पंजाब कांग्रेस में मंगलवार को एक बार फिर घमासान मच गया. 20 सितंबर को चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने के बाद लग रहा था कि पंजाब में अब सब ठीक है, लेकिन ठीक 8 दिन बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि 'समझौता करने से इंसान का पतन हो जाता है और मैं कांग्रेस के भविष्य और पंजाब की भलाई के एजेंडे से कभी समझौता नहीं कर सकता. इसलिए मैं प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देता हूं.' हालांकि, सिद्धू ने ये भी साफ किया कि अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे रहे हैं, लेकिन वो कांग्रेस में बने रहेंगे.
माना जाता है कि सिद्धू से तनातनी के चलते ही कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था. उनके बाद 8 दिन पहले जब चरणजीत सिंह चन्नी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो सिद्धू भावुक हो गए और खुद को संभाल नहीं पाए. चन्नी से हाथ मिलाकर सिद्धू ने एकजुटता भी दिखाई. इतना ही नहीं, 7 दिन पहले सीएम चन्नी के साथ प्राइवेट जेट में बैठकर दिल्ली जाने से पहले 'इन लाइन ऑफ ड्यूटी' की बात भी सिद्धू ने कही.
ये भी पढ़ें-- क्रिकेट हो या राजनीति, बगावत करने का नवजोत सिंह सिद्धू का है पुराना इतिहास
8 दिन पहले तक कहा जा रहा था कि चरणजीत सिंह चन्नी को पहला दलित मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने पंजाब में बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला है. लेकिन 8 दिन में ही सिद्धू ने उसकी हवा निकाल दी. सिद्धू के इस्तीफा देने पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, 'मैंने पहले ही कहा था वो स्थिर आदमी नहीं हैं. पंजाब जैसे सीमा से सटे राज्य के लिए सिद्धू फिट नहीं हैं.' नवजोत सिंह सिद्धू को लेकर अब यही सवाल उठ रहा है कि आखिर वो इतना छोड़ते क्यों हैं? उनका राजनीतिक करियर अभी तक ऐसा ही रहा है.
- 2004 में सिद्धू बीजेपी में आए.
- 2014 में अमृतसर से टिकट नहीं मिला तो नाराज हो गए.
- 2016 में बीजेपी ने सिद्धू को राज्यसभा भेजा. लेकिन 3 महीने में ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया और बीजेपी भी छोड़ दी.
- 2017 में सिद्धू ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया.
- 2019 में पंजाब की कांग्रेस सरकार में मंत्री पद छोड़ दिया.
- इसी साल जुलाई में पंजाब कांग्रेस की कमान सिद्धू को मिली तो 2 महीने में ही सिद्धू ने पंजाब कांग्रेस प्रमुख का पद भी छोड़ दिया.
ये भी पढ़ें-- शिमला से छुट्टी मनाकर दिल्ली भी नहीं पहुंचे थे सोनिया और राहुल गांधी, आ गया सिद्धू का इस्तीफा
.... कहीं ये वजह तो नहीं?
क्या इसके पीछे कहानी ये है कि सिद्धू ने पंजाब में सत्ता का फूल खिलाने की जो कोशिश दिल्ली आलाकमान तक दौड़भाग करके की, उस फूल को चरणजीत सिंह चन्नी राजकुंवर बनकर सिद्धू के सामने से ले गए. पंजाब में 20 तारीख को राहुल ने चन्नी का हाथ पकड़ा था और चन्नी का हाथ नवजोत सिंह सिद्धू ने पकड़कर रखा था. लेकिन अतिमहत्वाकांक्षी बताए जाने वाले सिद्धू को जब लगने लगा कि चन्नी ही चेहरा हो चुके हैं तो उन्हें अपना चेहरा पीछे होता दिखने लगा. तो सिद्धू ने पंजाब की भलाई और समझौते से इनकार करने के नाम पर इस्तीफा तो दे दिया.
जानकार कहते हैं कि असली कहानी कुछ और ही है. बताया जा रहा है कि सिद्धू सीएम पद नहीं मिलने से नाराज थे. फिर कैप्टन के करीबियों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने से नाराजगी बढ़ी. दावा है कि एडवोकेट जनरल और डीजीपी की नियुक्ति में भी सिद्धू की नहीं चली. इसके अलावा सीएमओ में भी अफसरों की नियुक्ति को लेकर भी चन्नी ने भी खुद ही फैसला लिया, जिससे सिद्धू खुश नहीं थे.
बैठकें तो हो रहीं, लेकिन जनता के हित में नहीं
20 सितंबर को चन्नी मुख्यमंत्री बनते हैं. 6 दिन बाद कैबिनेट का विस्तार करते हैं. दो दिन बाद विभागों का बंटवारा होता है. और तभी सिद्धू प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे देते हैं. सिद्धू के इस्तीफे के बाद फिर से पंजाब में घमासान शुरू हो गया है. उनके कई समर्थक मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया है. पटियाला में सिद्धू के घर पर बैठकें भी हुईं. बैठकों का दौर शुरू हो गया है. लेकिन ये बैठकें जनता के हित में नहीं, बल्कि पार्टी और अपनी अपनी कुर्सी बचाने के हित में हो रहीं हैं. 6 महीने बाद चुनाव है और कुछ ही महीनों में आचार संहिता लग जाएगी. सवाल सीधा है कि फिर काम कब होगा जब सत्ता के लिए उथल-पुथल मची रहेगी?
(आजतक ब्यूरो)