पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने केंद्र सरकार को चेताया है कि यदि सतलुज-यमुना नहर बनी तो पंजाब जल उठेगा. अमरिंदर सिंह ने यह बयान केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के साथ बुलाई गई बैठक में दिया, जहां हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी मौजूद थे. पिछले 44 सालों से सतलुज-यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) को लेकर हरियाणा और पंजाब के बीच विवाद है और अभी तक नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है. सुप्रीम कोर्ट के हस्ताक्षेप के बाद अब एक बार फिर दोनों राज्य सरकारें आमने-सामने हैं.
पंजाब और हरियाणा के बीच सतलुज-यमुना लिंक नहर एक सियासी मुद्दा बन चुका है. पंजाब हमेशा से एसवाईएल के पानी का विरोध करता रहा है और अभी भी अपने पुराने स्टैंड पर कायम है. पंजाब और हरियाणा में जब भी अलग-अलग पार्टियों की सरकारें होती हैं तब इस मुद्दा पर कुछ ज्यादा ही सियासी संग्राम छिड़ जाता है. मौजूदा समय में केंद्र में भाजपा सरकार है और पंजाब में कांग्रेस सरकार जबकि हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार है.
हरियाणा में हुड्डा सरकार के दौरान इनेलो नेता अभय सिंह चौटाला इस मुद्दे को लेकर सक्रिय थे. वे विधानसभा में भी इस मुद्दे पर आक्रामक रहे हैं और एसवाईएल को लेकर धरना-प्रदर्शन भी करते रहे हैं. हाल ही में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने तो सोची समझी रणनीति के तहत पंजाब जा कर ये बयान दिया है कि एसवाईएल का पानी हम ले कर रहेंगे. इसी के बाद पंजाब कांग्रेस सरकार के तेवर सख्त हो गए हैं.
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हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह दोनों राज्यों के बीच मध्यस्थता कर सतलुज यमुना लिंक कैनाल को पूरा कराए. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल और कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पानी को लेकर चर्चा की. केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बैठक की अध्यक्षता की, लेकिन कोई हल नहीं हो सका. इसी के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि सतलुज-यमुना नहर बनी तो पंजाब जल उठेगा और ये राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बन जाएगा. केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि अगली बैठक के बाद सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी जाएगी.
बता दें कि 1966 में पंजाब से जब अलग हरियाणा राज्य बना तभी से यह विवाद है. 10 साल के लंबे विवाद के बाद 1976 में दोनों राज्यों के बीच जल बंटवारे को अंतिम रूप दिया गया और इसी के साथ सतलुज यमुना नहर बनाने की बात कही गई. 24 मार्च 1976 को केंद्र सरकार ने पंजाब के 7.2 एमएएफ यानी मिलियन एकड़ फीट पानी में से 3.5 एमएएफ हिस्सा हरियाणा को देने की अधिसूचना जारी की थी.
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इसको लेकर 1981 में समझौता हुआ और पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने 8 अप्रैल 1982 को पंजाब के पटियाला जिले के कपूरई गांव में एसवाईएल का उद्घाटन किया था. हालांकि, इसके बाद भी विवाद नहीं थमा बल्कि या यूं कहें कि विवाद और भी बढ़ता गया. 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एसएडी प्रमुख हरचंद सिंह लोंगोवाल से मुलाकात की थी और फिर एक नए न्यायाधिकरण के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे. हरचंद सिंह लोंगोवाल को समझौते पर हस्ताक्षर करने के एक महीने से भी कम समय में आतंकवादियों ने मार दिया था. 1990 में नहर से जुड़े रहे एक मुख्य इंजीनियर एमएल सेखरी और एक अधीक्षण अभियंता अवतार सिंह औलख को आतंकवादियों ने मार दिया था. इसके बाद हरियाणा सरकार ने 1996 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था.
पंजाब रुख का रुख हमेशा रहा खिलाफ
2004 में तो पंजाब ने इस समझौते को मानने से ही इनकार कर दिया था. कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि अब तक इसका 90 फीसदी कार्य पूरा भी हो चुका है, जो काम बचा वह पंजाब के हिस्से का है. यह इसलिए कि पंजाब के राजनेता पड़ोसी राज्य हरियाणा के साथ पानी साझा करने के पक्ष में नहीं हैं. पंजाब नहर के लिए अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस कर चुका है. इसके लिए एक विधेयक भी विधानसभा में पारित किया गया था, जिससे स्थिति और अधिक जटिल हो गई है और नहर को मिट्टी से भर दिया गया है.
पंजाब का नया फॉर्मूला
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब जब केंद्र के जल शक्ति मंत्री और पंजाब व हरियाणा के मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई तो यह विवाद फिर सामने आ गया. अमरिंदर सिंह ने कहा कि पंजाब के विभाजन के बाद पानी को छोड़कर हमारी सभी संपत्तियां 60 और 40 के आधार पर बांटी गईं, क्योंकि उस पानी में रावी, ब्यास और सतलुज का पानी शामिल था, लेकिन यमुना का नहीं. मैंने सुझाव दिया है कि उन्हें यमुना का पानी भी शामिल करना चाहिए और फिर इसे 60 और 40 के आधार पर विभाजित करना चाहिए. हालांकि, पंजाब के इस फॉर्मूले पर हरियाणा राजी नहीं है. ऐसे में अब 15 दिन बाद दोबारा बैठक होगी, जिसके बाद कोई हल निकल सकेगा.
एसवाईएल का मुद्दा पंजाब के लिए राजनैतिक अधिक है. यह मामला सूबे में सरकार बदलने की क्षमता रखता है. इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार हरियाणा के पक्ष में फैसले दिए जाते रहे हैं. 2017 में तो एसवाईएल पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मुकदमा भी पंजाब सरकार के खिलाफ दर्ज हुआ था, जब हरियाणा के पक्ष में आए फैसले के अगले ही दिन पंजाब सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उलट फैसला लेते हुए आदेश जारी किए थे.
पंजाब ने यह भी कहा कि हम अदालती आदेश का पालन करना चाहते हैं, लेकिन अपने किसानों को नजरअंदाज कर ऐसा नहीं कर सकते. हमारे किसान भूख से मरें और हम सतलुज, यमुना और ब्यास नदी का पानी किसी और क्यों दें. पानी हमारी जरूरत हैं. पंजाब के इसी रुख के कारण वर्षों से इस मामले का समाधान नहीं निकल पा रहा और अब फिर एक बार हरियाणा और पंजाब की सरकार आमने-सामने हैं.