कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में सरकार और कांग्रेस की आलोचनाओं पर जवाब देते हुए नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने कहा कि उसे सरकारी नीतियां बनाने की प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों की पड़ताल करने का अधिकार है.
कैग के सूत्रों ने कहा, ‘सरकार की नीतियां हवा में से नहीं आती बल्कि एक जरूरी प्रक्रिया की परिणति होती हैं जिनमें शासन के उच्च मूल्यों, क्रियान्वयन की व्यावहारिकता, वित्तीय लागत को मूर्त रूप दिये जाने और मौजूदा तथा उचित पूर्वानुमान वाले तथ्यों के आधार पर आंके गये फायदों को लेकर अनुभव आधारित साक्ष्यों का विश्वसनीय अध्ययन और विश्लेषण शामिल है.’
सूत्रों ने कहा कि सार्वजनिक नीति के विकास और इसके क्रियान्वयन तथा वित्तीय प्रभावों के बीच करीब रिश्ता होने के चलते यह अपेक्षा करना वास्तविक नहीं होगा कि कैग के लेखा परीक्षण के निष्कर्षों का नीति पर कोई प्रभाव नहीं हो. हमें यथार्थवादी होना चाहिए.
कैग के सूत्र सरकार की आलोचना और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के एक लेख पर प्रतिक्रिया दे रहे थे. तिवारी ने सरकार की नीतियों पर अध्ययन करने के कैग के अधिकार पर प्रश्नचिह्न लगाया है.
कैग ने देश में 57 कोयला ब्लॉकों के आवंटन से सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होने की बात कही है. जिस पर सरकार और कांग्रेस ने इस संवैधानिक संस्था को आड़े हाथों लिया है.
संसद में भी इस रिपोर्ट को लेकर पिछले हफ्ते से ही गतिरोध जारी है.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कोयला ब्लॉक आवंटन पर कैग की रिपोर्ट पर सवाल खड़ा करते हुए इसे विवादास्पद कहा था.
तिवारी ने 28 अगस्त को एक अखबार में अपने लेख में लिखा, ‘कैग को अपना खुद का नीति संबंधी सुझाव देने तथा उनका राष्ट्रीय या यहां तक कि काल्पनिक नुकसान या फायदे की गणना करने के लिए इस्तेमाल करने का संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है.’
कैग के सूत्रों ने कहा कि कैग अधिनियम 1971 की धारा 16 और 17 में ‘प्रभावी नियंत्रण’ और ‘भंडार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है.
उन्होंने कहा कि प्रभावी का मतलब बारीकियों के बहाने चीजों को छिपाने का और ऐसी चीजों से नजर हटाने से नहीं है जो स्पष्ट तौर पर विवेकाधिकारों का अपारदर्शी इस्तेमाल है. इस पर पिछले साल कांग्रेस की माननीय अध्यक्ष (सोनिया गांधी) ने भी असहमति जताई थी.