कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि उन्होंने एक साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है. अब कांग्रेस नेताओं को अपना पूर्णकालिक अध्यक्ष चुन लेना चाहिए. हालांकि, कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने सोनिया के अध्यक्ष पद छोड़ने की खबर का खंडन किया है. लेकिन इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है कि क्या कांग्रेस फिर से उसी स्थिति में जाकर खड़ी हो गई है, जहां ठीक एक साल पहले थी.
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद मान-मनौव्वल का लंबा दौर चला और सभी प्रयास विफल होने के बाद सोनिया गांधी को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष चुना गया. एक साल लंबे कार्यकाल के दौरान पार्टी को मुश्किल दौर से उबारने की महारथी सोनिया गांधी एकजुटता बनाए रखने में विफल रहीं. हालांकि, झारखंड और महाराष्ट्र में सत्ता के समीकरण साधने में उन्हें कामयाबी जरूर हासिल हुई. हरियाणा में कांग्रेस ने सत्ताधारी दल को कड़ी टक्कर दी. दिल्ली में पार्टी कोई करिश्मा नहीं कर सकी.
23 नेताओं की चिट्ठी, बदलाव की मांग, इन हालात में सोनिया बोलीं- कांग्रेस चुने नया अध्यक्ष
राजस्थान और MP में फूट
सोनिया गांधी के इस एक साल के कार्यकाल में ही कांग्रेस ने मध्य प्रदेश की सत्ता गंवा दी. कांग्रेस की कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाला बदलने से गिर गई और सत्ता के साथ सिंधिया भी भारतीय जनता पार्टी के पास चले गए. सोनिया के कमान संभालने के बाद पार्टी में मतभेद बढ़े और कई नेता हाथ का साथ छोड़ गए. इसके पीछे जानकार पुराने दिग्गजों और युवा नेताओं के बीच महत्वाकांक्षा के टकराव को वजह बताते हैं.
साथ ही राजस्थान में भी गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबा टकराव देखने को मिला. कई मौके तो ऐसे आए जब लगा कि कांग्रेस राज्य की सत्ता के सिंहासन से हाथ धो बैठेगी क्योंकि पार्टी की अंदरूनी कलह का फायदा उठाने के लिए बीजेपी बिल्कुल तत्पर नजर आ रही थी. हालांकि कांग्रेस के लिए राजस्थान चैप्टर का अंत सुखद रहा और पार्टी ने विधानसभा के भीतर बहुमत साबित कर दिया. लेकिन इस दौरान राजस्थान कांग्रेस में चली आ रही कुर्सी की रार पूरी तरह से सार्वजनिक हो गई.
नहीं दे सकीं करिश्माई नेतृत्व
जब सीताराम केशरी के हाथ से कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के पास आई थी, तब सोनिया ने पार्टी को मजबूती से संभाला था. सोनिया ने तब कांग्रेस को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया था. नेताओं को कुछ ऐसी ही उम्मीद इस बार भी थी. लेकिन वो इस बार करिश्माई नेतृत्व देने में विफल रहीं. अपने एक साल के कार्यकाल के दौरान कोरोना काल की सक्रियता को छोड़ दें, तो अधिकतर समय सोनिया गांधी की भूमिका पर्दे के बीच ही रही है.