बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के लिए चौंकाने वाले रहे. इस विधानसभा चुनाव में 6 एम और एक वाय फैक्टर हावी रहा. केंद्र की राजनीति के हिसाब से पश्चिम बंगाल चुनाव के परिणाम इस लिहाज से ऐतिहासिक रहे क्योंकि बीजेपी के पूरी ताक़त और संसाधन झोंकने के बावजूद ममता बनर्जी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की. बंगाल चुनाव में 6 एम और एक वाय फैक्टर हावी रहा और पूरा चुनाव इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहा. चुनाव परिणामों में इन फैक्टरों की भूमिका साफ देखने को मिली. क्या थे ये फैक्टर ...
1) मोदी
बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को जमकर भुनाया. उनकी डेढ़ दर्जन से भी अधिक रैलियां आयोजित कराईं. उनकी सभाओं में भारी भीड़ भी उमड़ी. चुनाव के नतीजों के बाद ये स्पष्ट हो गया कि कई जगहों पर यह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो सकी. बीजेपी नेताओं का मानना है कि चुनाव में मोदी फ़ैक्टर ने अपना काम कर दिया था लेकिन ममता बनर्जी के सामने उनकी टक्कर का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार ना दे पाना पार्टी की हार की एक बड़ी वजह रही.
2) ममता
चुनाव बाद ये साफ़ हो गया कि ममता बनर्जी निर्विवाद रूप से पूरे चुनाव में सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरीं. नंदीग्राम में प्रचार के दौरान चोट लगने के बाद जिस तरह उन्होंने व्हीलचेयर पर बैठ कर प्रचार किया उससे महिलाओं में उनकी सहानुभूति खासतौर से बढ़ी. पीएम मोदी के “दीदी ओ दीदी कहने” और दिलीप घोष के बरमूडा पहनने वाले बयान से भी ममता बनर्जी को फायदा मिला. उनकी दस साल की सरकार के कामकाज का आकलन पीछे छूट गया और भावनात्मक मुद्दे हावी हो गए. उन्होंने खुद को बंगाल की बेटी के रूप में सफलतापूर्वक पेश किया जिसे दिल्ली के लोग परेशान कर रहे हैं. उन्हें इसका सीधा फायदा मिला. ममता बनर्जी के नेतृत्व में पिछले दस सालों में बंगाल में सबूज साथी, मां किचेन, दवारे सरकार, जैसी उनकी गरीब कल्याण योजनाओं का फ़ायदा भी इस चुनाव में मिला.
3) मुस्लिम
बीजेपी के हिंदुत्ववादी प्रचार ने मुस्लिम मतदाताओं को पूरी तरह टीएमसी के पाले में धकेल दिया. चुनाव के बीच ही ममता बनर्जी ने मुसलमानों से अपील की थी कि वे अपने वोट न बंटने दें. मालदा, मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में टीएमसी की भारी जीत यह बताती है कि मुसलमानों ने रणनीति के तहत टीएमसी को वोट किया. बीजेपी ने भी ममता के लिए काम आसान कर दिया. बीजेपी प्रचार के दौरान उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही और उन्हें ममता बेगम कहती रही. यही कारण है कि इस बार चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस के बजाए टीएमसी पर भरोसा जताया और मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या वाली 141 सीटों पर टीएमसी ने 50 प्रतिशत से भी अधिक वोट लिए और 119 सीटें जीतीं. बीजेपी को यहां से केवल 35 प्रतिशत वोट और 21 सीटें मिलीं. जबकि लेफ्ट कांग्रेस आईएसएफ गठबंधन को केवल 11 प्रतिशत वोट मिल पाए.
4)महिला
टीएमसी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के अच्छे प्रदर्शन से सबक लेते हुए अपनी कमजोरियों पर काम करना शुरु किया. महिला मतदाताओं पर खासतौर से काम किया गया. ममता बनर्जी पर बीजेपी नेताओं के हमलों के कारण महिला मतदाताओं ने एक अनुमान के अनुसार उनके पक्ष में 60 प्रतिशत से ज़्यादा वोट किया. पूरे देश में अकेली महिला मुख्यमंत्री होना और बीजेपी की पूरी ताकत से उन पर हमला करने की बात टीएमसी ने महिला मतदाताओं के बीच जमकर उछाली और उसे इसका फायदा मिला.
5) मिडिल क्लास
कोलकाता और ग्रेटर कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में अंतिम चरणों में मतदान हुआ जहां बीजेपी का पूरी तरह से सफाया हो गया. कोराना महामारी का पूरे देश में प्रकोप और उससे निपटने में केंद्र सरकार की नाकामी की चर्चाओं के बीच शहरी मिडिल क्लास मतदाताओं ने बीजेपी के बजाए टीएमसी का खुल कर साथ दिया. जबकि बीजेपी को उम्मीद थी कि टीएमसी कार्यकर्ताओं की तौलाबाज़ी का शिकार ये वर्ग बीजेपी के साथ आएगा. आकलन है कि 65-70 प्रतिशत तक मिडिल क्लास मतदाताओं ने टीएमसी को वोट दिया. और TMC की नैया को पार लगाने में अच्छी ख़ासी सीटों का इज़ाफ़ा किया.
6) मतुआ
इस चुनाव में मतुआ समुदाय के वोटों पर बीजेपी और टीएमसी दोनों की नजरें थीं. प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा चुनाव के दौरान ही हुई और वे इस समुदाय के एक मंदिर में भी अपनी यात्रा के दौरान गए. पार्टी ने मतुआ समुदाय के नेता और सांसद शांतनु ठाकुर को आगे किया. अनुसूचित जाति के इस समुदाय का 30 लाख मतदाताओं का करीब 70 सीटों पर प्रभाव माना जाता है. लेकिन बीजेपी को पूरी तरह से इस समुदाय को साथ लाने में कामयाबी नहीं मिली. करीब पचास प्रतिशत वोट टीएमसी को मिले थे.
वाय यानी यूथ
सातवां फैक्टर यूथ का है. यह वर्ग खुलकर टीएमसी के साथ आया. यह बीजेपी के लिए हैरानी की बात है क्योंकि पार्टी को इस वर्ग से बहुत उम्मीदें थीं. बीजेपी ने बेरोजगारी को एक बड़ा मुद्दा बनाया था लेकिन ध्रुवीकरण के प्रयासों से बिफरे युवाओं ने बीजेपी के बजाए टीएमसी का साथ देना पसंद किया. ममता बनर्जी बंगाल की नब्ज के साथ-साथ बंगाल में फुटबॉल के प्रति प्रेम को भी जानती हैं. इसलिए उन्होंने चुनाव जीतने के बाद कहा, ग्रामीण बंगाल के फुटबॉल क्लबों को 50000 फुटबॉल गिफ़्ट में देंगी.
चाहे कोई कुछ भी कहे, बीजेपी बंगाल चुनाव के 6 M और 1 Y के समीकरणों को समझ नहीं पायी और एक के बाद एक गलती करती चली गई जिसका परिणाम उन्हें नतीजों में साफ़ दिखाई भी दिया. एक बात यह भी है कि बीजेपी यूपी और बिहार में भी M (मुस्लिम) और Y (यादव) फैक्टर के चलते भी कई दशकों तक परेशान रही है.