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जानिए- सिद्धारमैया को क्यों कहा जाता है कर्नाटक की सियासत का रजनीकांत

कर्नाटक चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली कांग्रेस अब सिद्धारमैया के नेतृत्व में नई सरकार बनाने जा रही है. कुरबा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सिद्धारमैया की छवि एक ऐसे जननेता की रही है, जिन्हें हर समुदाय के लोग पसंद करते हैं.

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सिद्धारमैया के एक समर्थक ने उनका टैटू ही अपने शरीर पर गुदवा लिया
सिद्धारमैया के एक समर्थक ने उनका टैटू ही अपने शरीर पर गुदवा लिया

साउथ में कई हस्तियों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता है. कर्नाटक में बंपर चुनावी जीत के बाद कांग्रेस को सत्ता में लाने वाले सिद्धारमैया को अगर कर्नाटक का रजनीकांत कहा जाए तो गलत नहीं होगा. तमिलनाडु के सिनेमा फैंस के बीच रजनीकांत का जादू जिस तरह सिर चढ़कर बोलता हैं, ठीक उसी तरह से कर्नाटक के लोगों के दिल पर सिद्धारमैया राज करते हैं. रजनीकांत का एक्शन तो सिद्धारमैया की सादगी, संघर्ष और सियासत के लोग दीवाने है. खासकर कुरबा समुदाय के लोग तो सिद्धारमैया को संत की तरह सम्मान देते हैं. 

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फिर संभालेंगे CM की कुर्सी

कभी जनता दल में रहते हुए कांग्रेस विरोध की सियासत करने वाले सिद्धारमैया जब कांग्रेस में आए तो यहां भी उनका रुतबा लगातार बढ़ता ही गया. जनता के बीच लोकप्रियता और सियासी ताकत ऐसी की 78 साल की उम्र में सिद्धारमैया कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार को पीछे छोड़कर एक बार फिर कर्नाटक के सीएम की कुर्सी संभालने जा रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के हवाले से कहा है कि सिद्धारमैया कर्नाटक के मुख्यमंत्री होंगे और डीके शिवकुमार उपमुख्यमंत्री होंगे. वहीं, बेंगलुरू में विधायक दल की बैठक में सिद्धारमैया को नेता चुन लिया गया है. शनिवार को सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की प्रचंड बहुमत से जीत के रणनीतिकार डीके शिवकुमार रहे, लेकिन सीएम के लिए पार्टी ने सिद्धारमैया के नाम पर मुहर लगाई. सिद्धारमैया किसी एक राजनेता को सियासी मात देकर पहली बार सत्ता के सिंहासन पर काबिज नहीं हो रहे हैं. इससे पहले भी वो अपने राजनीतिक सूझबूझ से पूर्व पीएम एचडी देवेगौड़ा और बीएस येदियुरप्पा को चित कर चुके हैं तो मल्लिकार्जुन खड़गे को सीएम की रेस में पीछे छोड़ दिया था. 

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कभी थे कांग्रेस के धुर विरोधी

किसान परिवार में जन्मे और गरीबी में पले-बढ़े सिद्धारमैया 1980 से 2005 तक कांग्रेस के धुर विरोधी थे, लेकिन देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद उन्होंने  कांग्रेस का हाथ थामा. सिद्धारमैया ने पिछले दो दशको से कांग्रेस में रहते पार्टी में अपना कद इतना बढ़ा लिया है, जिसमें बड़े-बड़े नेता पीछे छूट गए और गांधी-परिवार व शीर्ष नेतृत्व चाह कर भी सिद्धारमैया को नजरअंदाज नहीं सका है. 

बचपन से जवानी तक संघर्ष 

कर्नाटक के मैसूर जिले के वरुणा होबली में 12 अगस्त 1948 को सिद्धारमैया का जन्म हुआ. बचपन गरीबी में बीता और जवानी सियासी संघर्ष में गुजरी. गरीबी इतनी कि उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़कर मवेशियों को चराना शुरू कर दिया ताकि परिवार भूखा ना सो सके. सिद्धारमैया की पढ़ाई को लेकर ललक बेइंतहा थी. इसे भांपकर शिक्षक ने उन्हें सीधे चौथी कक्षा में दाखिला दे दिया. अब तक मवेशियों को चराने वाला यह बच्चा प्राथमिक और सेकंडरी शिक्षा पूरी करने के बाद मैसूर के कॉलेज में दाखिला लेने पहुंच गया. सिद्धारमैया के पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बने, लेकिन सिद्धारमैया ने अपनी अलग राह चुनी. हालांकि, उन्होंने बीएससी की डिग्री जरूर हासिल की, लेकिन कानून की डिग्री हासिल कर वकालत और सियासत शुरू कर दी.

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सिद्धारमैया ने सीखी सियासत की ABCD

सिद्धारमैया ने मैसूर में लॉ कालेज में पढ़ाई के दौरान सामाजिक न्याय की आवाज उठाना शुरू कर दिया था. प्रोफेसर एमडी नंजुंदास्वामी ने कर्नाटक राज्य रैयत संघ (किसानों का संगठन) बनाया था, जिसके साथ सिद्धारमैया भी जुड़े थे. संगठन हर सप्ताह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दे पर बैठक और चर्चा करता था.  इन्हीं बैठकों से सिद्धारमैया को चुनाव लड़ने का साहस मिला और वो तालुका डेवेलपमेंट बोर्ड (TDB) का चुनाव लड़े और जीते. इस तरह सिद्धारमैया सियासत में कदम रखा. 

अब्दुल नजीर ने दिखाई सियासी राह

समाजवादी विचारधारा के प्रति झुकाव रखने वाले सिद्धारमैया 1983 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए जनता पार्टी के टिकट के दावेदार थे. जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा उन्हें पार्टी का टिकट देने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि सिद्धारमैया उनकी जी-हुजुरू नहीं करते थे. ऐसे में सिद्धारमैया को टिकट नहीं मिला तो सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल नजीर उनका सहारा बने. सिद्धारमैया अब्दुल नजीर को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे. 

अब्दुल नजीर की सलाह पर सिद्धारमैया ने 1983 का विधानसभा चुनाव चामुंडेश्वरी निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय लड़ा. भारतीय लोकदल ने उन्हें अपना समर्थन दे दिया. चुनाव जीतकर निर्दलीय विधायक के रूप में उन्होंने अपनी सियासी पारी का आगाज किया. जनता पार्टी की रामकृष्ण हेगड़े सरकार को समर्थन दिया तो उन्हें कन्नड़ को कर्नाटक की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए गठित समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया. इसके बाद सिद्धारमैया ने मुड़कर नहीं देखा और सियासी बुलंदी पर चुनाव दर चुनाव चढ़ते गए. 

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सिद्धारमैया 9 बार विधायक चुने गए हैं, जिसमें निर्दलीय, जनता पार्टी, जेडीएस से तीन बार जीते और पांच बार कांग्रेस से चुने गए. अपने राजनीतिक जीवन में चार बार हार का सामना करना पड़ा, जिनमें तीन विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव में मात मिली. इस दौरान रामकृष्ण हेगड़े की सरकार में पहली बार मंत्री बने तो 1996 में उपमुख्यमंत्री चुने गए. इतना ही नहीं कांग्रेस का दामन थामा तो सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने का सपना साकार हुआ और अब दूसरी बार मुख्यमंत्री का ताज उनके सिर सजने जा रहा है.  

सिद्धारमैया की सादगी ही पहचान

सिद्धारमैया ने अपनी राजनीतिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष साख से समझौता नहीं किया. कर्नाटक में कांग्रेस की शानदार वापसी के चेहरे के रूप में सिद्धारमैया के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं. वह गरीबों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखते हैं और सादगी के साथ जीवन जीना पसंद करते हैं. कपड़े पहने से लेकर मिलने जुलने और खाने-पीने तक में सादगी झलकती है. वो एक ऐसा नेता हैं, जो अपने साथ एक मोबाइल फोन तक नहीं रखते हैं. चाहे बड़े से बड़ा कोई भी नेता क्यों न हो, अगर किसी को सिद्धारमैया से बात करनी है, तो उनके पीए के जरिए ही संपर्क करना पड़ता है. सिद्धारमैया जनता के बीच काफी लोकप्रिय हैं और देहाती छवि वाले नेता हैं. 

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सिद्धारमैया की सियासी ताकत

सिद्धारमैया कुरबा (गड़रिया) समुदाय से आते हैं. कर्नाटक में सियासी तौर पर प्रमुख जातियों में से एक है और ओबीसी के तहत आती है. सिद्धारमैया ने अपनी सियासी ताकत AHINDA (अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए कन्नड़ में संक्षिप्त नाम) के जरिए खुद बनाई है. कर्नाटक की तीन प्रमुख जातियों को एकजुट कर अपने पुराने उस्ताद एचडी देवेगौड़ा की जेडीएस के सामने सियासी चुनौती बने. सीएम के रूप में सिद्धारमैया की नियुक्ति से कांग्रेस को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. क्योंकि कांग्रेस ओबीसी गणना और आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की मांग के साथ बीजेपी को ओबीसी के मुद्दे पर घेरने की तैयारी कर रही है.

सिद्धारमैया के बारे में कर्नाटक के लोगों को पता है कि वो हमेशा ही समाज के गरीब तबके की भलाई के बारे में सोचते हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सामाजिक न्याय के लिए कई अहम काम किए हैं. अन्न भाग्य योजना के तहत हर इंसान को हर महीने पांच किलो चावल देने का था. बाद में इसे बढ़ाकर सात किलो कर दिया गया था. कल्याणकारी योजनाओं का खर्च 4410 करोड़ रुपए था, जिसमें दुग्ध उत्पादकों को सब्सिडी, दलितों/आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की कर्ज माफी और गरीबों के पुराने बिजली के बिल माफ करना शामिल था.

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सिद्धारमैया का सपना साकार

सादगी, संघर्ष, सियासत में स्पष्टवादिता के लिए जाने जाने वाले सिद्धारमैया की राज्य की बागडोर संभालने की महत्वाकांक्षा और सपना साकार 2013 में हुआ जब कांग्रेस की तरफ से उन्हें कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया गया. मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया अपने पहला कार्यकाल (2013-2018) पांच साल पूरा करने वाले राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री हैं. इससे पहले राज्य में देवराज अर्स मुख्यमंत्री के तौर पर (1972-1978) पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था.  1997-98 के दौरान जे एच पटेल की सरकार में, और उसके बाद 2004 में कांग्रेस-जेडीएस की पहली साझा सरकार के दौरान सिद्धारमैया बागी बने रहे, लेकिन मुख्यमंत्री के तौर पर कभी भी उन्हें बगावत का सामना नहीं करना पड़ा. सिद्धारमैया के सिर अब दूसरी बार मुख्यमंत्री का ताज दूसरी बार सजने जा रहा है. 

सिद्धारमैया स्वच्छ छवि वाले नेता 

सिद्धारमैया करीब चार दशक से सियासत में है, लेकिन उनके दामन पर एक भी दाग नहीं लगा. वो अपनी साफ-सुथरी छवि के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, राजनीतिक विरोधियों ने सिद्धारमैया की 70 लाख रुपये की हब्लोट घड़ी को लेकर उनसे सवाल किए थे. सिद्धारमैया ने तब कहा था कि यह घड़ी मिडिल ईस्ट में काम करने वाले उनके एक डॉक्टर दोस्त ने गिफ्ट की थी. सिद्धारमैया पर कभी भी व्यक्तिगत लाभ के लिए भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा जबकि कर्नाटक की सियासत में बहुत कम नेताओं के दामन पाक है. कर्नाटक में सियासी तौर पर सिद्धारमैया को 'चतुर और बहुत नाप-तोल के चलने वाला' नेता कहा जाता है.  प्रशासन पर सिद्धारमैया की पकड़ बेहद मजबूत है. वो सियासी जोड़-तोड़ का भी ख्याल रखते हैं. 

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सिद्धारमैया को कर्नाटक का रजनीकांत क्यों कहा जाता है. इसे पांच प्वाइंट में समझें...

1. संघर्ष: सिद्धारमैया बचपन में गरीबी से जूझते रहे तो सियासत में पहली बार विधायक बनने के टिकट लेने के लिए संघर्ष करना पड़ा. निर्दलीय चुनाव लड़े विधायक बने और बाद में जेडीएस में संघर्ष करते गुजरा. जेडीएस से बाहर निकाल दिया गया तो कांग्रेस में अपनी जगह बनाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा, तब जाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली. 

2. सादगी: सिद्धारमैया सरल और सादगी के साथ रहते हैं, जिसके चलते ही ग्रामीण कर्नाटक में उनकी लोकप्रियता काफी है. सिद्धारमैया पार्टी नेताओं से लेकर कार्यकर्ता और जनता सभी के लिए आसानी के साथ सुलभ हैं. वह किसी बड़े, वैश्विक सीईओ की बजाय गरीब किसानों के एक समूह से मिलना पसंद ज्यादा पंसद करते हैं. 

3. सियासत: सिद्धारमैया की सियासत दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़ों पर केंद्रित है. वह तमिलनाडु के समाज सुधारक पेरियार, ईवी रामासामी नायकर की तरह राजनीतिक करते हैं, जो एक सामाजिक न्याय की दृढ़ता में विश्वास करते हैं.

4. समीकरण: कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत-वोक्कालिंगा की सुपरमेसी को तोड़ने के लिए सिद्धारमैया ने एक मजबूत समीकरण बनाया है, जिसे  AHINDA के नाम से जाना जाता है. इस तरह से अपना सियासी समीकरण बनाकर विपक्षी दलों के लिए चुनौती बने. 

5. सपना: सिद्धारमैया ने निर्दलीय विधायक के तौर पर अपने सियासी सफर का आगाज किया, लेकिन मुख्यमंत्री बनने का सपना न जनता पार्टी में साकार हुआ और न ही जेडीएस में. कांग्रेस का दामन थामने के बाद सिद्धारमैया का सपना साकार हो सका. 

सिद्धारमैया के प्रति दीवानगी

सिद्धारमैया की लोकप्रियता का आलम कर्नाटक में इस कदर है कि उन्हें सुनने के लिए भीड़ जुटानी नहीं पड़ती बल्कि लोग खुद चलकर आते हैं. पिछले साल अगस्त में सिद्धारमैया ने मध्य कर्नाटक के दावणगेरे में अपना 75वां जन्मदिन मनाया. इसे सिद्धमहोत्सव नाम दिया गया. इस कार्यक्रम में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए थे. इनमें से सैकड़ों लोग अपनी सीट घेरने के लिए कार्यक्रम शुरू होने के पहले रातभर खुले मैदान में सोते रहे. 

राहुल गांधी ने विशेष रूप से इस कार्यक्रम में शामिल होने की बात कही थी, लेकिन शहर भर में भीड़ के कारण उन्हें भी कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा था. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार दौरान सिद्धारमैया की लोकप्रियता साफ तौर पर दिखी थी. सिद्धारमैया की सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए पार्टी नेताओं को पैसे नहीं खर्च करने पड़ते थे बल्कि जहां भी जाते थे लोग खुद उनका स्वागत करने और सुनने के लिए पहुंच जाते थे. सिद्धारमैया की यही ताकत उन्हें कर्नाटक की सियासत का रजनीकांत बनाती है?

 

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