बिहार विधानसभा चुनाव, 2010 के नतीजों और रुझानों ने चार मुख्य तथ्य को रेखांकित किया है:
पहली बात तो यह कि जेडीयू-बीजेपी गठबंधन को मिले जनसमर्थन ने यह दिखा दिया है कि बिहार की जनता अब जाति-पांत की सोच से ऊपर उठ चुकी है. जनता ने सुशासन के पक्ष में वोट दिया है, जो कि लालू प्रसाद के 15 साल के कार्यकाल में देखने को नहीं मिला था.
परिणामत: मुस्लिम-यादव गठजोड़ के बावजूद लालू-पासवान की जोड़ी को सफलता नहीं मिल सकी. पहले ऐसी अटकल लगाई जा रही थी कि बिहार के यादव बहुल इलाकों में जेडीयू का प्रदर्शन खराब रहेगा, लेकिन मतगणना के बाद यह आशंका भी पूरी तरह निर्मूल साबित हुई. इस तरह के 50 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान के दौरान मुसलमानों की भागीदारी 20 फीसदी से ज्यादा रही. जेडीयू की सहयोगी पार्टी बीजेपी थी, इसके बावजूद मुसलमानों ने नीतीश के पक्ष में ही वोट डाला और गठबंधन को बेहतरीन कामयाबी हासिल हुई. {mospagebreak}
इस चुनाव में गौर करने वाली दूसरी बात यह है कि बिहार में बीजेपी का जोरदार तरीके से अभ्युदय हुआ है. वर्ष 2005 के चुनाव में बीजेपी 54 सीटों पर काबिज थी, जबकि इस बार यह 80 से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करने जा रही है. हालांकि ऐसा नीतीश कुमार के करिश्मे के कारण ही हो सका है. इसका यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि बिहार की जनता पहले से ज्यादा सांप्रदायिक हो गई है.
तीसरी बात, कई विधानसभा क्षेत्रों में महिलाओं के मतदान का प्रतिशत पुरुषों के मतदान से 10 फीदसी ज्यादा रहा. महिलाओं की उन्नति को ध्यान में रखकर तैयार की गई सरकारी योजनाओं ने भी जेडीयू को कामयाबी दिलाने में अहम भूमिका निभाई. पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण, प्राथमिक स्कूलों में भर्ती में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण, मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना आदि इनमें प्रमुख हैं. साइकिल योजना के तहत नौवीं व इससे ऊपर की कक्षा में पढ़ने वाली लड़कियों को साइकिल के लिए 2000 रुपये का अनुदान दिया जाता है. {mospagebreak}
अंतिम बात, कांग्रेस की स्थिति 2005 की तुलना में बदतर रही है. पहले चरण के चुनाव के बाद इस तरह की अफवाह फैली कि लालू प्रसाद की पार्टी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है. इस बात से अड़गी जाति के वोटर नीतीश कुमार की अगुवाई वाले गठबंधन के पक्ष में वोट डालने को और भी ज्यादा प्रेरित हुए.नीतीश कुमार ने एक बेहतर भूमि सुधार कानून को वापस ले लिया था.
स्पष्ट है कि राहुल गांधी का जादू भी इस बार नहीं चल सका. सच कहा जाए तो कांग्रेस के हाथ निराशा ही आई है, जबकि राहुल के अलावा सोनिया गांधी ने भी चुनाव-प्रचार में भागीदारी की थी.