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रामविलास पासवान: दलितों का पासबां, जेपी का शिष्य और सदियों से अंधेरे घरों में दीया जलाने निकला नेता

1977 में इमरजेंसी के बाद आम चुनाव हुए तो ऑल इंडिया रेडियो की इलेक्शन कमेंट्री की एक सूचना ने सभी का ध्यान खींचा. वो सूचना थी कि पासवान ने हाजीपुर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार को सवा चार लाख को शिकस्त दी थी. इस जीत ने उनकी शख्सियत राष्ट्रीय नेता के रूप में कर दी और वे दलितों के आइकन बन गए.

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रामविलास पासवान (फाइल फोटो-इंडिया टुडे)
रामविलास पासवान (फाइल फोटो-इंडिया टुडे)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • आज रामविलास पासवान की पहली जयंती है
  • भारत की राजनीति में पासवान होने का अर्थ
  • जेपी के शिष्य लालू, नीतीश, सुशील में सीनियर थे पासवान

दलितों का पासबां, रामविलास पासवान. पासबां यानी कि रक्षक, दरबान, निरीक्षक, ड्योढ़ीबान, पहरवां. आप जो कुछ कह लें. रामविलास पासवान अपने आप को इसी रूप में देखना चाहते थे. गरीबों-पिछड़ों और समाज के हाशिये पर मौजूद लोगों के साथ खुद को खड़े. रामविलास पासवान ने अपने एक इंटरव्यू में फटेहाल-जर्जर 'बलगोबिना' डोम की कहानी बताई थी? फिर सिस्टम की पहल से समाज में उन्हें कैसे प्रतिष्ठा मिली और कैसे वो 'बालगोविंद भाय' बने इसका वृतांत भी बताया था. 

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रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) की आज पहली जयंती है. देश की आजादी से लगभग एक साल पहले 5 जुलाई 1946 को पैदा हुए रामविलास पासवान का निधन पिछले साल 8 अक्टूबर 2020 को हुआ था.  
 
आज से 75 साल पहले एक दलित बालक बिहार के खगड़िया के फरकिया इलाके में पैदा हुआ. 'दलित' '75 साल पहले' और 'फरकिया'. अगर इन 3 बातों को जेहन में रखकर चलें तो आज से 75 साल पहले दलित घर में पैदा होने की जकड़न की पीड़ा समझी जा सकती है.  

गांव का नाम फरकिया क्यों था जहां पैदा हुए थे पासवान?

पटना के वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय बताते हैं, "फरकिया माने जो फर्क में रहा हो, देश दुनिया से अलग, अकेलेपन में." उन्होंने कहा कि फरकिया बिहार का वो इलाका था जो कि अंग्रेजों की पहुंच से भी दूर था. ये इलाका जिला मुख्यालय 40 किलोमीटर दूर 3 से 4 नदियों से घिरा और खेतों के बीच में बसा था. इसलिए इसका नाम फरकिया पड़ गया. तो इसी फरकिया के शहरबन्नी गांव में पैदा हुए थे रामविलास पासवान.

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रामविलास पासवान ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था, "मैं उस इलाके में पैदा हुआ जहां प्राइमरी स्कूल नहीं था, स्कूल तक जाने के लिए 3 किलोमीटर चलकर जगमोहरा जाना पड़ता था. मिडिल स्कूल भी 3 किमी दूर था. इसके बाद जब आठवीं में पढ़ने आया तो 2 नदियां रोज पार करनी पड़ती थीं " आज अगर आप प्रचंड वेग से बह रही बिहार की नदियों की तस्वीरें देखते हैं तो याद कीजिए वो मौके जब बालक रामविलास पासवान दो नदियों को पारकर अपने स्कूल जाते थे. 

रामविलास पासवान, फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव

 

बता दें कि पासवान देश के दलित वर्ग का एक समूह है. इस वर्ग के पढ़े लिखे लोग अपने नाम के पीछे पासवान टाइटल लगाते हैं तो अशिक्षित अभी भी अपने आप को 'दुसाध' कहते हैं. रामविलास इसी पासवन वर्ग में पैदा हुए थे.  

23 साल की उम्र में यानी कि आज से 52 साल पहले 1969 में ये नौजवान पासवान DSP और MLA एक साथ बनते हैं. अब गांव-ज्वार में हंगामा मच गया. कौन ये है युवा? पासवान के अंदर स्पार्क बहुत था. बिहार प्रोविंसियल सिविल सर्विस की परीक्षा पास कर डीएसपी बने पासवान सचमुच में छा गए. पासवान को साक्षर बनकर संतोष नहीं था वे बकायदा शिक्षित होना चाहते थे. सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के मुकाबले उनका संघर्ष 4 से 5 गुना ज्यादा रहा होगा, लेकिन वे डिगे नहीं. 

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हारने की उम्मीद लेकर लड़े थे पहला चुनाव

60 के दशक का ये दलित युवा DSP नहीं बल्कि SP बनना चाहता था. वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता के साथ कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में पासवान ने कहा था कि मैं डीएसपी भले ही बन गया था लेकिन मैं तैयारी IPS की कर रहा था. पॉलिटिक्स में डेब्यू की कहानी भी दिलचस्प है. पासवान बताते हैं कि इतने कम उम्र में वे राजनीति में नहीं आना चाहते थे लेकिन लोगों के कहने पर अलौली सीट से चुनाव लड़ गए. पासवान खुद कहते हैं कि उन्हें लगता था कि वे चुनाव हार जाएंगे और सभी का जोश भी ठंडा पड़ जाएगा. फिर कुछ समय के लिए राजनीति से छुटकारा भी मिल जाएगा. लेकिन नियति की रचना तो कुछ और थी. पासवान संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत गए. 
 

चिराग पासवान को साथ लाने की एक और कोशिश, 5 जुलाई को रामविलास पासवान की जयंती मनाएगी RJD 

बाबू जी को पसंद नहीं थी बेटे की नेतागिरी

तब इस पार्टी के लोग बड़े क्रांतिकारी हुआ करते थे. इनका समय प्रदर्शन और जेलों में गुजरता था. पासवान ने डीएसपी की ठाठ छोड़ जब राजनीति की राह चुनी तो किसान पिता जामुन दास एकदम उखड़ गए. पिता चाहते थे कि बेटा 'जेलभेजवा' पार्टी का विधायक बनने के बजाए रौबदार पुलिस का बाबू बने. तब इस पार्टी के कर्ताधर्ता थे मधु लिमये, कर्पूरी दिग्गज. सो पासवान इधर ही गए. पिता ऐसा कभी नहीं चाहते थे. 

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जब पासवान के पिता ने कोर्ट में की बेटे की चुगली

यहां एक दिलचस्प वाकया आता है. जैसा कि हमने कहा है कि पासवान 23 साल में ही विधायक बन गए थे. पासवान कहते हैं कि उम्र को लेकर उनपर केस भी चला था. इस गड़बड़ी की वजह बताते हुए पासवान ने कहा था कि सर्टिफिकेट में उनकी आयु कम थी, लेकिन वोटर लिस्ट में वे विधायक बनने के योग्य थे. पासवान कहते हैं कि उम्र के मामले में उनपर केस भी चला और इसमें उनके पिता ने कोर्ट में उनके खिलाफ बयान भी दिया था. पासवान खुद बताते हैं, "उनके दिमाग में ये था कि कोर्ट में केस हार जाएगा तो फिर राजनीति में नहीं जाएगा. उनको इस बात की खुशी नहीं थी कि मेरा बेटा एमएलए बना है, उन्हें इस बात का दुख था कि वो जिस पार्टी में गया है वो जेल जाने वाले लोगों की पार्टी है. जब तक इस केस में फैसला आया तब तक बिहार में दूसरी बार चुनाव आ गया.  

रामविलास पासवान, फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव

जेल जाने को लेकर उनके पिता का मन की गवाही सच थी. पासवान बताते हैं कि 1969 से 77 तक के बीच वे मुश्किल से 6 महीना बाहर रहे और उनका ज्यादातर समय जेल में ही गुजरा. 

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जब सवा चार लाख वोट से जीते

1977 में इमरजेंसी के बाद आम चुनाव हुए तो ऑल इंडिया रेडियो की इलेक्शन कमेंट्री की एक सूचना ने सभी का ध्यान खींचा. वो सूचना थी कि पासवान ने हाजीपुर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार को सवा चार लाख को शिकस्त दी थी. इस जीत ने उनकी शख्सियत राष्ट्रीय नेता के रूप में कर दी और वे दलितों के आइकन बन गए. इसके के बाद पासवान  नौ बार सांसद रहे.  50 साल के राजनीतिक जीवन में केवल 1984 और 2009 में उन्हें हार झेलनी पड़ी. 

आधी सदी की लंबी राजनीतिक यात्रा में लालू यादव के शब्दों में राजनीति के मौसम विज्ञानी ने देश के कई शीर्ष पदों पर काम किया. केंद्रीय मंत्री बने. पासवान की स्वीकार्यता और खुद को गठबंधन राजनीति में फिट बिठाने की क्षमता इतनी जबर्दस्त थी कि विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर, एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की सरकार में वह अपने लिए जगह निकालते रहे. 

पासवान के पास लेफ्ट-राइट और सेंटर के बीच बैलेंस बनाने की गजब की राजनीतिक क्षमता थी. यही वजह रही कि 2002 में गुजरात दंगों पर NDA छोड़ने वाले पासवान 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार में केंद्रीय मंत्री बन गए. 

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'मैं उस घर में दीया जलाने चला हूं, जिस घर में सदियों से अंधेरा था' 

जेपी के नामी शिष्यों की मंडली लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी और खुद वे में पासवान सबसे सीनियर थे. राजनीतिक जीवन में उन्होंने काफी दूरियां तय की. लेकिन जब पासवान राजनीति में आए तो उन्होंने नारा दिया था. 'मैं उस घर में दीया जलाने चला हूं, जिस घर में सदियों से अंधेरा था.'

गरीब ये समझे कि रामविलास हमारा आदमी है

पासवान जब जीवित थे तो उनसे पूछा गया था कि आपका लक्ष्य क्या है? इस सवाल के जवाब में रामविलास पासवान उसी 'बलगोबिना डोम' का जिक्र करते हैं जिसकी चर्चा हमने सबसे पहले की है. पासवान ने कहा था, "मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि देश के करोड़ों दलित जो बेजुबान थे, जो सवर्णों के गरीब थे और जो अल्पसंख्यक है वो समझते हैं कि रामविलास पासवान मेरा आदमी है." उन्होंने कहा था कि गरीब ये समझे कि रामविलास हमारा आदमी है, यही मेरा लक्ष्य है और मुझसे जो बन पाता है उनके लिए वो करता हूं.

चिराग के साथ रामविलास पासवान (फोटो-ट्विटर)

बालगोविंद डोम की कहानी 

गया के बालगोविंद डोम की कहानी को पासवान अपने ही अंदाज में बताते हैं. उन्होंने इंटरव्यू में कहा था, " गया में सड़क पर एक आदमी आ गया जीर्ण शीर्ण हालत में. लुंगी पहने हुए और कहा कि हम बालगोविंद डोम हैं. बाबू हमको एक गो चापाकल दे दीजिए...पानी पीने के लिए. हम बोले- कितना पैसा लगेगा? तो उसने कहा कि हमको पैसा नहीं चाहिए, पैसा देंगे तो लोग छीन लेगा. हमको चापाकल ही दे दीजिए." पासवान ने इस व्यक्ति को चापाकल दिलवा दिया. 

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इसके बाद पासवान संयोग से संचार मंत्री बन गए. उनके पास टेलिफोन एडवाइजरी कमेटी बनाने का अधिकार था. उन्होंने इस कमेटी में बालगोविंद डोम का नाम सबसे ऊपर रखा और जनरल मैनेजर को फोन कर कहा कि इसके यहां सबसे पहले फोन लगना चाहिए. इसके इसके घर में बैठने के लिए चौकियों का भी बंदोबस्त किया जाना चाहिए. 

रामविलास पासवान, फोटो-इंडिया टुडे आर्काइव

पासवान ने कहा था कि इस व्यक्ति के घर फोन लगते ही उसकी सामाजिक हैसियत में जबर्दस्त अंतर हुआ. इसे इस बात से समझा जा सकता है कि कल तक जो लोग उसे बलगोबिना कहा करते थे अब उससे पूछते थे बालगोविंद भाय तनी फोन कर लें? समाज के बड़े लोग फोन करने की गरज से सबसे पहले इनके यहां पहंचे.

सूट बूट वाले दलित नेता

रामविलास पासवान इस बने बनाए मिथक के हमेशा खिलाफ रहते थे कि दलित नेता सिंपल-साधारण, दबा कुचला और गरीब सा दिखे. उन्होंने अपने फिजिकल प्रेजेंस पर ध्यान दिया और इस पर कभी भी अभाव की कुंठा हावी नहीं होने दी. वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर के अनुसार जब उनसे  'फ़ाइव स्टार दलित नेता' की कथित छवि के बारे में पूछा जाता तो वे तपाक से जवाब देते, "ये वो मानसिकता है जो कहती है कि दलित मतलब ये कि वो जीवन भर भीख मांगे, गरीबी में रहे, अगर हम उसको तोड़ रहे हैं तो क्यों दिक्कत हो रही है." 

पासवान चले गए...'बालगोविंद डोम' तो बचे ही हैं

आज पासवान की पूंजी दलित चेतना और उनकी पार्टी एलजेपी संक्रमण के काल से गुजर रही है. चिराग पर कॉस्मेटिक राजनेता होने का आरोप लगता है जो दिल्ली से राजनीति करना चाहते हैं तो चाचा पशुपति पारस पर महात्वाकांक्षी और बागी होने का लेप चढ़ गया है. लेकिन गया के सड़क पर रामविलास से चापाकल मांगने आए बालगोविंद जैसे लोग समाज में खत्म नहीं हो गए हैं. उन्हें आज भी देश की अलग अलग सड़कों पर अपने रामविलास का इंतजार है. 

 

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