
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने मंगलवार को संसद में नारी शक्ति वंदन नाम से महिला आरक्षण बिल पेश कर दिया. 2024 चुनाव से पहले मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माने जा रहे इस बिल ने तो एकबारगी विपक्षी पार्टियों को भी कंफ्यूज कर दिया. कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने संसद भवन जाते हुए इसे चहकते हुए अपना बता दिया तो वहीं दूसरी पार्टियों के नेता भी विरोध नहीं कर पा रहे थे. ऐसा लगा भी कि मोदी सरकार ने मैदान मार लिया है, विपक्ष को महिला आरक्षण के ब्रह्मास्त्र से उलझा दिया है.
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ये बिल पेश हुए अभी 24 घंटे भी नहीं हुए हैं कि तस्वीर बदल गई है. अब विपक्षी पार्टियों ने महिला आरक्षण बिल के विरोध का रास्ता खोज लिया है. 18 सितंबर को संसद के विशेष सत्र के पहले दिन तक जो कांग्रेस सरकार से महिला आरक्षण बिल लाने की मांग कर रही थी, राहुल गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक जिस बिल के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिख रहे थे, लोकसभा में कांग्रेस के फ्लोर लीडर अधीर रंजन चौधरी जिस बिल की क्रेडिट ले रहे थे. उस कांग्रेस के सुर अब बदल गए हैं. समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के साथ कांग्रेस भी अब इस बिल के विरोध में आ गई है.
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कांग्रेस, सपा और आरजेडी महिला आरक्षण के विरोध में किस मुद्दे पर साथ आ गए हैं और क्यों? ये बताने के लिए राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का संबोधन ही काफी है. मल्लिकार्जुन खड़गे ने राज्यसभा में 2010 में उच्च सदन से पारित हुए बिल की याद दिलाई और कहा कि पीएम मोदी हमें क्रेडिट नहीं देते वो अलग बात है. कांग्रेस अध्यक्ष ने लगे हाथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिलाओं को भी आरक्षण देने की मांग कर दी.
कांग्रेस खुद महिला आरक्षण बिल की मांग करती रही है. सरकार ने महिला आरक्षण बिल नए कलेवर में पेश कर दिया. बार-बार अपनी मांग और 2010 में राज्यसभा से पारित विधेयक की याद भी पार्टी को क्रेडिट वार में फ्रंट पर नहीं ला पा रही थी. ऐसे में धर्म संकट ये था कि विरोध करें तो करें कैसे? महिला आरक्षण का विरोध करें तो महिला विरोधी होने का ठप्पा और आधी आबादी के वोट खिसकने का डर, समर्थन करें तो सरकार क्रेडिट देने से रही. आगे कुआं, पीछे खाई वाली ऐसी ही स्थिति में इस आरक्षण का विरोध करती रही दूसरी पार्टियां भी फंसी थीं. कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था लेकिन अब विपक्ष को विरोध के मुद्दे मिल गए हैं.
कांग्रेस ने ओबीसी आरक्षण की बात की तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा कि महिला आरक्षण लैंगिक न्याय और सामाजिक न्याय का संतुलन होना चाहिए. उन्होंने पीडीए फॉर्मूले का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासी (PDA) की महिलाओं के आरक्षण का निश्चित प्रतिशत भी स्पष्ट होना चाहिए. अखिलेश ने भी खुले विरोध की जगह बीच का रास्ता निकाला और पीडीए की बात की.
आरजेडी की ओर से महिला आरक्षण पर राबड़ी देवी ने मोर्चा संभाला. राबड़ी ने आरक्षण के भीतर आरक्षण को अनिवार्य बताते हुए कहा कि अन्य वर्गों की तीसरी और चौथी पीढ़ी की बजाय वंचित वर्गों की महिलाओं की अभी पहली पीढ़ी ही शिक्षित हो रही है. उन्होंने महिला आरक्षण में वंचित, उपेक्षित, खेतिहर और मेहनतकश वर्गों की महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की मांग की और ये याद भी दिलाया कि महिलाओं की भी जाति है.
जेडीयू प्रवक्ता केसी त्यागी ने महिला आरक्षण बिल पेश होने से पहले इसके समर्थन का ऐलान तो किया था लेकिन ये भी जोड़ा था कि महिला आरक्षण में दलित और कमजोर वर्ग की महिलाओं को भी कोटा मिले. महिला आरक्षण बिल का खुलकर विरोध कोई पार्टी नहीं कर पा रही है लेकिन पूरी तरह समर्थन भी नहीं कर पा रही है. सवाल ये उठ रहे हैं कि ऐसा क्यों है?
वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर श्रीराम त्रिपाठी ने कहा कि बीजेपी ने जिस तरह जातीय अस्मिता से ऊपर उठकर हिंदुत्व के नाम पर एक अलग वोट बैंक खड़ा कर लिया. विपक्षी पार्टियों को ये डर है कि कहीं सत्ताधारी दल मजबूत महिला वोट बैंक खड़ा करने में सफल न हो जाए. राबड़ी देवी का ये कहना कि 'मत भूलो, महिलाओं की भी जाति होती है' इसी तरफ इशारा है.
जातीय जनगणना की मांग पर एकमत इन पार्टियों के लिए महिला आरक्षण में ओबीसी का जिक्र नहीं होने ने ही विपक्षी घटक दलों के लिए महिला आरक्षण का विरोधी बने बिना विरोध का रास्ता तैयार कर दिया. आरजेडी और सपा पहले भी महिला आरक्षण का विरोध कर चुकी हैं, ऐसे में मुश्किल कांग्रेस के लिए ही थी. विपक्ष को परिसीमन वाले क्लॉज पर भी आपत्ति है.