भारतीय राजनीति में कहावत है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर गुजरता है, लेकिन आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने तो दिल्ली से यूपी का सियासी रास्ता तय करने का ऐलान किया है. केजरीवाल ने 2022 में उत्तर प्रदेश के होने वाले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के भी उतरने की घोषणा की है. हालांकि, दिल्ली चुनाव के बाद ही यूपी में अपना राजनीतिक आधार बनाने की कवायद आम आदमी पार्टी ने शुरू कर दी थी, जिसकी कमान पार्टी नेता संजय सिंह के हाथों में है.
केजरीवाल ने मंगलवार को कहा कि यूपी ने अब तक गंदी राजनीति देखी है, ऐसे में अब उसे नया मौका मिलना चाहिए. देश के सबसे बड़े राज्य में अच्छी सुविधाएं क्यों नहीं हो सकती हैं? केजरीवाल ने सवाल उठाया कि यूपी में मोहल्ला क्लीनिक, मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी क्यों नहीं मिल सकता है.
केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में यूपी के काफी लोग रहते हैं और उन्होंने उनसे अपील की है कि यूपी में भी दिल्ली जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए. केजरीवाल बोले कि यूपी की जनता पुरानी राजनीति से त्रस्त हो गई है और आम आदमी पार्टी के साथ खड़ी होगी.
अन्ना आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी अपने गठन से अब तक यानी सात साल के दौरान दिल्ली में तीन बार सरकार बनाने में सफल रही है. इस दौरान केजरीवाल ने दिल्ली से बाहर भी अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के लिहाज से गोवा, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात, यूपी, पंजाब समेत कई राज्यों में लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनाव में आम आदमी पार्टी को चुनावी मैदान में उतारा. यह अलग बात है कि पंजाब और दिल्ली छोड़कर सब जगह उसे बुरी तरह हार ही मिली. यही नहीं पंजाब और दिल्ली को छोड़ दें तो आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की जमानत तक नहीं बची है.
लोकसभा और MCD चुनाव में हार
दिल्ली की जनता ने राज्य की सत्ता भले ही केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को लगातार तीसरी बार सौंपी हो, लेकिन दिल्ली के नगर निगम और लोकसभा के चुनाव में लोगों ने उन पर अपना भरोसा नहीं जताया है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सभी सातों सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन एक भी नहीं जीत सका. इस बार के लोकसभा चुनाव में AAP के प्रत्याशी कांग्रेस से भी पीछे रह गए थे.
अरविंद केजरीवाल 2015 में 70 में 67 सीटें जीतकर दिल्ली के सीएम बने थे, लेकिन दो साल के बाद 2017 में दिल्ली के नगर निगम चुनाव हुए थे, जिनमें आम आदमी पार्टी को करारी हार मिली थी. दिल्ली की 272 पार्षद सीटों में से आम आदमी पार्टी महज 48 सीटें ही जीत सकी थी जबकि बीजेपी 181 वार्डों में जीतकर एमएसडी की सत्ता को बचाने में कामयाब रही थी.
पंजाब में गिरता ग्राफ
दिल्ली के बाद आम आदमी पार्टी का राजनीतिक ग्राफ पंजाब में ऊपर उठता दिखा था. 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी चार सीटें जीती थी और 2017 के विधानसभा चुनाव में वो एक विकल्प मानी जा रही थी. यह अलग बात है कि उसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई और पार्टी 100 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थी, लेकिन 20 पर ही सिमट गई. हालांकि, पंजाब में मुख्य विपक्ष पार्टी बनी, लेकिन इसके बाद से उसका ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है.
लोक इंसाफ पार्टी के साथ उसका समझौता टूटा. नेता प्रतिपक्ष एचएस फूलका ने पार्टी और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. विधायक सुखपाल सिंह खैहरा ने भी पार्टी छोड़ दी. इसके अलावा अब तक नाजर सिंह मानशाहिया, अमरजीत सिंह संदोआ, मास्टर बलदेव सिंह जैसे विधायक भी आप से निकल चुके हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट ही आम आदमी पार्टी जीत सकी.
गोवा में AAP का खुला खाता
गोवा के 2017 विधानसभा चुनावों के लिए आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने पूर्व नौकरशाह एल्विस गोम्स को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था. राज्य में कांग्रेस और बीजेपी से ज्यादा आम आदमी पार्टी ने अपने प्रत्याशी उतारे थे. सूबे की कुल 40 सीटों में से 39 पर AAP चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई.
इतना ही एल्विस गोम्स को दक्षिणी गोवा की कुनकोलिम सीट पर कांग्रेस के क्लाफासियो डायस के हाथों मात खानी पड़ी थी. हालांकि, गोवा के जिला परिषद के पंचायत चुनाव में आम आदमी पार्टी का खाता जरूर खुल गया है. बेनालिम की जिला परिषद सदस्य की सीट पर AAP के हैंजल फर्नांडीज ने जीत दर्ज की है, जिसे केजरीवाल ने बधाई भी दी है.
हरियाणा में AAP का स्कोर
दिल्ली से सटे हरियाणा में आम आदमी पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश लगातार करती रही है. सीएम अरविंद केजरीवाल का गृह राज्य भी हरियाणा है. इसके बावजूद केजरीवाल का जादू हरियाणा में नहीं चल सका है. प्रदेश की कुल 90 में से 46 विधानसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी ने उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट पर उसे जीत नहीं मिल सकी. पूरे राज्य में उसे आधे फीसदी से कम वोट मिले थे. इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी अपनी जमानत नहीं बचा सकी थी.
गुजरात में नहीं बची जमानत
गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए आम आदमी पार्टी ने जोर-शोर के साथ तैयारी की थी लेकिन जब चुनाव का वक्त आया तो सिर्फ 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. पार्टी को यहां से एक भी सीट नहीं मिली बल्कि कई प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई. हालांकि, उससे पहले अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में हार्दिक पटेल के साथ मंच साझा किया था.
यूपी में AAP के दो चेयरमैन
यूपी में सियासी जमीन मजबूत करने के लिए 2014 में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी लोकसभा सीट से चुनावी ताल ठोक दी थी. केजरीवाल के पुराने साथी कुमार विश्वास भी राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़े थे, लेकिन कोई भी जीत नहीं सका.
इसके बाद 2017 में हुए यूपी निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी अपना खाता खोलने में कामयाब रही थी. बांदा की तिंदवारा और बिजनौर की सहसपुर नगर पंचायत चेयरमैन पद का चुनाव जीतने में आम आदमी पार्टी कामयाब रही थी. इसके अलावा नगर पंचायत के 18 सभासद, नगर पालिका परिषद में 13 सदस्य और नगर निगम के चुनाव में झांसी में 2 और मुरादाबाद में एक पार्षद ने जीत हासिल की थी.
राजस्थान में फेल रहे केजरीवाल
राजस्थान को लेकर अरविंद केजरीवाल कुछ ज्यादा ही गंभीर थे. उन्होंने पहले कुमार विश्वास को प्रभारी बनाया था, लेकिन बाद में उन्हें बदल दिया था. 2018 के चुनाव में कुल 200 विधानसभा सीटों में से आम आदमी पार्टी ने 141 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन एक भी जीतना तो दूर की बात जमानत भी नहीं बचा सका था. आम आदमी पार्टी के खाते में आधे फीसदी से भी कम वोट मिले थे.
एमपी-छत्तीसगढ़ में नोटा से कम
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी पूरे जोर-शोर से लड़ी थी. एमपी की 208 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने अपना प्रत्याशी उतारा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी और न ही कोई प्रत्याशी अपनी जमानत बचा सका.
ऐसे ही छत्तीसगढ़ में 85 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं मिल सकी. इतना ही नहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी को नोटा से भी कम वोट मिले थे. इन दोनों राज्यों में एक फीसदी वोट भी पार्टी को नहीं मिल सका जबकि नोटा को दो फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे.