राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आज गुरुवार को आएंगे, जिसके लिए संसद भवन में सुबह 11 बजे से काउंटिंग होगी. एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू और विपक्ष की ओर से प्रत्याशी यशवंत सिन्हा के बीच फैसला होगा. द्रौपदी मुर्मू अगर चुनाव जीतने में सफल रहती हैं तो वो देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति होंगी. हालांकि, मुर्मू के पक्ष में जिस तरह से कई विपक्षी दलों ने पार्टी लाइन से उठकर वोट किए हैं, उससे उनका जीतना तय माना जा रहा. ऐसे में देखना है कि द्रौपदी मुर्मू क्या रामनाथ कोविंद को मिले वोटों का रिकार्ड तोड़ पाएंगी या नहीं?
बता दें कि देश के 15वें राष्ट्रपति के चुनाव के लिए 99.18 प्रतिशत मतदान हुए थे. बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के अलावा कई विपक्षी दलों का भी द्रौपदी मुर्मू को साथ मिला. शिवसेना, बसपा, बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, टीडीपी, जनता दल (एस), जेएमएम, सुभासपा सहित कई विपक्षी दलों ने मुर्मू के पक्ष में वोट किया. इसके अलावा कांग्रेस, एनसीपी और सपा की ओर से भी क्रॉस वोटिंग हुई. ऐसे में मुर्मू की जीत की संभावना पूरी है, लेकिन वोट कितने मिलेंगे यह देखना होगा.
रामनाथ कोविंद को मिले थे 66 फीसदी वोट
बता दें कि 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी गठबंधन ने बिहार के तत्कालीन राज्यपाल और दलित चेहरे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया तो विपक्ष ने मीरा कुमार को मैदान में उतारा था. राष्ट्रपति चुनाव में 10,98,903 मूल्य के वोटों में से रामनाथ कोविंद को 7,02,044 मत हासिल हुए थे जबकि मीरा कुमार को 3,67,314 वोट मिले थे. रामनाथ कोविंद 66 फीसदी वोट के साथ देश के सर्वोच्च पद पर विराजामान हुए थे. वहीं विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 34 फीसदी वोट के साथ संतोष करना पड़ा था.
मुर्मू क्या तोड़ पाएंगी कोविंद का रिकार्ड?
वहीं, इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को जिस तरह से विपक्षी दलों का साथ मिला है, उससे तो उनकी जीत तय है. राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए के पास 5.26 लाख वोट हैं, जिनमें बीजेपी के साथ जेडीयू, एआईएडीएमके, अपना दल (एस), एलजेपी, एनपीपी, निषाद पार्टी, एनपीएफ और एमएनएफ छोटे दल शामिल हैं. ये वोट मिलना तय है.
वहीं, विपक्षी खेमे से जिस तरह द्रौपदी मुर्मू को वोट मिले हैं, उससे द्रौपदी मुर्मू को 62 फीसदी से भी ज्यादा वोट मिलने के आसार है. इसके अलावा यशवंत सिन्हा को समर्थन करने वाले दलों से भी क्रॉस वोटिंग हुई है, जिसका आंकड़े मतगणना में साफ हो सकेंगे. इसकी वजह यह है कि राष्ट्रपति चुनाव में गुप्त मतदान होता है. ऐसे में सभी लोगों की नजर इस बात पर है कि 2017 में रामनाथ कोविंद को मिले वोट से क्या द्रौपदी मुर्मू ज्यादा हासिल कर पाती हैं.
नतीजे 2024 चुनाव की पठकथा लिखेंगे
राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू की जीत एनडीए के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव की पठकथा भी लिखेगा. मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता की कोशिशों को भी झटका लगेगा. 2014 के बाद से लगातार विपक्ष की ओर से कई बार कोशिश की जाती है कि विपक्ष एकजुट दिखे, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है. संसदीय चुनाव में भी नहीं हो पाया और राष्ट्रपति चुनाव में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला. राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के सामने विपक्ष ने यशवंत सिन्हा को बतौर अपना उम्मीदवार तो उतारा है, लेकिन समर्थन को लेकर कई दल पीछे हट गए.
विपक्षी एकता पर खड़े होंगे सवाल?
एनडीए की ओर से मुर्मू के रूप में आदिवासी कार्ड चलने से राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकता में जबरदस्त तरीके से फूट पड़ी है. बसपा से लेकर बीजेडी, वाईएसआर कांग्रेस, जेएमएम, शिवसेना, सुभासपा, जनता दल (एस), शिरोमणि अकाली दल, टीडीपी जैसी कई विपक्षी पार्टियां एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में खड़ी नजर आईं. ऐसे में एक बार फिर से साबित हो गया कि बीजेपी और मोदी के खिलाफ विपक्षी एकता का दांव काम नहीं आया, जिसका 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी असर दिखेगा. इतना ही नहीं आदिवासी समुदाय के बीच भी बीजेपी को अपना सियासी आधार बढ़ाने का मौका मिल गया है.
आदिवासी वोटों पर पड़ेगा सियासी प्रभाव
राष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी ने द्रौपदी मुर्मू को बहुत सोच-समझकर उम्मीदवार बनाया है. असल में मुर्मू के बहाने बीजेपी की निगाह देशभर के आदिवासी सीटों पर है. बीजेपी लंबे समय से खुद को आदिवासियों की सबसे भरोसेमंद पार्टी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है.. देश में अनुसूचित जनजाति की आबादी 8.9 फीसदी है, कई राज्यों में तो सियासी खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं.
देश की 47 लोकसभा सीटें और 487 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. हालांकि, सियासी तौर पर आदिवासी समुदाय का असर इससे कहीं ज्यादा है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इन 47 आरक्षित सीटों में से 31 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन विधानसभा चुनाव में कई राज्यों में आदिवासी वोटों की नाराजगी के चलते नुकसान भी उठाना पड़ा था. खासकर झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात में है, जिनमें से झारखंड को छोड़कर बाकी राज्यों 2024 से पहले चुनाव होने हैं.
बीजेपी के राष्ट्रपति चुनाव में आदिवासी कार्ड को सियासी तौर पर अपने राजनीतिक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत जाती हैं तो 2024 के चुनाव में बीजेपी को आदिवासी बेल्ट में सियासी तौर पर फायदा मिल सकता है. आगामी महीनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं जहां आदिवासी वोटर्स अहम भूमिका निभा सकते हैं. कांग्रेस ने आदिवासी समुदाय के लिए रिजर्व 128 सीटों में से 86 पर जीत हासिल की थी. ऐसे में बीजेपी लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में भी सियासी फायदा मिल लाभ उठाने की कोशिश करेगी.