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कांग्रेस के लिए ममता बनर्जी जरूरी या गठबंधन है दीदी की मजबूरी?

ममता की कांग्रेस से नजदीकी को हाल ही में सीडब्ल्यूसी की बैठक में मचे सियासी घमासान से जोड़कर भी देखा जा रहा है. सियासत के जानकारों की मानें तो ममता का यह कदम सीडब्ल्यूसी की बैठक से पहले नेतृत्व को लेकर सवाल उठाने वाले नेताओं को यह जवाब है कि सोनिया गांधी में अब भी कांग्रेस से अलग होकर अपनी राह बनाने वाले नेताओं को साथ लाने और सत्ता के समीकरण साधने की क्षमता है, जो किन्हीं कारणों से पार्टी से दूर छिटक गए थे.

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कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटोः पीटीआई)
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटोः पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 2021 बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए सजने लगी सियासी बिसात
  • 2019 में कई सीटों पर टीएमसी की हार की वजह बनी थी कांग्रेस
  • साल 2019 में भाजपा के प्रदर्शन से अलर्ट मोड में ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी बिसात सजने लगी है. एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सरकार को उखाड़ फेंकने की हुंकार भरी तो टीएमसी सुप्रीमो और सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तेवरों में एक बार फिर बदलाव देखा जा रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ आक्रामक रहीं ममता बनर्जी के सुर अब कांग्रेस को लेकर नरम पड़ गए हैं.

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साल 2014 से पहले थर्ड फ्रंट को लेकर काफी सक्रिय नजर आईं ममता बनर्जी के तेवर कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से 26 अगस्त को बुलाई गई गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में नरम नजर आए. कभी कांग्रेस की ओर से आहूत विपक्ष की बैठकों से किनारा करती रहीं ममता बनर्जी न केवल बैठक में शामिल हुईं, बल्कि मोदी सरकार के खिलाफ जेईई और नीट परीक्षा के मसले पर आक्रामक भी नजर आईं. 

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ममता बनर्जी ने योजनाओं का नामकरण राजीव गांधी और अन्य नेताओं के नाम पर न किए जाने को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना भी साधा. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से पहले ममता के इस कदम को सूबे के बदले राजनीतिक समीकरणों का संकेत समझा जा रहा है. बंगाल के लोग भी ममता की कांग्रेस से नजदीकी को महज सियासी दांव बता रहे हैं.

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दूसरी तरफ, ममता की कांग्रेस से नजदीकी को हाल ही में सीडब्ल्यूसी की बैठक में मचे सियासी घमासान से जोड़कर भी देखा जा रहा है. सियासत के जानकारों की मानें तो ममता का यह कदम सीडब्ल्यूसी की बैठक से पहले नेतृत्व को लेकर सवाल उठाने वाले नेताओं को यह जवाब है कि सोनिया गांधी में अब भी कांग्रेस से अलग होकर अपनी राह बनाने वाले नेताओं को साथ लाने और सत्ता के समीकरण साधने की क्षमता है, जो किन्हीं कारणों से पार्टी से दूर छिटक गए थे. ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन में राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस के साथ ही की थी. ममता बनर्जी की पार्टी यूपीए सरकार में भी गठबंधन सहयोगी रही थी.

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अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या गांधी परिवार के नेतृत्व पर उठते सवालों के बीच ममता बनर्जी कांग्रेस के लिए जरूरी हैं या फिर पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस से गठबंधन ममता बनर्जी की मजबूरी है? ऐसा इसलिए भी, क्योंकि अभी पिछले ही साल लोकसभा चुनाव में केंद्र की सत्ताधारी और बंगाल की सियासत में अपनी सियासी जमीन तलाशती रही भाजपा के लिए चुनाव परिणाम उत्साहजनक रहे थे. 

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तेवर बदलने के पीछे क्या है वजह?

सूबे में कभी एक संसदीय सीट जीतने के लिए तरसने वाली भाजपा न सिर्फ 42 में से 18 संसदीय सीटें जीतकर 22 सीट जीतने वाली टीएमसी के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी, बल्कि वोट शेयर में भी महज 3.1 फीसदी वोट से ही पीछे रही. 2019 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी को जहां 43.7 फीसदी वोट मिले, वहीं भाजपा 40.6 फीसदी वोट पाने में सफल रही. ऐसा तब, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी 39.8 फीसदी वोट शेयर के साथ 34 सीटें जीतने में सफल रही थी, जबकि 17 फीसदी वोट शेयर के साथ महज दो लोकसभा सीटें जीतने में सफल हो सकी थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में 9.7 फीसदी वोट शेयर के साथ चार सीट पर सिमटने वाली कांग्रेस का वोट शेयर और सीटें, 2019 में दोनों ही सिमटे. लेकिन बंगाल की सत्ता बरकरार रखने के लिए कांग्रेस को साधने की टीएमसी की रणनीति के पीछे बंगाल की सियासत पर नजर रखने वाले लोग 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के बेहतर प्रदर्शन को वजह बताते हैं.

2016 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थी कांग्रेस

पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश प्रसाद कहते हैं कि ममता के तेवर में आए परिवर्तन के पीछे कांग्रेस का 2016 के विधानसभा चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरना मुख्य वजह हो सकती है. वह बताते हैं कि 2016 के चुनाव में कांग्रेस भले ही 44 सीटें ही जीत पाई थी, लेकिन पार्टी 12.4 फीसदी वोट शेयर के साथ कई सीटों पर टीएमसी उम्मीदवारों की हार का कारण भी बनी थी. दिनेश प्रसाद ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस महज दो सीटों पर सिमट गई, लेकिन आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि कई सीटों पर पार्टी को मिले वोट टीएमसी उम्मीदवारों की हार के अंतर से अधिक रहे.

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वोटों का बंटवारा रोकने की कोशिश

दिनेश प्रसाद ने कहा कि साल 2011 में टीएमसी के वामों को सत्ता से उखाड़ फेंकने के बाद यदि चुनाव परिणाम देखें तो सत्ताधारी टीएमसी, कांग्रेस और भाजपा, तीनों ही दलों के वोट शेयर में इजाफा हुआ है. साल 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी 45.6 फीसदी वोट के साथ 211 सीटें जीतने में सफल रही. साल 2011 के चुनाव की तुलना में टीएमसी का वोट शेयर 5.7 फीसदी और सीटें 27 अधिक रहीं. कुछ ऐसी ही राय टीएमसी को कवर करती रहीं पत्रकार ज्योति दुबे की भी है. ज्योति दुबे कहती हैं कि टीएमसी सुप्रीमो को भाजपा के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण रोकने के लिए शायद यही एक रास्ता नजर आ रहा है कि भाजपा विरोधी वोटों का बंटवारा रोका जाए.

ममता को क्यों था कांग्रेस से गुरेज

कभी कांग्रेस के साथ देश की सत्ता में सहयोगी रह चुकी कांग्रेस से आखिर ममता बनर्जी को गुरेज क्यों था? इस पर ज्योति कहती हैं कि साल 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस, वाम मोर्चा से हाथ मिलाकर रण भूमि में उतरी थी. वह बताती हैं कि कांग्रेस को लगता था कि बंगाल की सत्ता से विदाई उसके लिए सूबे की राजनीति में खोया गौरव वापस पाने का सुनहरा मौका है. ममता बनर्जी को सूबे की सियासत में विरोध और केंद्र में गलबहियां गंवारा नहीं था. यही कांग्रेस और टीएमसी के संबंधों में आई दूरी के पीछे भी मुख्य वजह बनी और दीदी, सोनिया गांधी की बैठकों से कन्नी काटती रहीं.

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