चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) कांग्रेस का 'हाथ' थामकर अपनी नई सियासी पारी का आगाज कर सकते हैं. पीके ने शनिवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और वरिष्ठ नेताओं के सामने 2024 में जीत की रणनीति पर रोडमैप रखा, जिस पर कांग्रेस नेताओं का एक ग्रुप एक हफ्ते के भीतर अपनी रिपोर्ट देगा. इसी के बाद ही उनके कांग्रेस में एंट्री की रूपरेखा तय होगी. ऐसे में प्रशांत किशोर अगर कांग्रेस का दामन थामते हैं तो कितने दिनों तक पार्टी में टिक पाएंगे, ये भी सवाल है. पीके के सियासी अतीत और कांग्रेस पार्टी की कार्यशैली को देखते हुए यह सवाल उठ रहे हैं.
दरअसल, कांग्रेस के इतिहास में पहली बार किसी एक व्यक्ति को लेकर ऐसी कवायद हो रही है. इससे साफ पता चलता है कि कांग्रेस नेतृत्व अब पुराने ढर्रे से पार्टी को निकालकर उसके तौर तरीकों, संगठनात्मक ढांचे और रणनीति में आमूलचूल बदलाव करने की दिशा में अपने कदम बढ़ा रही है. ऐसे में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अगर कांग्रेस में शामिल होते हैं तो पार्टी में अपना पैर कितना जमा पाएंगे और किस तरह से भूमिका अदा करेंगे?
पीके की कांग्रेस में एंट्री की उठती रही बात
प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा तो करीब साल भर से चल रही हैं, लेकिन इस पर कोई ठोस फैसला अभी तक नहीं हो पाया. सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ कई बार बैठक कर चुके हैं, लेकिन अब एक बार फिर से उनके कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा है. पीके कांग्रेस में कब और कैसे शामिल होंगे, इस पर अभी तक तस्वीर अभी साफ नहीं है. इससे पहले पांच राज्यों के चुनाव से पहले पीके के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चाएं तेज हुई थी, लेकिन बात नहीं बन सकी.
राहुल से सोनिया तक पीके के सवाल
प्रशांत किशोर और कांग्रेस की राह अलग-अलग हो गई थी. इसी के बाद पीके ने गोवा में एक कार्यक्रम में राहुल गांधी पर निशाना साधा था. पीके ने कहा था कि बीजेपी कई दशकों तक कहीं जाने वाली नहीं है और राहुल गांधी के साथ समस्या यह है कि उन्हें लगता है कि ये बस कुछ समय की बात है और लोग खुद ही नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर कर देंगे. इतना ही नहीं पीके ने यह भी कहा था कि कांग्रेस को यूपीए के अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए, क्योंकि पूरे विपक्ष का मतलब कांग्रेस नहीं है, उसमें और भी पार्टियां हैं. इसलिए उन्हें साथ मिलकर तय करना चाहिए कि अध्यक्ष कौन होगा? कांग्रेस को हटकर दूसरे को मौका देना चाहिए.
पीके ने कहा था, कांग्रेस ने 1984 के बाद कोई भी आम चुनाव नहीं जीती है बल्कि गठबंधन के सहारे सरकार चलाई है.' साथ ही कहा था कि कांग्रेस जिसके नेतृत्व में पिछले 10 साल से चुनाव लड़े गए हैं और 90 फीसदी में हार मिली है. अब जो भी लीडर था, नैतिकता और रणनीतिक भावना यह कहती है कि आप दूर हो जाएं और किसी और को मौका दें. पीके ने सीधे तौर पर राहुल गांधी और सोनिया पर सवाल खड़े किए थे, क्योंकि कांग्रेस की कमान इन्हीं दोनों नेताओं के पास रही है. यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी है.
पीके का कांग्रेस के साथ पुराने रिश्ते की कड़वाहट
प्रशांत किशोर की राहुल गांधी के साथ पहली मुलाकात साल 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में हुई थी, जिसे पीके ने खुद आजतक के इंटरव्यू में बताया था. इस दौरान दोनों लोगों के बीच कोई बहुत लंबी बात नहीं हुई थी, लेकिन राहुल गांधी ने प्रशांत किशोर से उत्तर प्रदेश को लेकर सलाह मांगी थी और कांग्रेस के लिए 2017 के चुनाव में काम करने के लिए भी बोला था. पीके ने अपनी टीम के साथ सलाह-मशवरा करके कांग्रेस के लिए 2017 में चुनावी रणनीति के लिए काम किया था और साथ ही पंजाब की भी जिम्मेदारी ली थी.
प्रशांत किशोर ने 2017 के यूपी चुनाव में प्रियंका गांधी को चेहरा बनाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने आपत्ति जता दी थी. इसके बाद पीके के कहने पर ही कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, लेकिन नतीजे बहुत ही खराब रहे. कांग्रेस अपने पुराने रिकार्ड से भी कम हो गई जबकि पंजाब में अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में सत्ता में आई. पंजाब में कांग्रेस की जीत का श्रेय अमरिंदर सिंह को गया. उत्तर प्रदेश में पीके के सियासी प्रयोग की कड़वाहट कांग्रेस में अभी भी है, जिसे लेकर पार्टी में उस समय भी सवाल खड़े हुए थे और अब जब पीके को लेकर बात होती है तो 2017 के सियासी हश्र को जरूर याद दिलाया जाता है.
पंजाब चुनाव में पीके ने साथ छोड़ा
पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए चुनावी रणनीति बनाने के लिए राजी हुए थे. पीके ने पंजाब में कांग्रेस की कमान भी संभाल ली थी और अमरिंदर सिंह ने उन्हें सलाहकार नियुक्त किया था. कुछ दिनों के बाद ही पीके ने अपने पद से इस्तीफा देकर हाथ खड़े कर दिए थे. प्रशांत किशोर ने पंजाब कांग्रेस की मौजूदा हालत को देखते हुए कैप्टन से सलाहकार के रूप में काम करने से इनकार कर दिया था. कांग्रेस में गुटबाजी के चलते पीके अपनी रणनीति को लागू नहीं करा सके और चुनाव से ठीक पहले उन्होंने साथ छोड़ दिया. इतना ही नही उन्होंने कांग्रेस के तमाम विधायकों को चंडीगढ़ बुलाकर पूछताछ की थी और मौजूदा विधायकों में से कौन-कौन दोबारा टिकट दिए जाने लायक हैं, इसकी रिपोर्ट बनाई थी, जिसके बाद कांग्रेस विधायकों में भारी नाराजगी पीके के खिलाफ फैल गई थी. इसके बाद प्रशांत किशोर ने पंजाब कांग्रेस के नेताओं से दूरी बना ली थी.
जेडीयू के साथ लंबा सफर तय नहीं कर सके
प्रशांत किशोर ने 2014 में नरेंद्र मोदी के लिए चुनावी रणनीति बनाने का काम किया था, जिसके बाद सुर्खियों में आए थे. बीजेपी की 2014 के जीत में पीके ही अहम भूमिका रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी के पीएम बनते ही बीजेपी के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए. इसके बाद जेडीयू के बाद बिहार चुनाव के दौरान जेडीयू के करीब आए और 2015 के बाद सक्रिय रूप से सियासत में कदम रखा. 2018 में पूरे रुतबे और रसूख के साथ प्रशांत किशोर की जेडीयू में एंट्री हुई थी. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को बिल्कुल अपने बगल में दाहिनी ओर बिठाकर पार्टी की सदस्यता दिलवाई थी. जेडीयू में उन्हें शामिल करने का ऐलान करते हुए नीतीश कुमार ने पीके को पार्टी का 'भविष्य' बताया था. जेडीयू में शामिल होने के एक महीने के भीतर ही प्रशांत किशोर को पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया गया था, जिससे पार्टी के भीतर हलचल मच गई थी. नीतीश कुमार ने ललन सिंह और आरसीपी सिंह जैसे बड़े और भरोसेमंद नेताओं को किनारे कर प्रशांत किशोर को चुना था.
2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच सीट बंटवारे में पीके की अहम भूमिका रही. हालांकि इन सबके बावजूद भी पार्टी के भीतर प्रशांत किशोर को लेकर एक अस्वीकार्यता की स्थिति लगातार बनी रही. प्रशांत किशोर के लिए उस वक्त मुश्किल स्थिति सामने आ गई, जब उनकी कंपनी आईपैक ने जुलाई 2019 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति बनाने की कमान संभाली. इसके बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव में प्रशांत किशोर ने आम आदमी पार्टी के लिए रणनीति बनाने के जिम्मेदारी संभाल ली. इसी के बाद पीके और पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ नीतीश कुमार से भी दूरी बढ़ने लगी.
इसी बीच सीएए और एनआरसी पर जेडीयू के स्टैंड से अलग जाकर पीके ने ट्वीट किया, जिसके प्रशांत किशोर ने एक पुराना वीडियो भी शेयर कर दिया, जिसमें वो नीतीश कुमार की आलोचना करते दिख रहे थे. इसके बाद नीतीश कुमार ने भी प्रशांत किशोर के सवाल पर दो टूक कह दिया- प्रशांत किशोर को अमित शाह के कहने पर पार्टी में शामिल किया था. लेकिन अब वो दूसरी पार्टियों के लिए रणनीति बना रहे हैं. उन्हें कहीं और जाने की महत्वाकांक्षा है. वो कहीं भी जा सकते हैं. इसके जवाब में प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को झूठा बताया और जेडीयू से नाता तोड़ लिया. इसके बाद उन्होंने बिहार में नया राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कवायद शुरू की, लेकिन कांग्रेस में शामिल होने के लिए हाथ-पैर मारते दिखे.
कांग्रेस में एंट्री के लिए बढ़ा रहे अपना कदम
प्रशांत किशोर को कांग्रेस में शामिल करने का तानाबाना बुना जा रहा है, जिसके लिए पिछले एक साल से लगातार कवायद हो रही है. पीके चाहते हैं कि देश में बीजेपी के मुकाबले एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष ताकत मजबूती से खड़ी हो और वह ताकत सिर्फ कांग्रेस ही हो सकती है, क्योंकि वही एक ऐसी पार्टी है जो अपनी तमाम कमजोरियों और पराजयों के बावजूद आज भी अखिल भारतीय स्तर पर सिर्फ मौजूद है बल्कि अपनी लंबी राजनीतिक परंपरा समृद्ध वैचारिक विरासत के साथ जनता को बीजेपी का लोकतांत्रिक विकल्प दे सकती है. प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल उनको दिए जाने वाले पद और भूमिका को लेकर वरिष्ठ नेताओं के बीच आम राय नहीं बन पा रही. सूत्रों मुताबिक प्रशांत किशोर कांग्रेस में अहमद पटेल की तरह बड़ी भूमिका चाहते हैं, जिसके लिए राय नहीं बन पा रही.
कांग्रेस में हाईकमान कल्चर है
कांग्रेस में हाईकमान कल्चर है, जिसके तहत सारे निर्णय गांधी परिवार के पास है. ऐसे में पार्टी नेताओं की गांधी परिवार के प्रति वफादारी ही पार्टी के प्रति सच्ची निष्ठा मानी जाती है. ऐसे में पीके कांग्रेस में शामिल होते हैं तो उनके सामने भी पार्टी के हाईकमान कल्चर को ही आत्मसात करना होगा, जिसके अगर नहीं करते हैं तो कांग्रेस के साथ वो लंबी अपनी सियासी पारी को आगे नहीं बढ़ा पाएंगे. ऐसे में पीके को कांग्रेस के साथ-साथ गांधी परिवार के प्रति भी ईमानदारी दिखानी होगी और अपने हर फैसले से पहले हाईकमान की स्वीकृत भी लेनी होगी. ऐसे में प्रशांत किशोर कांग्रेस के इस कल्चर में खुद को ढाल पाएंगे यह बड़ी चुनौती है.
कांग्रेस नेताओं के बीच संतुलन बनाना
कांग्रेस में कई वरिष्ठ नेता हैं, जिनके अपने-अपने गुट हैं. कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रशांत किशोर को कांग्रेस में शामिल होने की दिशा में सहमत नहीं दिख रहे हैं. खासकर जी-23 के नेता, जो कतई तैयार नहीं है कि किसी गैर-राजनीतिक व्यक्ति के हाथों में पार्टी की अहम जिम्मेदारी दी जाए.
ऐसे में कांग्रेस में प्रशांत किशोर कैसे खुद को एडजस्ट कर पाएंगे और अगर कर ले जाते हैं तो कितने लंबी पारी खेलेंगे, यह बड़ा सवाल है, क्योंकि वो न तो जेडीयू के साथ अपनी सियासी पारी को बहुत आगे बढ़ा सकें और न ही कांग्रेस के साथ उनकी अभी तक सहमति बन पाई है?