अमेरिका की प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की अगुवाई में हुए ‘नमक सत्याग्रह’ को दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली दस आंदोलनों में शामिल किया है.
वर्ष 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में दांडी यात्रा के दौरान किए गए नमक सत्याग्रह को टाइम ने दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले 10 महत्वपूर्ण आंदोलनों की सूची में दूसरे स्थान पर रखा है.
बापू ने मार्च 1930 में अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से 24 दिन की यात्रा शुरू की थी. यह यात्रा समुद्र के किनारे बसे शहर दांडी के लिए थी जहां जा कर बापू ने औपनिवेशिक भारत में नमक बनाने के लिए अंग्रेजों के एकछत्र अधिकार वाला कानून तोड़ा और नमक बनाया था.
इस अहिंसक आंदोलन के बाद देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ था.
टाइम ने ‘नमक सत्याग्रह’ के बारे में लिखा है कि इस सत्याग्रह ने ब्रिटिश वर्चस्व तोड़ने के लिए भावनात्मक एवं नैतिक बल दिया था. पत्रिका के अनुसार, भारत पर ब्रिटेन की लंबे समय तक चली हुकूमत कई मायने में चाय, कपड़ा और यहां तक कि नमक जैसी वस्तुओं पर एकाधिकार कायम करने से जुड़ी थी.
पत्रिका के अनुसार, औपनिवेशिक हुकूमत के तहत भारतीय न तो खुद नमक बना सकते थे और न ही बेच सकते थे. उन्हें ब्रिटेन में बना और वहां से आयात किया गया महंगा नमक खरीदना पड़ता था.
पत्रिका ने ‘बापू’ के बारे में लिखा है कि करिश्माई व्यक्तित्व के धनी स्वतंत्रता आंदोलन के नेता महात्मा गांधी ने अहमदाबाद शहर से छोटे से समुद्र तटीय शहर दांडी के लिये 24 दिवसीय नमक सत्याग्रह शुरू किया. इस यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में बापू के समर्थक उनके साथ जुड़ गये. टाइम ने लिखा है कि महात्मा गांधी और उपस्थित जनसमुदाय ने समुद्र से नमक बनाया. इसकी वजह से हजारों भारतीय कुछ महीने के अंदर गिरफ्तार किये गये. इससे एक चिंगारी भड़की जो सविनय अवज्ञा आंदोलन में बदल गई. इसने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष और स्वयं गांधी को पारिभाषित किया.
पत्रिका ने लिखा है कि इस विरोध मार्च को ‘नमक सत्याग्रह’ कहा गया. इसने भारत में विदेशी हुकूमत के पतन का भावनात्मक और नैतिक आधार दिया.
टाइम ने 10 प्रभावशाली आंदोलनों की सूची में अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलन में निर्णायक भूमिका निभाने वाली ‘बोस्टन चाय पार्टी’ को पहले स्थान पर रखा है. वर्ष 1963 में वाशिंगटन में निकाले गये ‘सिविल राइट मार्च’ को तीसरा स्थान मिला है.
इस सूची में समलैंगिक अधिकारों को लेकर वर्ष 1969 में न्यूयार्क में चले स्टोनवाल आंदोलन को चौथा, वियतनाम युद्ध के खिलाफ वाशिंगटन में हुए विशाल प्रदर्शन को पांचवा, ईरान में 1978 के मोहर्रम विरोध प्रदर्शन को छठवां और वर्ष 1986 में हुए पीपुल पॉवर विरोध प्रदर्शन को सातवां स्थान दिया गया है.
चीन में थियानमन चौराहे के विरोध प्रदर्शन को आठवें, दक्षिण अफ्रीका में केपटाउन के परपल रेन प्रोटेस्ट को नौंवे और अंत में मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के खिलाफ इस वर्ष जनवरी में हुए विशाल प्रदर्शन को पत्रिका ने 10वें स्थान पर रखा है.