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ममता बुलाएं या राहुल गांधी, BSP क्यों नहीं बनती विपक्षी जमावड़े का हिस्सा?

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी से लेकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तक इन दिनों विपक्षी दल के नेताओं को नरेंद्र मोदी के खिलाफ एकजुट करने की कवायद में है. बीजेपी विरोधी ज्यादातर दल एकसाथ खड़े दिखाई दे रहे हैं, लेकिन बसपा प्रमुख मायावती इस विपक्षी एकजुटता से दूरी बनाए हुए हैं. 

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सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी, राहुल गांधी (फाइल फोटो)
सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी, राहुल गांधी (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • राहुल गांधी की बैठक में 15 विपक्षी दल के नेता शामिल
  • मोदी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में जुटी ममता
  • विपक्षी एकजुटता से मायावती ने बनाई दूरी

मोदी सरकार को संसद से लेकर सड़क तक घेरने के लिए विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशें तेज हो गई हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में दिल्ली दौरे पर सोनिया गांधी और शरद पवार सहित तमाम विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मुलाकात कर उन्हें मोदी सरकार के खिलाफ एक साथ आने की गुहार लगाई. वहीं, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी इन दिनों विपक्षी दल के नेताओं को मोदी के खिलाफ एक मंच पर लाने में जुटे हैं. बीजेपी विरोधी ज्यादातर दल इसमें ममता और राहुल के साथ भी खड़े दिखाई दे रहे है, लेकिन बसपा प्रमुख मायावती इस विपक्षी एकजुटता से दूरी बनाए हुए हैं. 

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राहुल की बैठक में बसपा नहीं हुई शामिल

राहुल गांधी ने मंगलवार को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में विपक्षी दलों को नाश्ते पर बुलाया है. ये राहुल की विपक्षी दलों को पेगासस जासूसी मामले और कृषि कानूनों के मुद्दे पर एकजुट करने की कोशिश है. टीएमसी, एनसीपी, सपा, आरजेडी, लेफ्ट पार्टियां, इंडियन मुस्लिम लीग, आरएसपी सहित 15 दलों के नेता इसमें शामिल भी हुए. इससे पहले राहुल गांधी ने 14 विपक्षी दलों के नेताओं के साथ प्रेस को संबोधित किया था और मोदी सरकार को घेरा था.

इससे पहले, पश्चिम बंगाल की चुनावी जंग फतह करने के बाद तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी भी दिल्ली आईं तो अपने पांच दिवसीय दौरे पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी से लेकर शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, संजय राउत सहित तमाम विपक्षी नेताओं के साथ मुलाकात की. 

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ममता ने कहा था कि बीमारी का इलाज जल्दी शुरू करना होगा, नहीं तो देर हो जाएगी. बीजेपी बहुत मजबूत पार्टी है. ऐसे में कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों पर भरोसा करना होगा और क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस पर. हालांकि दिलचस्प बात ये है कि मायावती विपक्ष के इन दोनों ही नेताओं की कवायद से दूरी बनाए हुए हैं. 

विपक्षी नेताओं के मंच से मायावती की दूरी

साल 2018 में कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार के शपथ समारोह में शामिल होने के बाद से बसपा प्रमुख मायावती विपक्षी एकजुटता के किसी भी मंच पर नजर नहीं आईं. फिर चाहे कांग्रेस की तरफ से विपक्षी एकता की कवायद हुई हो आ फिर फिर किसी अन्य क्षेत्रीय दल के द्वारा. सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर कांग्रेस ने विपक्षी दल के साथ बैठक की थी, जिसमें बसपा ने शामिल होने से इनकार कर दिया था. 

माना जाता है कि मायावती विपक्षी एकता दलों के साथ खड़ी होकर प्रधानमंत्री पद की खुद की दावेदारी को पीछे धकेलना नहीं चाहती. मायावती अपनी सियासत को दोबारा से परवान चढ़ाने की कवायद में है. वे देश की पहली दलित प्रधानमंत्री और दूसरी महिला प्रधानमंत्री के सपने को भरपूर हवा देना चाहती हैं, लेकिन उससे पहले वो यूपी में अपने खोए हुए सियासी जनाधार को वापस पाने की कवायद में है. इसीलिए यूपी से लेकर पंजाब तक उन्होंने सियासी बिसात बिछा रखी है. 

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मायावती का एकला चलो की नीति

दिल्ली की सत्ता का रास्ता वाया यूपी होकर ही जाता है. अगले साल फरवरी में यूपी, पंजाब, उत्तराखंड सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे मे मायावती इनों दिनों यूपी के चुनाव की तैयारियों में जुटी हैं और लखनऊ में डेरा जमा रखा है. मायावती ने साफ कर दिया है कि यूपी में किसी भी दल के साथ वो गठबंधन कर चुनावी मैदान में नहीं उतरेंगी बल्कि अपने दम पर चुनाव लड़ेंगी. बसपा ने ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए चुनावी बिगुल फूंक दिया है तो पंजाब में कांग्रेस के खिलाफ अकाली दल के साथ हाथ मिला रखा है. 

मायावती पेगासस और किसान दोनों ही मुद्दों पर बीजेपी को तो घेर रही हैं, लेकिन विपक्षी दलों के साथ खड़ी होकर किसी तरह का कोई सियासी संदेश देने से बच रही हैं. ऐसे में न तो खुद मायावती किसी विपक्षी दल की बैठक में शामिल हो रहीं है और नहीं उनके मजबूत सिपहसलार माने जाने वाले पार्टी महासचिव सतीष चंद्र मिश्रा. मायावती के निशाने पर बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दल हैं. 

राहुल और ममता के द्वारा भले ही विपक्ष एकता का दम भरा जा रहा हों, लेकिन मायावती बड़ी सावधानी के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ा रही हैं. विपक्ष के सभी नेता एक दूसरे से एकता मिलाकर अपने दावेदारी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने और खुद को सबसे बड़ा नेता साबित करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, लेकिन मायावती भी चतुर राजनीतिज्ञ मानी जाती हैं. ऐसे में वो किसी भी विपक्षी दल की लीडरशिप स्वीकार नहीं करना चाहतीं. 

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बसपा को दलित वोट छिटकने का डर 

मायावती और कांग्रेस के बीच बनी सियासी दूरी को बढ़ाने में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की महत्वपूर्ण भूमिका है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की तरफ से बसपा के साथ गठबंधन की खबरों के चर्चा में आने के बाद एकबारगी लगा था कि यूपी के अलावा भी दोनों दल साथ आ सकते हैं. लेकिन बसपा की ज्यादा सीटों की मांग ने गठबंधन नहीं होने दिया. इतना ही नहीं राजस्थान में बसपा विधायकों को कांग्रेस में मिला लेने से भी मायावती खासा नाराज है, जिसके लिए उन्होंने कोर्ट भी गई थी. 

बसपा की सियासत को करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि कांग्रेस के साथ खुलकर न आने के पीछे मायावती के अपने सियासी कारण हैं. उत्तर प्रदेश बसपा का गढ़ है. दलित समुदाय एक समय कांग्रेस का परंपरागत वोटर रहा है, लेकिन बसपा के राजनीतिक उदय के बाद दलित वोटर कांग्रेस से छिटक गए. ऐसे में मायावती को लगता है कि कांग्रेस के साथ खड़े होने पर उनका दलित वोटर कहीं छिटक न जाए. इसीलिए मायावती अक्सर अपने भाषणों में कहा करती हैं कि भाजपा-कांग्रेस की नीतियां और विचारधारा, वंचितों के खिलाफ हैं. इस तरह से मायावती कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी से भी दूरी बनाकर रहती हैं.

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