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मछली पालन ने बदला मछुआरों के जीने का अंदाज

कभी वे पुश्तैनी मछुआरे हुआ करते थे, मगर बदले हालात ने उन्हें इस धंधे से दूर कर दिया और वे कम्बल बेचने लगे. लेकिन बीता वर्ष उनके लिए बदलाव की बयार लेकर आया और एक बार फिर वे पुश्तैनी धंधे की ओर लौट गए. मछली पालन के पुश्तैनी धंधे ने अब उनके जीने का अंदाज ही बदल दिया है. ये लोग मंदसौर जिले के गोपालपुर गांव के हैं.

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मध्य प्रदेश
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कभी वे पुश्तैनी मछुआरे हुआ करते थे, मगर बदले हालात ने उन्हें इस धंधे से दूर कर दिया और वे कम्बल बेचने लगे. लेकिन बीता वर्ष उनके लिए बदलाव की बयार लेकर आया और एक बार फिर वे पुश्तैनी धंधे की ओर लौट गए. मछली पालन के पुश्तैनी धंधे ने अब उनके जीने का अंदाज ही बदल दिया है. ये लोग मंदसौर जिले के गोपालपुर गांव के हैं.

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पुश्तैनी धंधे से दूर होकर कंबल बेचने वालों के लिए वर्ष 2011 नई खुशी ले कर आया. यह संभव हुआ मध्य प्रदेश वाटर सेक्टर रिस्ट्रक्चरिंग परियोजना के जरिए.

गोपालपुर गांव के इन मछुआरों को बड़े आकार की मछलियों के सवा लाख बिचड़े (फिंगरलिंग्स) मिले. इन बिचड़ों से बाद में बड़े आकार की मछलियां निकलीं.

अपने पुश्तैनी काम की ओर लौटे 14 मछुआरों को उन्नत तरीके से मछली पालन करने का प्रशिक्षण भी दिया गया. इतना ही नहीं, उन्हें मछली पकड़ने के लिए जाल दिए गए. इन सब संसाधनों के जुटने से तालाब से 15 मीट्रिक टन मत्स्य-उत्पादन हुआ. बड़े आकार की मछलियों की बिक्री से सात लाख की आमदनी हुई.

सहकारी समिति ने मछलियों को तुरंत बाजार तक ले जाने के लिए एक वाहन खरीद लिया. उनके तालाब में 12 टन मछलियां अभी और हैं.

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गोपालपुर की विजय मत्स्योद्योग सहकारी समिति में 29 सदस्य हैं, जिनमें 14 महिलाएं हैं. समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार मल्ल ने बताया कि संसाधनों के मिलने से आर्थिक फायदा हुआ है और हमारे घरों में खुशियां लौट आईं. बच्चे अब स्कूल जाने लगे हैं. कम्बल बेचने की यायावर जिंदगी से भी उन्हें मुक्ति मिल गई है.

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