करोड़ रुपये का पर्याप्त बजट भी आवंटित किया है. पूरे महाराष्ट्र में करीब 1.50 करोड़ महिलाओं को इस योजना का मिलने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि इस योजना से ना सिर्फ आधी आबादी को सीधे फायदा पहुंचेगा, बल्कि महायुति सरकार को भी उम्मीद है कि मध्य प्रदेश की तरह महाराष्ट्र के चुनाव नतीजों में भी मैजिक देखने को मिला.
इसके अलावा, शिंदे सरकार ने बेरोजगार युवा वर्ग को भी साधने का प्लान तैयार कर लिया है. सरकार ने युवाओं को जॉब ट्रेनिंग और भत्ता के लिए 'लड़का भाऊ' योजना का ऐलान किया है. इस योजना के तहत नौकरी की तलाश करने वाले युवाओं को प्रति माह 6 हजार से 10 हजार रुपये भत्ता मिलेगा. राज्य के 12वीं पास युवा को हर महीने 6 हजार रुपये दिए जाएंगे. डिप्लोमा धारकों को 8 हजार रुपये और बैचलर डिग्री वालों को प्रति माह 10 हजार रुपये भत्ता मिलेगा.
युवाओं के लिए सरकार की ये योजना कल्याणकारी साबित हो सकती है. युवा आसानी से ना सिर्फ मुफ्त में कौशल प्रशिक्षण सीखकर कहीं भी नौकरी हासिल कर सकेंगे या खुद का कोई व्यवसाय शुरू कर सकते हैं, बल्कि बेरोजगार रहने तक सरकार से अच्छी खासी मदद भी पाते रह सकते हैं. इस योजना के लिए सरकार ने 6000 करोड़ रुपये खर्च करने का दावा किया है. इस योजना के अंतर्गत 10 लाख पात्रों को हर साल लाभ दिया जाएगा.
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महाराष्ट्र में भले ही इन दोनों योजनाओं के मायने राजनीतिक निकाले जाएंगे, लेकिन यह भी सच है कि इन योजनाओं से राज्य का एक बड़ा वर्ग लाभान्वित होगा और आर्थिक मदद से मजबूत भी होगा. इसके साथ ही बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार को भी विपक्ष के हमले से बचाव करने का एक मौका मिलेगा. महाराष्ट्र में अभी विधान परिषद के नतीजों ने महायुति के चेहरे पर चमक बिखेरी है. विधानपरिषद की कुल 11 सीटों के नतीजे आए तो सत्तारूढ़ महायुति ने 9 सीटों पर जीत हासिल की. विपक्षी गठबंधन महाविकास आघाडी को सिर्फ 2 सीटें मिल पाईं.
लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद और विधानसभा चुनावों से पहले हुए इन चुनावों को शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा था. विधान परिषद की वोटिंग में अजित पवार की एनसीपी और सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना तो नहीं टूटी, बल्कि कांग्रेस के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी. 78 सदस्यों वाले इस सदन में सत्तापक्ष का संख्याबल 34 हो गया है. बीजेपी के सदस्यों की संख्या 20 पहुंच गई है. एमवीए की संख्या 17 सदस्यों की है. विधानसभा परिषद में कुल सदस्यों की संख्या 78 है लेकिन 66 सदस्यों का चुनाव होता है बाकी 12 सदस्य मनोनीत किए जाते हैं.
राज्य में कुल 288 विधानसभा सीटें हैं. बीजेपी के 106, शिंदे शिवसेना के 40, अजित पवार की एनसीपी के भी 40 विधायक हैं. जबकि 21 अन्य पार्टियों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन है. विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस 44, शरद पवार गुट के 13, उद्धव ठाकरे गुट के 16 विधायक हैं. 3 अन्य विधायकों का समर्थन है. सपा और मजलिस पार्टी के 2-2 विधायक हैं. महाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें हैं. इस बार आम चुनावों में शिवसेना (यूबीटी), एनसीपी (एसपी) और कांग्रेस की महा विकास अघाड़ी ने 30 सीटें जीतीं हैं. इस चुनाव में बीजेपी को करारी हार मिली है. एनडीए को कुल 17 सीटें मिली हैं. बीजेपी को 9, शिंदे शिवसेना को 7 और एक सीट अजित पवार की एनसीपी को मिली है. एक सीट कांग्रेस के बागी उम्मीदवार विशाल पाटिल ने सांगली में जीती है.
झारखंड में आदिवासी वर्ग को साधने की क्या रणनीति?
झारखंड में भी विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. यहां बीजेपी ने आदिवासी वर्ग को साधने के लिए बड़ी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है. ओडिशा में बीजेपी की जबरदस्त जीत हुई तो पार्टी ने मुख्यमंत्री चयन में पड़ोसी राज्य झारखंड के चुनावी समीकरण को भी ध्यान में रखा और आदिवासी चेहरे मोहन माझी को ओडिशा का नया मुख्यमंत्री बनाकर चौंका दिया. राजनीतिक विश्लेषकों ने भी यह स्वीकार किया कि ओडिशा में नए सीएम चुने जाने का झारखंड कनेक्शन है. क्योंकि बीजेपी के लिए अगली चुनावी परीक्षा झारखंड और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव भी हैं. झारखंड में एनडीए ने 14 लोकसभा सीटों में से 9 पर जीत दर्ज की. यह एनडीए के लिए झटका है. क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने 14 में से 12 सीटें जीती थीं. यानी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झारखंड में जमीनी हकीकत तेजी से बदल गई है. यह बात पार्टी हाईकमान भी जानता है.
बीजेपी को अंदेशा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नेता और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कथित भूमि घोटाले में गिरफ्तारी का मामला एनडीए पर उलटा असर डाल सकता है. क्योंकि एनडीए को आदिवासी सीटों पर करारी हार का सामना करना पड़ा है. झामुमो-कांग्रेस गठबंधन ने दुमका, खूंटी और लोहरदगा की अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटें एनडीए से छीन लीं. बीजेपी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सिंहभूम सीट भी हार गई. ये इलाका ओडिशा की सीमा से सटा है. माना जा रहा है कि ओडिशा में मोहन माझी को कमान सौंपकर बीजेपी झारखंड में आदिवासी वोटर्स को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है. दरअसल, मोहन माझी जिस केंदुझार सीट से चुनाव जीतते आ रहे हैं, वो एसटी-आरक्षित है और वहां 45% आदिवासी आबादी है. इतना ही नहीं, केंदुझार जिला मुख्यालय झारखंड बॉर्डर से सिर्फ 50 किलोमीटर दूर है. यानी माझी का झारखंड के कई जिलों में प्रभाव देखने को मिल सकता है.
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2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी 26.2% है. जानकार कहते हैं कि ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन माझी का निश्चित रूप से आदिवासी क्षेत्रों में चुनावों पर प्रभाव पड़ेगा. सबसे ज्यादा पड़ोसी राज्य झारखंड में असर देखने को मिलेगा. ओडिशा के आदिवासी सांसद जुएल ओराम को केंद्रीय मंत्रिमंडल में वापस लाना उसी रणनीति का हिस्सा है. यह कोई अजीब संयोग नहीं है कि ओडिशा के राज्यपाल झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास हैं. हालांकि, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ऐसे दांव सफल होंगे. बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में यादव वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए मध्य प्रदेश में मोहन यादव को सीएम बनाया, लेकिन इससे चुनावी लाभ नहीं हो सका.
राजस्थान में मंदिरों पर फोकस
राजस्थान में भी भजन लाल सरकार के फोकस में मंदिर उत्थान से लेकर जॉब और गांव-किसान तक हैं. पहले बजट में सरकार ने इन योजनाओं के लिए खासा बजट आवंटित किया है. बीजेपी सरकार ने खाटू श्याम मंदिर का विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर विकास करने का ऐलान किया है और इसके लिए 100 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है. बजट में पुराने मंदिरों और धार्मिक स्थलों का विकास करने, इनकी मरम्मत कराने का ऐलान किया है. त्योहारों में उत्सव मनाने के लिए राज्य के 600 मंदिरों को 13 करोड़ रुपये दिए जाने की घोषणा की है. संभाग स्तर पर आदर्श वेद विद्यालय खोलने का भी ऐलान किया गया है. भजन सरकार ने अगले पांच साल में चार लाख नौकरियां देने का ऐलान किया है. इनमें से एक लाख भर्तियां इसी साल होंगी.
आठवीं से बारहवीं तक अच्छे नंबर लाने वाले छात्रों को मुफ्त टैबलेट, इंटरनेट देने के साथ ही नए बिजनेस शुरू करने के लिए 25 करोड़ कॉलेजों में बिजनेस आइडिया पर काम करने के लिए 20 करोड़ रुपये देने की घोषणा भी बजट में की है. बजट में ये भी कहा गया है कि सरकार ने अगले पांच साल में निजी क्षेत्रों को भी मिलाकर कुल 10 लाख रोजगार उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है. पांच लाख नए किसानों को ब्याज मुक्त फसली ऋण देने, पांच हजार किसानों को डिग्गी निर्माण के लिए अनुदान देने की भी घोषणा की है. फिलहाल, भजन सरकार ने हिंदुत्व की पॉलिटिक्स को धार देने की मंशा इस बजट के जरिए साफ कर दी है.
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लोकसभा चुनाव से बीजेपी ने क्या सबक लिए?
2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कुल 303 सीटें जीती थीं और अकेले बहुमत हासिल किया था. यह आंकड़ा 543 सदस्यीय लोकसभा में सरकार बनाने के लिए जरूरी 272 सीटों से काफी ज्यादा था. एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) ने कुल मिलाकर 353 सीटें जीती थीं. इस बार बीजेपी को सीधे 63 सीटों का नुकसान हुआ है. एनडीए की बात की जाए तो पिछले प्रदर्शन से 60 सीटें कम आई हैं. बीजेपी को मिले इस झटके के पीछे कई वजहें निकलकर सामने आ रही हैं और उन तमाम शिकवा-शिकायतों को दूर करने पर काम भी तेजी से शुरू कर दिया गया है. जानिए अब पार्टी क्या करने जा रही है...
जमीनी स्तर पर मजबूती: पार्टी ने स्थानीय मुद्दों और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के महत्व को समझा है. अब संगठन जमीनी स्तर पर अपने नेटवर्क को और मजबूत करेगा. स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को ज्यादा सशक्त बनाया जाएगा.
सामाजिक मुद्दों पर फोकस: सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को प्रमुखता दी जाएगी, जिससे विभिन्न समुदायों का समर्थन हासिल हो सके.
संदेश और प्रचार में सुधार: इस आम चुनाव में बीजेपी अपने हाईटेक सिस्टम के भरोसे रही. जबकि कांग्रेस और ज्यादातर विपक्षी दलों ने डोर-टू-डोर कैंपेन चलाया. घोषणा पत्रों को घर-घर तक पहुंचाया. यही वजह है कि बीजेपी अब प्रचार की रणनीति को और बेहतर बनाने जा रही है. आधुनिक तकनीकों और प्रभावी संचार माध्यमों का प्रभावी तरीके से उपयोग करेगी.
अलायंस पॉलिटिक्स: विभिन्न राज्यों में स्थानीय और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ अलायंस करने पर विचार किया जा रहा है.
नए चेहरे: युवाओं और नए चेहरों को आगे बढ़ाने का काम किया जाएगा, ताकि नई ऊर्जा और विजन को शामिल किया जा सके.