तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में शानदार जीत हासिल करने के बाद नए सीएम के चुनाव को लेकर बीजेपी की तरफ से कवायद जारी है.ऐसा पहली बार हो रहा है जब बीजेपी को मुख्यमंत्री का नाम तय करने में इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है. हर तरफ से अटकलों का बाजार गर्म है और सभी जानना चाहते हैं कि किस फॉर्मूले के आधार पर नए सीएम को चुना जाएगा.पार्टी शिवराज, वसुंधरा और डॉ. रमन सिंह जैसे दिग्गजों को फिर से मौका देती है या फिर इस बार तीनों राज्यों में नए सीएम चेहरे पर दांव खेला जाएगा.
नए चेहरों से उम्मीदें अनेक
तीनों राज्यों में बीजेपी ने पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा था लेकिन हर राज्य सियासत, जातीय समीकरण और परिस्थितियां बिल्कुल अलग-अलग हैं. बस एक चीज जो कॉमन है वो ये है कि पुराने चेहरों को दरकिनार कर बीजेपी यहां नए नेतृत्व को मौका दे सकती है. हालांकि नए नेतृत्व वाले चेहरे का फैसला करने से पहले पार्टी इसका भी आंकलन कर रही है कि इससे क्या फायदे और नुकसान हो सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी को जिस तरह का जनादेश इस चुनाव में मिला है उससे पार्टी पर जनआकांक्षाओं को पूरा करने का भी दवाब रहेगा.
नए सीएम के लिए कई फॉर्मूलों का भी जिक्र किया जा रहा है. सामने 2024 का चुनाव है और लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप अगर काम होता है तो तभी 2024 का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है. ऐसे में पार्टी की कोशिश है कि ऐसे चेहरे को कमान दी जाए तो पार्टी और परफॉर्मेंस दोनों मोर्चों पर खुद को साबित कर सके. इन सबके अलगावा जातीय समीकरण पर भी बीजेपी की नजर है. पार्टी की कोशिश रहेगी कि लोकसभा चुनाव के नजरिए से तीनों राज्यों में ऐसे चेहरे को कमान सौंपी जाए जो ना केवल जातिगत समीकरणों में फिट बैठ सके बल्कि वह महिला, गरीब, युवा जैसे मोदी के चार वर्गों से अपील करने वाला हो.
नए चेहरों के सहारे तैयार होगी 2024 की पिच
राजस्थान की बात करें तो बीजेपी ने पूरे चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार, अपराध और ब्यूरोक्रेसी को मुद्दा बनाया था. नए चेहरे को लेकर यह भी चुनौती होगी कि वो ब्यूरोक्रेसी को हैंडल कर सके जिससे राज्य में अपराध, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर रोक लग सके और लोगों तक केंद्र तथा राज्य की जनकल्याणकारी योजनाएं आसानी से पहुंच सकें. इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी बीजेपी ने भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया था और महादेव ऐप का मुद्दा प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया था. तो साफ है कि सीएम का चेहरा वो होगा जो ना केवल लोगों की आंकाक्षाओं पर खरा उतरे बल्कि 2024 के लिए बीजेपी के टारगेट को पूरा करने में सहयोग कर सके.
वसुंधरा को दरकिनार करना आसान नहीं
जैसे राजस्थान की बात करें तो नए सीएम के चेहरे को लेकर कई बातें कही जा रही है. दो बार राज्य की सीएम रही वसुंधरा राजे भले ही आलकमान की पंसद ना हो लेकिन उनकी राजनीतिक ताकत देखते हुए उन्हें एकदम से दरकिनार भी नहीं किया जा सकता है. वसुंधरा के पक्ष में ये बात कि उन्हें पूर्व में सरकार चलाने का अच्छा-खासा अनुभव है और ब्यूरोक्रेसी पर भी उनकी पकड़ी अच्छी रही है. राजस्थान को लेकर कहा जा रहा है कि वसुंधरा की सीएम दावेदारी प्रेशर पॉलिटिक्स से कमजोर हुई है. लेकिन वसुंधरा ऐसे कद की नेता नहीं हैं जिसे पार्टी उसके हाल पर छोड़कर आगे बढ़ जाए. राजस्थान की करीब दर्जनभर लोकसभा सीटों पर वसुंधरा की नाराजगी का बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसीलिए पार्टी के बड़े नेता दिल्ली में लगातार वसुंधरा के साथ मैराथन बैठकें कर रहे हैं जिससे उनको किसी तरह मनाया जा सके.
नए चेहरे भी पीएम के एजेंडे में बैठते हैं फिट
वहीं नए चेहरों की बात की जाए तो बाबा बालकनाथ यादव, दिया कुमारी,किरोड़ी लाल मीणा,अश्विनी वैष्णव जैसे नाम भी दौड़ में शामिल हैं. बालकनाथ का जन्म यादव परिवार में हुआ जो मूल ओबीसी की जाति है और जाट-बिश्नोई बहुल राज्य में ओबीसी के की तरह वंचित ओबीसी का प्रतिनिधित्व करती है.उन्हें सीएम बनाने से ना केवल राजस्थान बल्कि हरियाणा में भी पार्टी को लाभ मिल सकता है.यादव वोटर की बिहार और यूपी में क्या अहमियत है ये किससे छिपा नहीं है.
अश्विनी वैष्णव की बात करें तो भले ही उन्हें राजनीति का अनुभव कम हो, एक ब्यूरोक्रेट रह चुके वैष्णव केंद्र में इस समय दूरसंचार और रेल जैसा अहम मंत्रालय संभाल रहे हैं. वह अच्छा खासा प्रशासनिक अनुभव रखते हैं. और पीएम मोदी के उस नारे में फिट बैठते हैं जो महिला, गरीब, युवा जैसे वर्गों से अपील करने में फिट बैठते हैं. उन्होंने केंद्र सरकार की कई योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करने में अहम भूमिका अदा की है. ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखने वाले वैष्णव यदि सीएम बनते हैं तो फिर जातीय समीकरणों को साधने के लिए गुर्जर, जाट और राजपूत वर्ग से आने वाले दिग्गज चेहरों को भी डिप्टी सीएम, स्पीकर या अन्य प्रमुख मंत्रालय दिया जा सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी का कहना है कि बीजेपी यूपी की तर्ज पर वन प्लस टू (सीएम और दो डिप्टी सीएम) के फॉर्मूले पर बढ़ सकती है जिससे एक से अधिक जातियों को साधकर चला जा सके, नाराजगी का खतरा कम रहे.
छत्तीसगढ़ में कैसा होगा चेहरा
वहीं छत्तीसगढ़ का बात करें तो एक आदिवासी बहुल राज्य में बीजेपी ने जिस तरह की सफलता हासिल की है उससे पार्टी भी गदगद है. राज्य में बीजेपी ने भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था और महादेव ऐप को लेकर चुनाव के दौरान भूपेश सरकार चारों तरफ से घिर गए थे. अब पार्टी की प्रमुख कोशिश रहेगी कि भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए एक ऐसे नेता को बागडोर दी जाए तो ना केवल ब्यूरोक्रेसी को हैंडल कर सके बल्कि मोदी की चुनावी गारंटियों को लोकसभा चुनाव से पहले धरातल पर सफलता पूर्वक उतार सके.
पूर्व डॉ. रमन सिंह की राजनीतिक पैठ काफी मजबूत है और वह 15 साल सरकार चला चुके हैं. आदिवासी चेहरों की बात करें तो केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह और आदिवासी नेता विष्णुदेव साय का नाम भी संभावित दावेदारों शामिल है. दोनों केद्र में मंत्री है/ रह चुके हैं. प्रशासनिक अनुभव की बात करें तो कई ज़िलों के कलेक्टर रह चुके भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अफसर ओपी ओपी चौधरी भी भारी मतों के अंतर से चुनाव जीत कर आए हैं. युवा विधायक हैं जिनकी युवाओं के बीच काफी लोकप्रियता भी है और चुनाव प्रचार के दौरान गृह मंत्री अमित शाह उनकी खुलकर तारीफ कर चुके हैं
वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध कहते हैं, 'छत्तीसगढ़ में बीजेपी के लिए इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है. आदिवासी सीएम की मांग भी सूबे में लंबे समय से उठती रही है. इसबार आदिवासी बेल्ट में बीजेपी का प्रदर्शन जबरदस्त रहा है. डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव अपनी सीट भी नहीं बचा सके. वहीं, ओबीसी वर्ग का प्रभावशाली साहू समाज भी बीजेपी की ओर रहा. बघेल सरकार में गृह मंत्री रहे ताम्रध्वज साहू भी चुनाव हार गए. लोकसभा चुनाव भी करीब है ऐसे में बीजेपी नहीं चाहेगी कि इनमें से किसी वर्ग को नाराज करें. रमन सिंह की संभावनाएं ना के बराबर हैं. बीजेपी आदिवासी या किसी ओबीसी चेहरे को सीएम बना सकती है या फिर दोनों वर्गों से एक-एक नेता को सीएम और डिप्टी सीएम बना सकती है. रेणुका सिंह की छवि तेज-तर्रार नेता की है और हो सकता है कि बीजेपी उन्हें सीएम बना दे. जातीय और सामाजिक समीकरण साधने के लिए बीजेपी एक सीएम और एक डिप्टी सीएम का फॉर्मूला अपना सकती है.'
मध्य प्रदेश में मामा होंगे रिपीट?
मध्य प्रदेश की बात करें तो पार्टी को चुनाव में शानदार सफलता मिली है.बीच में ढ़ाई साल (कांग्रेस शासन काल) छोड़ दिए जाएं तो शिवराज सिंह चौहान राज्य में 2005 से लगातार अभी तक मुख्यमंत्री हैं. चुनाव के दौरान जिस तरह उन्होंने प्रचार अभियान की कमान संभाली वो किसी से छिपा नहीं है. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भले ही बीजेपी चेहरा बदल दे लेकिन मध्य प्रदेश में शिवराज की छवि का दूसरा नेता अभी कोई नहीं है. हालांकि सीएम के चेहरों को लेकर चुनाव जीतकर आए केंद्रीय मंत्री और ओबीसी लोध चेहरा प्रहलाद पटेल, राजपूत नेता नरेंद्र तोमर और कैलाश विजयवर्गीय के अलावा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी सुर्खियों में चल रहा है.लेकिन शिवराज की 'मामा' वाली छवि, जनसुलभ नेता, लोगों से सीधा संपर्क करने वाली छवि किसी दूसरे नेता की नहीं है.
तो अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र से राज्यों में भेजे गए पर्यवेक्षक विधायक दल की बैठक के बाद किस नाम पर मुहर लगाते है.