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उमर अब्दुल्ला का एक और 'गिफ्ट'... क्या JK विधानसभा में बीजेपी के साथ दोस्ती के रास्ते खोलेगा?

जम्मू कश्मीर की सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने विधानसभा में डिप्टी स्पीकर का पद बीजेपी को देने का फैसला किया है. उमर अब्दुल्ला का यह गिफ्ट क्या बीजेपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की दोस्ती के रास्ते खोलेगा? उमर अब्दुल्ला के इस फैसले के पीछे रणनीति क्या है?

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उमर अब्दुल्ला (File photo)
उमर अब्दुल्ला (File photo)

जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से ही उमर अब्दुल्ला के सुर बदले-बदले से लग रहे हैं. चुनाव नतीजों के ऐलान से पहले तक उमर अब्दुल्ला भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले नजर आ रहे थे. चुनाव नतीजे आने के बाद से ही वह केंद्र के साथ मिलकर काम करने की बात कह रहे हैं.

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उमर अब्दुल्ला ने चुनाव नतीजों के ऐलान के बाद कहा था कि हम केंद्र के साथ टकराव नहीं चाहते. अब उमर ने जम्मू कश्मीर विधानसभा में डिप्टी स्पीकर का पद बीजेपी के लिए छोड़ दिया है. अब सवाल है कि क्या बीजेपी को डिप्टी स्पीकर का पद देकर उमर अब्दुल्ला ने दोस्ती का एक रास्ता खोल दिया है?  बीजेपी के प्रति इस नरमी के पीछे उमर अब्दुल्ला की रणनीति क्या है?

क्या उमर ने खोल दिया दोस्ती का रास्ता?

उमर अब्दुल्ला ने डिप्टी स्पीकर का पद बीजेपी को देने का फैसला लिया तो इसे दोस्ती का नया रास्ता भी बताया जाने लगा है. लोग इसे चुनाव नतीजों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के रिश्तों में आई तल्खी, कांग्रेस के उमर कैबिनेट से बाहर रहने के फैसले से जोड़कर इसे अब्दुल्ला परिवार के एनडीए में शामिल होने की दिशा में बढ़ाया गया कदम भी बता रहे हैं.

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हालांकि, जानकारों का नजरिया कुछ और ही है. जानकार इसे बीजेपी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी नहीं वाली राह पर चलने का संकेत बता रहे हैं. यह भी कुछ वैसा ही है जैसा उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि हम किसी के साथ टकराव नहीं चाहते. हम जम्मू कश्मीर की अवाम की बेहतरी के लिए सभी के साथ मिलजुल कर काम करना चाहते हैं.

जम्मू कश्मीर विधानसभा के लिए हुए हालिया चुनाव में जिस तरह के नतीजे रहे, उसे देखकर भी ऐसा लगता नहीं है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस केंद्र की सत्ता पर काबिज बीजेपी के साथ गठबंधन का रिस्क लेगी. हालिया चुनाव में महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को 2014 में बीजेपी से गठबंधन कर सरकार बनाने का खामियाजा घाटी में एंटी बीजेपी सेंटीमेंट का नुकसान उठाकर भुगतना पड़ा.

नैरेटिव काउंटर करने में सफल रहा था अब्दुल्ला परिवार

पीडीपी महज तीन सीटें ही जीत सकी. घाटी में इस तरह का नैरेटिव चला कि पीडीपी अधिक सीटें जीतने में सफल रही तो वह बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना सकती है. बीजेपी के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस के सरकार बनाने के कयास भी कम नहीं थे. नेशनल कॉन्फ्रेंस को बीजेपी की बी टीम तक कहा गया लेकिन अब्दुल्ला परिवार ने चुनाव से पहले ही कांग्रेस के साथ गठबंधन कर इस नैरेटिव को सेट होने से पहले ही काउंटर करने में सफलता पा ली.

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अब्दुल्ला परिवार की पार्टी घाटी की जनता को यह भरोसा दिलाने में सफल रही थी कि वह कम से कम बीजेपी के साथ नहीं जाएगी. उमर अब्दुल्ला नेशनल कॉन्फ्रेंस की जीत के बाद से ही फूंक-फूंक कर कदम रखते नजर आ रहे हैं. केंद्र के साथ टकराव की राह पर नहीं बढ़ने की बात हो या उनका बड़गाम सीट से इस्तीफा देने के बाद यह कहना कि अब पुश्तैनी सीट छोड़कर बाहर नहीं जाएंगे, यही दर्शाते हैं. ऐसे में वह बीजेपी के साथ जाने का फैसला लेंगे, इसके आसार ना के बराबर ही हैं.

आखिर उमर अब्दुल्ला की रणनीति क्या है?

अब सवाल ये भी है कि जब बीजेपी के साथ गठबंधन करना नहीं है तो फिर उमर अब्दुल्ला की इसके पीछे रणनीति क्या है? इसके पीछे चार कारण मुख्य बताए जा रहे हैं. उमर अब्दुल्ला के सीएम पद संभालने के बाद संकेतों की पॉलिटिक्स को चार पॉइंट में समझा जा सकता है.

1- फ्यूचर पॉलिटिक्स पर ध्यान

उमर अब्दुल्ला ने जब से जम्मू कश्मीर की सत्ता संभाली है, उनका पूरा ध्यान भविष्य की राजनीति पर है. उमर अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर की सत्ता पर अंगद के पैर की तरह जमा लेना चाहते हैं और इसकी झलक उनके बयानों और फैसलों में भी झलक रहा है. उमर अब्दुल्ला जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के मुद्दे को जिंदा रखने की बात करते हैं तो उसके पीछे भी यही रणनीति है कि पांच साल बाद वह जब जनता के बीच दोबारा जाएं तो इसकी वापसी नहीं होने को लेकर सवालों से उनका सामना न हो. वह जम्मू कश्मीर के विकास से जुड़े वादों पर काम कर वादे पूरे करने वाली सरकार की इमेज बनाना चाहते हैं और इसके लिए केंद्र से तालमेल जरूरी है. बीजेपी के लिए डिप्टी स्पीकर का पद छोड़ना तालमेल बेहतर करने की पहल के रूप में भी देखा जा रहा है.

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2- कांग्रेस के लिए संकेत क्या

उमर अब्दुल्ला की अगुवाई वाली सरकार के पास 55 विधायकों का समर्थन है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के 42 विधायक हैं जबकि उसकी गठबंधन सहयोगी कांग्रेस के छह, लेफ्ट के एक. आम आदमी पार्टी के एक और पांच निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी उमर अब्दुल्ला सरकार को हासिल है. घाटी की सियासत के लिए कांग्रेस का साथ जरूरी है लेकिन उमर अब्दुल्ला की सरकार चलाने के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन की सहयोगी पर निर्भरता नहीं है.

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चर्चा यह भी है कि कांग्रेस डिप्टी स्पीकर पद के लिए दावेदारी कर रही थी. सहयोगी को न देकर यह पद विपक्षी पार्टी को देने का निर्णय उमर अब्दुल्ला की ओर से इस बात का स्पष्ट संकेत भी बताया जा रहा है कि वे सहयोगियों के दबाव में काम नहीं करेंगे.

3- घाटी में डैमेज से बचने के लिए संकेत

उमर अब्दुल्ला के शपथग्रहण से पहले कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस में कैबिनेट बर्थ को लेकर ठन गई. कांग्रेस ने सरकार में शामिल न होकर बाहर से समर्थन का ऐलान कर दिया. कांग्रेस के सरकार से बाहर रहने से गठबंधन के भविष्य को लेकर भी कयासों का दौर शुरू हो गया था. उमर अब्दुल्ला ने अपनी सरकार में चार मंत्रियों के पद रिक्त रखे तो इसे कांग्रेस के दूर होने की स्थिति में कहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस की बीजेपी से करीबी की बातें ना शुरू हो जाएं, इससे बचने की रणनीति से जोड़कर ही देखा गया. 

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4- टकराव का ठीकरा बीजेपी पर

नेशनल पॉलिटिक्स की बात करें तो विपक्षी पार्टियों का गठबंधन इंडिया ब्लॉक संविधान को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर रहा है. इंडिया ब्लॉक के दल बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार संसदीय परंपराओं के उल्लंघन का भी आरोप लगाते हैं. नवगठित लोकसभा के पहले सत्र में विपक्ष ने स्पीकर चुनाव में उम्मीदवार उतारा तो इसके पीछे भी डिप्टी स्पीकर पद को लेकर सत्ता पक्ष से आश्वासन का नहीं मिलना ही था. उमर अब्दुल्ला का यह कदम इंडिया ब्लॉक की इसे लेकर मुखरता के लिए मंच तैयार करेगा. अगर भविष्य में केंद्र सरकार के साथ टकराव की नौबत आती है तो उमर अब्दुल्ला अपने इस दांव के जरिये उस स्थिति में आ गए हैं कि सीधे-सीधे बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा सकें.

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