भारत के सुदूर दक्षिण राज्य तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव 2026 से पहले एक बार फिर से भाषा का विवाद सुलग रहा है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस विवाद को बड़ा फलक देते हुए मंगलवार को तो यहां तक कह दिया कि तमिलनाडु 'एक और भाषा युद्ध' के लिए तैयार है. सीएम स्टालिन ने कहा कि केंद्र कहती है कि अगर तमिलनाडु नई शिक्षा नीति (NEP) लागू करता है तो उसे 2000 करोड़ रुपये मिलेंगे. लेकिन 2000 करोड़ क्या अगर केंद्र 10000 करोड़ रुपये भी देती है तो हम नई शिक्षा नीति नहीं लागू करेंगे.
सीएम स्टालिन ने कहा कि 1965 से ही डीएमके ने कई बलिदान दिए और हिंदी से मातृभाषा तमिल की रक्षा की. उन्होंने कहा कि यह भावना पार्टी सदस्यों के खून में समाई हुई है.
सवाल है कि तमिलनाडु के सीएम स्टालिन भाषा विवाद के उस अतीत को क्यों याद कर रहे हैं जिसका इतिहास हिंसा से भरा है. ये विवाद आज क्यों शुरू हुआ? गौरतलब है कि 2021 में DMK दस साल बाद तमिलनाडु की सत्ता में आई थी. इस बार DMK भाषायी अस्मिता के बहाने अपनी राजनीति को धार देने की कोशिश कर रही है.
दरअसल तमिलनाडु देश के उन राज्यों में शामिल है जहां अब तक नई शिक्षा नीति 2020 लागू नहीं हुई है. केंद्र सरकार की ओर से बार-बार कहने के बावजूद तमिलनाडु नई शिक्षा नीति लागू नहीं कर रही है.
नई शिक्षा नीति को लेकर तमिलनाडु का कई मसलों पर विरोध है. लेकिन द्रविड अभिमान पर गठित हुए इस राज्य की मुख्य आपत्ति तीन-भाषा फॉर्मूला को लेकर है.
पहले तीन-भाषा फॉर्मूला को समझिए
केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत प्रस्तावित तीन-भाषा नीति एक शैक्षणिक ढांचा है. आसान शब्दों में कहें तो इसका अर्थ यह है कि बच्चों को तीन भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए. अगर पहली भाषा की बात करें तो यह आमतौर पर छात्र की मातृभाषा या राज्य की क्षेत्रीय भाषा होगी. उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में तमिल, महाराष्ट्र में मराठी.
दूसरी भाषा में कोई अन्य भाषा हो सकती है. लेकिन केंद्र सरकार अक्सर हिंदी को इस संदर्भ में प्रोत्साहित करती है, खासकर गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, ताकि राष्ट्रीय एकता मजबूत हो. हालांकि, यह अनिवार्य नहीं है और राज्य अपने हिसाब से दूसरी भाषा चुन सकते हैं. तमिलनाडु का सख्त विरोध इसी बिंदू पर है.
तीसरी भाषा आमतौर पर अंग्रेजी या कोई अन्य विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच, जर्मन) हो सकती है, ताकि बच्चे ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकें. गैर-हिंदी भाषी राज्यों में यह हिंदी भी हो सकती है, जबकि हिंदी भाषी राज्यों में कोई अन्य भारतीय भाषा (जैसे तमिल, तेलुगु) चुनी जा सकती है.
यह नीति खास तौर पर कक्षा 1 से 8 तक लागू करने पर जोर देती है, ताकि बच्चे अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं में भी दक्षता हासिल कर सकें.
तीन-भाषा फॉर्मूले से स्टालिन की दूरी
तमिल अस्मिता, द्रविड़ गौरव और केंद्र के कथित प्रभुत्व के खिलाफ रही तमिलनाडु की राजनीति ने तीन-भाषा के फॉर्मूले को लागू नहीं किया. तमिलनाडु आज भी दो-भाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) पर अड़ा हुआ है और हिंदी के खिलाफ भावना यहां गहरी हैं.
तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने कहा कि केंद्र एक और भाषा युद्ध के बीज बो रहा है. और हम लोग इस युद्ध के लिए तैयार हैं.
डीएमके कैडर को लिखे एक पत्र में सीएम स्टालिन ने केंद्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि "आप अभी भी इसे थोप रहे हैं, इसलिए हम अभी भी इसका विरोध कर रहे हैं. अगर आपने इसे नहीं थोपा होता, तो हम इसका विरोध नहीं करते, हिंदी अक्षरों को नहीं हटाते. तमिलनाडु के लोगों की खास पहचान आत्मसम्मान है. हम कभी किसी को इसे भड़काने नहीं देंगे."
हिंदी के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा
सीएम स्टालिन ने कहा कि, 'प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान यादव से पूछे जाने चाहिए थे, जो हिंदी थोपने की कोशिश कर रहे हैं. आप काशी तमिल संगमम और कुंभ मेला आयोजित कर रहे हैं और यहां से लोगों को ले जा रहे हैं. क्या आपने उनकी सहायता के लिए तमिल और अन्य भाषाओं में नाम बोर्ड लगाए हैं? आपको पूछना चाहिए था कि क्या भारतीय भाषाओं के साथ समान व्यवहार किया जाता है और ऐसे बोर्ड लगाए जाते हैं."
स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु किसी विशेष भाषा के खिलाफ नहीं है और किसी भी भाषा को सीखने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति के रास्ते में नहीं आएगा, लेकिन वह किसी भी अन्य भाषा को मातृभाषा तमिल पर हावी होने और उसे नष्ट करने की अनुमति नहीं देने के लिए दृढ़ संकल्प है. स्टालिन ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित एक पत्र में कहा, "यही कारण है कि हम द्विभाषी नीति (तमिल और अंग्रेजी) का पालन कर रहे हैं."
स्टालिन ने DMK कार्यकर्ताओं को कहा है कि हिंदी के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कि इसे समाप्त नहीं कर दिया जाता, हम एक ऐसे आंदोलन के वंशज हैं जिसकी सिद्धांतवादी सेना ने तमिल की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया.
विरोध की नीति का त्याग करें, तीन-भाषा नीति लागू करें
डीएमके के आरोपों से केंद्र सीधे इनकार करती है. केंद्र का कहना है कि NEP के जरिये किसी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जा रही है. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मुख्यमंत्री स्टालिन को एक पत्र लिखकर कहा, "मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि किसी भी राज्य या समुदाय पर कोई भी भाषा थोपने का सवाल ही नहीं उठता. एनईपी 2020 भाषायी स्वतंत्रता के सिद्धांत को कायम रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि छात्र अपनी पसंद की भाषा में सीखना जारी रखें."
उन्होंने तमिलनाडु के नेतृत्व से अपील की है कि वे राजनीतिक नफा-नुकसान की भावना से ऊपर उठकर तीन-भाषा की नीति को अपने राज्य में लागू करें. शिक्षा मंत्री ने कहा कि एनईपी 2020 एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण है जो भारत की शिक्षा प्रणाली को वैश्विक मानकों तक बढ़ाने का प्रयास करता है.
सरकारी संपत्तियों पर हिंदी विरोध
इस बीच, डीएमके सदस्यों ने एनईपी के जरिए कथित रूप से हिंदी थोपे जाने के विरुद्ध अपना आंदोलन जारी रखा. पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने उलुंदुरपेट रेलवे स्टेशन के नाम बोर्ड पर हिंदी के अक्षरों को ख़राब कर दिया. मदुरै में भी पोस्ट ऑफिस के बोर्ड पर लिखे हिंदी के अक्षरों को खराब कर दिया गया है. राज्य में हिंदी विरोध के कई ऐसे मामले सामने आए हैं.
हिंदी विरोध की सियासी वजह
दरअसल दक्षिणी राज्य तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके की छवि एक ऐसी पार्टी की है जो तमिल विरासत, तमिल पहचान, तमिल सिनेमा, तमिल साहित्य पर गर्व करती है. इस पार्टी के लिए उत्तर के किसी भी पहचान को अपनाना तमिल विरासत का साझा करना लगता है. जिसका वोटों पर पड़ सकता है. DMK को लगता है अगर द्रविड आंदोलन से निकली पार्टी हिंदी को अपनाएगी तो फिर राज्य की राजनीति में उसका क्या मतलब रह जाएगा.
इसलिए द्रविड आंदोलन से निकली पार्टियां किसी भी कीमत पर हिंदी को स्वीकार नहीं करती हैं. क्योंकि ऐसा करना राज्य में हिंदी की पैरोकार रही बीजेपी को तमिलनाडु में पैर पसारने का मौका देना होगा. इसके लिए बीजेपी दशकों से कोशिश कर रही है.
तमिलनाडु में कब चला 'भाषा युद्ध'
बता दें कि तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ आंदोलन एक लंबे समय से चली आ रही भाषायी और सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई है, जो मुख्य रूप से हिंदी को कथित रूप से "थोपने" के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में उभरी है.
तमिलनाडु में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले सीएम स्टालिन 6 दशक पुराने इस विवाद को फिर से हवा दे रहे हैं.
आजादी के बाद, 1963 में हिंदी को संविधान के तहत आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव आया, जिसे 26 जनवरी 1965 से लागू करना था. तमिलनाडु में इसका तीखा विरोध हुआ. इसे "हिंदी साम्राज्यवाद" के रूप में देखा गया. डीएमके के नेतृत्व में छात्रों और कार्यकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन किए. रेलवे स्टेशन जलाए गए, हिंदी साइनबोर्ड तोड़े गए, और आत्मदाह तक की घटनाएं हुईं. इस आंदोलन में करीब 70 लोगों की मौत हुई, और केंद्र को पीछे हटना पड़ा. इसके बाद 1967 में भाषा नीति में संशोधन हुआ, जिसमें अंग्रेजी को भी आधिकारिक भाषा के रूप में बनाए रखा गया.
बता दें कि तमिलनाडु में पेरियार और करुणानिधि जैसे नेताओं ने न सिर्फ हिंदी का विरोध किया है, बल्कि उनकी राजनीति के पैमाने भी उत्तर भारत से इतर और उत्तर भारत की लोकप्रिय संस्कृति के खिलाफ रहे हैं. इनमें मूर्ति पूजा का विरोध, हिंदू कर्मकांड और परंपराओं का विरोध शामिल है.