राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर औपचारिक घोषणा हो चुकी है, जिसके बाद नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. ऐसे में क्या आप जानते हैं राष्ट्रपति पद के चुनाव में विधायक या सांसद जो वोट करेंगे, उस वोट की वैल्यू मौजूदा जनगणना पर नहीं बल्कि 1971 की जनगणना के आधार पर तय की जाती है. 1971 से लेकर अब तक इन 51 सालों में देश की आबादी करीब ढाई गुना बढ़ गई. इस दौरान चार बार जनगणना भी हो चुकी है. अगर ये 1971 की जगह ताजा जनगणना के आधार पर हों, तो पूरी तस्वीर ही पलट सकती है.
1971 की जनगणना के आधार पर राष्ट्रपति चुनाव में वोटों की वैल्यू के नियम को मानें इसलिए संविधान में संशोधन तक कर दिया गया. इस संविधान संशोधन के पीछे दक्षिण भारत के राज्यों की नाराजगी भी एक वजह है. इनकी नाराजगी किस बात पर थी, इसे समझने के लिए मैं आपको 1950 के दौर में ले चलता हूं, जब देश गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आजादी की हवा में सांस ले रहा था, लेकिन उस समय देश के रहनुमाओं के सामने देश को खड़ा करने के साथ-साथ कई समस्याओं को दूर करने की चुनौतियां थीं. इनमें एक सबसे बड़ी चुनौती देश की बढ़ती आबादी थी.
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आबादी के सिद्धांत की ऐसे तैयार हुई भूमिका
समस्या बड़ी थी इसलिए बिना समय गंवाए 1950 के दशक में ही राज्य प्रायोजित परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू कर दिया गया. भारत ऐसा करने वाला विकासशील देशों में पहला देश था. जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से लागू करने में दक्षिण भारत के राज्य उत्तर भारत के राज्यों से आगे निकलने लगे. वहां, 60 के दशक में ही जनसंख्या नियंत्रित होने लगी. इसके बाद ऐसी दिक्कत आई, जिसने संविधान में लिखे आबादी के सिद्धांत को ही खारिज कर दिया.
1971 की जनगणना प्रकाशित होने के बाद दक्षिण भारत के नेताओं का प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने अपनी एक समस्या लेकर पहुंचा. उन्होंने कहा कि हम लगातार राज्यों की आबादी पर नियंत्रण कर रहे हैं, लेकिन उत्तर भारत के बीमारू राज्य जनसंख्या नियंत्रण के लिए संजीदा नहीं दिखाई दे रहे हैं. यहां आबादी बढ़ती जा रही है. ऐसे में देखा जाए तो जिस राज्य की आबादी जितनी ज्यादा है, वहां के विधायकों के वोटों की वैल्यू उतनी ही ज्यादा है. ऐसे में वे राज्य जो आबादी पर नियंत्रण कर रहे हैं, उन्हें राष्ट्रपति चुनाव में इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा.
तब इंदिरा गांधी ने किया 42वां संविधान संशोधन
दक्षिण भारत से उठ रही आवाजों को शांत करने के लिए इंदिरा गांधी ने 1976 में संविधान में 42वां संशोधन कर दिया. इसे ही 'मिनी-संविधान' कहा जाता है. इसमें दो बड़े बदलाव किए गए. पहला- जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को समवर्ती सूची में शामिल कर दिया गया. दूसरा- अनुच्छेद 55 में लिख दिया गया कि साल 2000 के बाद पहली जनगणना के निष्कर्ष आने तक राष्ट्रपति चुनाव के लिए 1971 की जनगणना ही मान्य होगी.
अटल सरकार ने इसे 2026 तक बढ़ा दिया
मिनी संविधान के प्रावधानों का पालन करते हुए करीब 30 साल बीत गए थे. संविधान में तय की गई वर्ष 2000 की मियाद भी पूरी हो गई थी. तब उस समय केंद्र में एनडीए की सरकार की थी. अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता की बागडोर संभाल रहे थे और उन्हीं के कार्यकाल में 2001 में जनगणना हुई.
जनगणना के साथ ही साल 2001 में बहस शुरू हुई कि बढ़ती आबादी के मद्देनजर राष्ट्रपति चुनाव का आधार भी नई जनसंख्या को बनाया जाए, लेकिन उस वक्त केंद्र में काबिज अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने संविधान में संशोधन कर बहस पर रोक लगा दी. दरअसल परिवार नियोजन कार्यक्रम से जो उम्मीद की गई थी, वह उतनी कारगर नहीं थी.
दक्षिण भारतीयों की जो समस्या 1971 से पहले थी, वह अभी भी दिख रही थी. नई व्यवस्था लागू करते तो असंतुलन पैदा हो जाता और इससे राजनीतिक अशांति इसलिए नई जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने से पहले ही सरकार ने 84वां संविधान संशोधन कर दिया. कहा गया कि देश के विभिन्न हिस्सों में परिवार नियोजन कार्यक्रमों की प्रगति को देखते हुए और राष्ट्रीय जनसंख्या नीति रणनीति के अनुसार अब 2026 तक पुनर्समायोजन पर रोक लगाने का फैसला हुआ है. इस तरह 2026 तक राष्ट्रपति का चुनाव 1971 की जनगणना के आंकड़े के लिहाज होगी.
2027 का चुनाव भी मौजूदा व्यवस्था पर होगा
देश में जनगणना हर 10 साल के बाद होती है. 2011 के बाद 2021 में होनी थी, लेकिन कोरोना के चलते देश में जनगणना की प्रक्रिया इस साल होगी. इस लिहाज से अगली जनगणना साल 2031-32 में होगी. ऐसे में 2033 में जब राष्ट्रपति का चुनाव होगा तो 2031 की जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद भी व्यवस्था में बदलाव होगा. इस साल 2022 ही नहीं बल्कि 2027 में भी राष्ट्रपति का चुनाव 1971 की आबादी के आधार पर ही होंगे.
अगर 2011 की जनगणना लागू होती तो...
अगर साल 1971 की जगह 2011 की जनगणना के आधार पर देश में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे होते तो भी उत्तरी राज्यों के विधायकों के वोट और दक्षिणी राज्यों के विधायकों के वोटों में बहुत असमानता देखने को मिलती.
गृहमंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 1971 में यूपी के एक विधायक की वोट की वैल्यू 208 है, जो 2011 में बढ़कर (19,98,12,341/403/1000)=496 हो जाती. इसी तरह पंजाब में 116 से बढ़कर (2,77,43,338/117/1000)=237, हरियाणा में 112 से बढ़कर (2,53,51,462/90/1000)=282, मध्यप्रदेश में 131 से बढ़कर (7,26,26,809/230/1000)=316, दिल्ली में 58 से बढ़कर (1,67,87,941/70/1000)=240, राजस्थान में 129 से बढ़कर (6,85,48,437/200/1000)=343 और बिहार में 173 से बढ़कर (10,40,99,452/243/1000)=428 हो जाती.
वहीं, दक्षिण भारत के राज्यों को देखा जाए तो कर्नाटक में एक विधायक के वोट की वैल्यू 131 है, जो (6,10,95,297/224/1000)=273 तक पहुंची. तमिलनाडु में 176 से बढ़कर (7,21,47,030/234/1000)=308, केरल में 152 से बढ़कर (3,34,06,061/140/1000)=239 और पुडुचेरी में 16 से (12,47,953/30/1000)=42 हो पाती. इससे साफ है कि आबादी को लेकर जो दो संविधान संशोधन किए गए थे, उसका कुछ खास असर नहीं रहा. दक्षिण और उत्तर के राज्यों में आबादी को लेकर वैसी ही असमानता बनी हुई है.
आबादी के आधार पर ऐसे तय होती है वोट की वैल्यू
देश में किसी प्रदेश के विधायक के पास कितने मत हैं, इसके लिए 1971 के लिहाज से उस राज्य की जनसंख्या को वहां की कुल विधानसभा सदस्यों की संख्या से डिवाइड (भाग) करते हैं. इसके बाद जो नंबर आता है उसे फिर 1000 से डिवाइड किया जाता है. इसके बाद जो अंक प्राप्त होता है, वही प्रदेश के एक विधायक के वोट की वैल्यू होती है.
उदाहारण के तौर पर यूपी विधानसभा के कुल 403 विधायक है. यहां की जनसंख्या 1971 के हिसाब से 83849905 है.
इस तरह से यूपी में एक वोट की वैल्यू (83849905/403/1000=208) निकेलगी. इस तरह 208 को 403 से गुणा कर दें तो यूपी के सभी 403 विधायकों के वोटों का कुल मूल्य 83824 आएगा. देश भर में कुल विधायकों की संख्या 4033 है, जिनके वोटों का कुल वैल्यू 543231 होगा.
वहीं, सांसदों के मतों का मूल्य जानना थोड़ा आसान है. देश के सभी विधायकों के वोटों का जो मूल्य आएगा उसे लोकसभा और राज्यसभा सांसदों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. फिर जो अंक हासिल होता है वही एक सांसद के वोट का मूल्य होता है. अगर इस तरह भाग देने पर शेष 0.5 से ज्यादा बचता हो तो वेटेज में एक का इजाफा हो जाता है. यानी एक सांसद के वोट की वैल्यू 708 होती है.
यानी राज्यसभा और लोकसभा के कुल 776 सांसद हैं, जिनके वोटों की वैल्यू कुल 549408 है. इस तरह राष्ट्रपति चुनाव में विधायक-राज्यसभा-लोकसभा सदस्यों के कुल वोट की वैल्यू 1086431 होगी और राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए कम से कम 5,43,216 वोट चाहिए होंगे.