2002 के गुजरात दंगे पर आज तक करने जा रहा है बड़ा खुलासा. दंगे से पहले और दंगे के दौरान कैसे पुलिस कंट्रोल रूम को दंगे की आशंका के संदेश मिल रहे थे, सरकार उस पर क्या कर रही थी, इससे जुड़ी तमाम जानकारियां आज तक के पास हैं.
27 फरवरी 2002 को सुबह 7 बजकर 43 मिनट पर साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन पर पहुंची. उस ट्रेन में अयोध्या से लौट रहे तीर्थयात्री बैठे थे. जैसे ही ट्रेन खुली, लोगों ने इमरजेंसी ब्रेक दबा दिया, क्योंकि ट्रेन के कोच नंबर एस-6 और 7 में आग लग गयी थी. इस हत्याकांड में 59 मासूम लोग जलकर मर गए. इस गोधरा कांड के बाद फैले भयानक दंगे ने 1044 लोगों की जान ले ली.
गुजरात में बीजेपी के बहुत से नेताओं का दावा है कि दंगे तो गोधरा कांड की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 मार्च को एक इंटरव्यू में कहा कि गोधरा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया में दंगे हुए. हम गोधरा और उसके बाद जो कुछ हुआ, उसकी संयुक्त जांच कराएंगे.
मार्च 2002 में आरएसएस की ऑल इंडिया जनरल कौंसिल की बैठक में एक प्रस्ताव पास हुआ. उस प्रस्ताव में गोधरा के बाद फैली हिंसा को साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग का स्वाभाविक और सहज प्रतिक्रिया बताया गया लेकिन वो दंगा लोगों के गुस्से का तत्काल नतीजा नहीं था. दंगा भड़कने से काफी पहले ही वीएचपी के नेता भीड़ को भड़का रहे थे और पुलिस भी उस खतरनाक साजिश से वाकिफ थी, जो उस वक्त बुना गया.
आज तक को पुलिस कंट्रोल रूम के संदेश और सूबे के इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट मिले हैं, जिन्हें गोधरा कांड के तुरंत बाद तैयार किया गया था. अप्रैल 2011 में पी सी पांडे ने इन रिपोर्टों को स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम के सामने पेश किया. पांडे 2002 के दंगो के वक्त अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर थे. सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 7 फरवरी को गुजरात सरकार को ये निर्देश दिया कि वो सभी पीसीआर रिकॉर्ड्स और खुफिया रिपोर्ट जाकिया जाफरी को सौंप दे ताकि वो उस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के खिलाफ विरोध याचिका दायर कर सकें, जिसने गुजरात सरकार को क्लीन चिट दे दी थी.
28 फरवरी 2002 को जाकिया जाफरी के पति और कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी को 69 और लोगों के साथ गुलबर्ग सोसायटी में जिंदा जला दिया गया था. अपनी शिकायत में जाकिया ने दंगा बढ़ाने और भड़काने के लिए नरेंद्र मोदी और 57 दूसरे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की.
फिर भी गुजरात सरकार की भूमिका की जांच करने वाली एसआईटी ने मार्च 2012 में क्लोजर रिपोर्ट पेश कर दी. इस रिपोर्ट में दंगे को रोकने में नाकामी के लिए गुजरात सरकार की खिंचाई की गयी थी, लेकिन एसआईटी को मोदी और दूसरे आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने लायक सबूत नहीं मिले. इसी सुबह जाकिया जाफरी ने एसआईटी से नरेंद्र मोदी को मिली क्लीन चिट के खिलाफ एक विरोध याचिका दायर की.
जो पीसीआर रिकॉर्ड्स और स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो रिपोर्ट आज तक के पास हैं, वो सारे जाकिया जाफरी की तरफ से दायर याचिका में शामिल हैं. एसआईटी के सामने गुजरात पुलिस ने ऑन रिकॉर्ड ये दावा किया है कि इन पुलिस वायरलेस मैसेजेज को हासिल नहीं किया जा सकता क्योंकि इनको नष्ट कर दिए जाने की संभावना है लेकिन ये सच नहीं है.
2002 में अहमदाबाद में दो सेंट्रलाइज्ड पुलिस कंट्रोल रूम बनाए गए थे. शहर के बीचों-बीच स्थित शाहीबाग में अहमदाबाद पुलिस कंट्रोल रूम. 28 फरवरी को जिस नरोडा और गुलबर्ग सोसायटी में करीब डेढ़ सौ लोग जलकर मर गए, वो दोनों इलाके पुलिस कंट्रोल रूम के छह किलोमीटर के दायरे में आते हैं. दूसरा, स्टेट पुलिस कंट्रोल रूम गांधीनगर के पुलिस भवन में स्थित है.
अहमदाबाद पुलिस कंट्रोल रूम को अहमदाबाद शहर में लोगों के जमावड़े का पूरा संदेश मिल रहा था. वही स्टेट कंट्रोल रूम को राज्य के अलग-अलग जिलों से मैसेज मिल रहे थे.
फरवरी 2012 में एसआईटी ने अहमदाबाद कोर्ट में एक लिफाफाबंद रिपोर्ट पेश की, जिसमें सिर्फ अहमदाबाद सिटी पीसीआर के मैसेजेज हैं. उस रिपोर्ट की एक कॉपी आज तक के पास है.
एक तीसरा कंट्रोल रूम भी था. वो गांधीनगर के पुलिस भवन के अंदर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के हेडक्वार्टर में था. ये वही बिल्डिंग है, जहां राज्य के डीजीपी बैठते हैं. इस एसआईबी कंट्रोल रूम में राज्य भर में फैले इसके खुफिया यूनिट्स की तरफ से भेजी गयी इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स आ रही थीं. इनमें अहमदाबाद और गांधीनगर की भी रिपोर्ट्स थीं. ये एसआईबी रिपोर्ट्स भी एसआईटी की तरफ से कोर्ट में पेश हो चुकी हैं. इनकी भी एक कॉपी आज तक के पास है.
27 फरवरी के दोपहर तक, गुजरात सरकार के गृह विभाग के पास हर जगह की पुलिस से दनादन ये मैसेज आने लगे कि वीएचपी और बजरंग दल के कैडर लामबंद हो रहे हैं. पूरे राज्य में दंगाई मीटिंग करने लगे. भडकाऊ भाषण देने लगे और भीड़ को उकसाने लगे. पुलिस ने स्टेट इंजेलिजेंस ब्यूरो को सैकड़ों वायरलेस मैसेजेज भेजे, जो सभी दस्तावेजों में रिकॉर्ड हैं. जिन दस्तावेजों को आपने पहले कभी नहीं देखा, वो आज तक के पास हैं.
गोधरा त्रासदी के चंद घंटों के भीतर ही गुजरात वीएचपी के तीन वरिष्ठ नेता- जयदीप पटेल, दिलीप त्रिवेदी और कौशिक पटेल ने राज्यव्यापी बंद के लिए एक बयान जारी किया. 27 फरवरी 2002 को रात 8 बजकर 38 मिनट पर एक अधिकारी ने इस बयान को एसआईबी के हेडक्वार्टर में फैक्स किया था.
27 फरवरी, 2002, रात 8 बजकर 38 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो मैसेज नंबर- पेज नंबर 188 (एनेक्सचर- III, फाइल-XVIII)
वीएचपी के महासचिव दिलीप त्रिवेदी और संयुक्त सचिव जयदीप पटेल और कौशिक मेहता ने बयान दिया. वीएचपी ने बंद का एलान किया. गुजरात बंद कार सेवकों के मारे जाने के विरोध में है. बयान में कहा गया है कि गोधरा हमले के लिए मुसलमानों ने पहले से तैयारी कर रखी थी. मासूम महिलाओं से छेड़छाड़ हुआ और बोगियों में आग लगा दी गयी और रामसेवकों को जिंदा जला दिया. 27 फरवरी को पूरे दिन एसआईबी कंट्रोल रूम को वो मैसेजेज मिलते रहे, जिनमें वीएचपी की भड़काऊ नारेबाजी और लोगों को लामबंद करने की बात थी.
27 फरवरी 2002
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो मैसेज नंबर- पेज नंबर 345, ऑर्डर नंबर 24 (एनेक्स्चर III फाइल XIX)
भेजने वाला- डीओ, अहमदाबाद
पाने वाला- इंटेलिजेंस ऑफिस, विरनगाम (अहमदाबाद)
विरनगाम टाउन चाली और गोलवाडा इलाके में वीएचपी और बजरंग दल के 75 सदस्य इकट्ठा हुए. इलाके में हालात बेहद तनावपूर्ण.
27 फरवरी, 2002, समय- 6 बजकर 10 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो मैसेज- नंबर 531
पेज नंबर 19 (एनेक्स्चर III, फाइल XVIII (डी-160)
गोधरा से आने वाली साबरमती एक्सप्रेस अहमदाबाद स्टेशन पर शाम साढ़े चार बजे पहुंची. रॉड और लाठी से लैस कारसेवकों की नारेबाजी- ‘खून का बदला खून.’
रात 10 बजकर 12 मिनट पर भावनगर सीआईडी, इंटेलिजेंस के पुलिस इंस्पेक्टर ने गांधीनगर में गुजरात स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के इंस्पेक्टर जनरल को एक फैक्स भेजा. इसमें कहा गया कि साधु समाज के अध्यक्ष गोपाल नंद और स्थानीय वीएचपी नेताओं ने जूनागढ़ में भीड़ को बदला लेने के लिए उकसाया. मैसेज में कहा गया कि वीएचपी नेताओं ने नफरत फैलाने वाले भाषण दिए और लोगों को एकजुट होने के लिए कहा.
27 फरवरी 2002, समय- रात 10 बजकर 12 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज- 311/02
पेज नंबर- डी-1/ एचए/जहर सभा/जूनागढ़
भेजने वाला- सीआईडी, भावनगर
पाने वाला- आईजी, गुजरात और इंटेलिजेंस ब्यूरो, गांधीनगर
साधु समाज के अध्यक्ष गोपाल नंद ने जूनागढ़ कदवा चौक पर शाम साढ़े सात बजे से रात 9 बजे के बीच भड़काऊ भाषण दिया. गोपाल नंद ने ट्रेन में आग लगने के 12 घंटे बाद भी हिंदुओं की तरफ से जवाब नहीं दिए जाने पर सवाल किया. गोपाल नंद ने भारत के प्रति खास वर्गों की देशभक्ति पर सवाल खड़ा किया और भीड़ को हमला करने के लिए उकसाया. 27 तारीख की दोपहर तक दंगे भड़क गए.
27 फरवरी 2002, समय- शाम 5 बजकर 45 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज- 273
फाइल XIX एनेक्सचर III
भेजने वाला- बी एम मोहित आनंद सेंटर
साबरमती एक्सप्रेस दोपहर तीन बजे आणंद रेलवे स्टेशन पर पहुंची. कारसेवकों ने स्टेशन पर मौजूद एक खास वर्ग के चार लोगों को छूरा घोंप दिया. आनंद के एक 65 वर्षीय निवासी अब्दुल राशिद की मौत. बाकी सभी आणंद सरकारी अस्पताल में भर्ती.
पूरे राज्य से कारसेवकों की तरफ से हिंसक हमलों की रिपोर्ट आने लगी. हिंसा का एक दूसरा केंद्र बन रहा मोदासा के वडाग्राम में वीएचपी के कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़ने लगी. अतिरिक्त सुरक्षा के लिए इमरजेंसी संदेश लगातार आ रहे थे. पूरी भीड़ रात भर ऊफान पर थी. वो घरों और गाडि़यों में आग लगा रहे थे.
27 फरवरी 2002, समय- रात 11 बजकर 59 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स मैसेज- Com/HM/550/ Out No. 398
भेजने वाला- एसीपी, गांधीनगर रीजन
पाने वाला- आईजी, गुजरात और इंटेलिजेंस ब्यूरो, गांधीनगर
अहमदाबाद से 50 कार सेवक स्पेशल बस में सवार होकर शाम साढ़े 6 बजे मोदासा के वड़ाग्राम में पहुंचे. 500 लोगों की भीड़ ने कारसेवकों की अगवानी की. कारसेवकों ने भीड़ को साबरमती एक्सप्रेस में अटैक के बारे में बताया. रात साढ़े नौ बजे तक भीड़ हजारों में पहुंच गयी. हालात पर काबू पाने में वहां मौजूद पुलिस नाकाफी थी. एक खास वर्ग की दस दुकानें और कई गाडि़यों में भीड़ ने आग लगा दी.
इन तमाम चेतावनी के बावजूद गुजरात सरकार की तरफ वीएचपी नेताओं और उनकी लामबंदी को रोकने की कोई पहल नहीं हुई और ना ही वीएचपी और बजरंग दल के सदस्यों को हिरासत में लिया गया. स्पेशल इन्वेट्सिटगेशन टीम ने अपनी रिपोर्ट में कबूल किया कि वीएचपी के बंद को मोदी सरकार का समर्थन हासिल था. एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट के पेज नंबर 134 में लिखा है कि गृह विभाग के अंडर सेक्रेट्री श्री विजय बढ़ेका ने एसआईटी के सामने कहा कि 28 फरवरी 2002 का गुजरात बंद और 1 मार्च 2002 का भारत बंद- दोनों को ही बीजेपी का समर्थन था.
बंद ने वीएचपी को मनमानी की खुली छूट दे दी, बावजूद इसके कि एसआईबी दंगे शुरु होने के संकेत दे रहा था और इन्हें रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने की मांग कर रहा था.
28 फरवरी 2002, समय: सुबह 9 से 10 बजे के बीच
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो मैसेज नंबर- 73/02
पेज नंबर- 365 (Annexure III File XXI (D-166)
भेजने वाला- एसीपी (इंटेलिजेंस), सूरत
वीएचपी, बीजेपी नेताओं ने वापी शहर के सरदार चौक पर भड़काऊ भाषण दिए. वीएचपी के दिनेश बेहरी, बजरंग दल के आचार्य ब्रह्मभट्ट, बीजेपी के जवाहर देसाई और आरएसएस के विनोद चौधरी भी मौजूद थे. बोलने वाले भीड़ को गोधरा का बदला लेने के लिए उकसा रहे थे.
28 फरवरी 2002, समय- सुबह 9 बजकर 24 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो
पेज नंबर- 37 (Annexure III, File XVIII, D-160
पाने वाला- एसीपी, इंटेलिजेंस, अहमदाबाद रीजन
बजरंग दल और वीएचपी के सदस्य अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए मोटरसाइकिलों पर घूम रहे हैं. वीएचपी और बजरंग दल के सदस्य धारदार हथियारों से लैस हैं.
28 फरवरी 2002, समय- सुबह 10 बजकर 53 मिनट
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो
पेज नंबर- 12 (Annexure III, File XVIII, D-160
पाने वाला- एडीजीपी, गांधीनगर
बीजेपी नेता मनोज भाई, वीएचपी नेता शैलेश केला और बजरंग दल नेता धर्मेंद्र खत्री भीड़ की अगुवाई कर रहे हैं. ये नेता हिंसा में लिप्त हैं, जबरन बंद करा रहे हैं. जब अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर पीसी पांडे और राज्य के डीजीपी के चक्रवर्ती से एसआईटी ने पूछताछ की, वो लोग इन एसआईबी रिपोर्ट्स का मुकम्मल जवाब नहीं दे पाए. 24 मार्च 2010 को एसआईटी के सामने दिये अपने बयान के पेज नंबर 7 पर पांडे ने कहा है कि 27 फरवरी 2002 या 28 फरवरी 2002 को ऐसी परिस्थिति नहीं थी कि कर्फ्यू लगाया जाए और जल्दबाजी में उठाया गया कोई भी कदम शहर में तनाव बढ़ाता. दूसरी तरफ सीमित बल के साथ कर्फ्यू लागू करने से शहर में गंभीर समस्या खड़ी होती और लोग बार-बार कर्फ्यू का उल्लंघन करते.
राज्य सरकार ने एसआईटी के सामने कहा कि 2002 का गुजरात दंगा गोधरा त्रासदी की त्वरित प्रतिक्रिया थी, लेकिन दस्तावेजी सबूत कुछ अलग कहानी ही बयां करती है. पीसीआर और एसआईबी संदेश ये बता रहे हैं कि राज्य प्रशासन को लगातार खुफिया चेतावनी आ रही थी, जिसमे व्यवस्थित तरीके से दंगा शुरु होने के संकेत मिल रहे थे, लेकिन इस पर कार्रवाई करने में सरकारी तंत्र नाकाम रहा.
राज्य का खुफिया ब्यूरो लगातार खतरे की घंटी बजाता रहा. गृह विभाग को दंगा भड़कने की संभावना को लेकर संकट भरा संदेश भेजता रहा. कारसेवकों के शव को लेकर प्रदर्शन शुरु हो गया लेकिन रिकार्ड बताते हैं कि वीएचपी और उसके कार्यकर्ता भीड़ का उन्माद बढ़ाने में जुटे रहे.
28 फरवरी 2002 को रात के करीब साढ़े बारह बजे राज्य खुफिया ब्यूरो को एक फैक्स मिला, जिसमें अहमदाबाद में शव लाए जाने की हालत में दंगा भड़कने की संभावना को लेकर चेतावनी दी गई. उस वक्त वीएचपी की राज्य इकाई के अध्यक्ष जयदीप पटेल 54 कारसेवकों की लाश को लेकर गोधरा से अहमदाबाद के रास्ते में थे.
तारीख- 28 फरवरी 2002, समय- रात के साढ़े 12 बजे
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो फैक्स नंबर - 525
शवो को अहमदाबाद के कालूपुर रेलवे स्टेशन लाया जाएगा. शवों का अंतिम संस्कार किया जाएगा. वीएचपी ने बंद बुलाया. अहमदाबाद में दंगा भड़कने की जबरदस्त संभावना. रोकथाम के लिए कार्रवाई की जाए.
तारीख- 28 फरवरी, 2002
राज्य खुफिया ब्यूरो ने गृह सचिव और सभी पुलिस कमिश्नर, सभी एसपी को रिपोर्ट भेजी. वीएचपी ने गुजरात बंद बुलाया, जरुरी निगरानी रखी जाए.
शवों को लेकर मोटरों का काफिला सुबह के 3 बजकर 34 मिनट पर आखिरकार अहमदाबाद के सोला सिविल अस्पताल पहुंच गया. सोला अस्पताल के बाहर वीएचपी और आरएसएस कार्यकर्ताओं की भीड़ पहले से ही जमा थी. सोला सिविल अस्पताल के बाहर तैनात पीसीआर वैन ने शहर के पुलिस कंट्रोल रुम को संदेश भेजा. अस्पताल और पुलिस कंट्रोल रुम के बीच की दूरी 11 किलोमीटर थी.
तारीख- 28 फरवरी 2002, समय- सुबह के 4 बजे
पृष्ठ संख्या- 5790 (एनेक्चर IV, फाइल XIV)
आरएसएस के 3000 सदस्यों की भीड़ सोला अस्पताल के इर्द गिर्द जमा हो गई.
तारीख- 28 फरवरी 2002, समय- 7:14 सुबह
पीसीआर वायरलेस संदेश (सोला अस्पताल)
पृष्ठ संख्या - 5796 (एन्क्चर IV, फाइल XIV)
सोला अस्पताल के करीब भीड़ जमा होने लगी. भीड़ बेकाबू होती जा रही थी और कभी भी हिंसा भड़क सकती थी.
तारीख- 28 फरवरी, 2002, समय- 7:17 सुबह
पीसीआर वायरलेस संदेश (सोला अस्पताल)
पृष्ठ संख्या - 5797 (एनेक्चर IV, फाइल XIV)
500 लोगों की भीड़ ने ट्रैफिक रोक दिया.
सुबह के 8 बजकर 10 मिनट पर कंट्रोल रुम से संदेश आया कि तीन एसआरपी कंपनियां सोला अस्पताल के लिए रवाना कर दी गई.
तारीख - 28 फरवरी 2002, समय- 11:55 सुबह
पीसीआर वायरलेस संदेश.
पृष्ठ संख्या - 5894 (एनेक्चर IV, फाइल XIV)
भीड़ ने गाड़ियों में आग लगा दी, हाईवे पर आगजनी.
तारीख- 28 फरवरी, 2002, समय- 11:55 सुबह
पीसीआर मैसेज
स्टेट खुफिया ब्यूरो
पेज नंबर - 6162 (एनेक्चर IV, फाइल XIV)
सोला अस्पताल और हाईकोर्ट के करीब दंगा शुरु हो गया, जहां शव ले जाए गए.
तारीख 28 फरवरी 2002, समय- दर्ज नहीं
पीसीआर मैसेज (सोला अस्पताल)
स्टेट खुफिया ब्यूरो
पेज नंबर - 6172
सोला अस्पताल के कर्मचारियों को 500 लोगों की भीड़ ने घेर लिया. अस्पताल पर सुरक्षा के तुरंत इंतजाम करें.
ये खुलासे बताते हैं कि कैसे भीड़ को अस्पताल के बाहर जमा होने दिया गया और हिंसा शुरु होने के बावजूद कर्फ्यू नहीं लगाया गया.
जब पांडे एसआईटी के सामने पेश हुए तो उनसे ये नहीं पूछा गया कि पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद क्यों नहीं भीड़ को तीतर-बितर किया गया. पांडे ने एसआईटी के सामने अपने बयान में ये दावा किया कि उन्होंने सुबह के 10 बजे अस्पताल का दौरा किया और सबकुछ सामान्य पाया गया. पांडे न एसआईटी के सामने ये भी दावा किया कि वहां गोधरा में मारे गए लोगों के लिए कोई अंतिम यात्रा नहीं निकाली गई, लेकिन पीसीआर से मिले संदेश साफ बताते हैं कि वहां न केवल अंतिम यात्रा निकाली गई, बल्कि अस्पताल के आस पास दंगा भी भड़का.
तारीख- 28 फरवरी 2002, समय- 11:58 सुबह
पीसीआर संदेश (सोला अस्पताल)
स्टेट खुफिया ब्यूरो
पेज नंबर - 5907 और 5925 (एनेक्चर IV, फाइल XIV)
10 शवों को लेकर अंतिम यात्रा रामोल जनतानगर से लेकर हटकेश्वर श्मशान घाट तक निकाली गई.
अंतिम यात्रा में 6 हजार लोग एक साथ थे. अंतिम यात्रा को पूरे शहर में घुमाया गया. भीड़ अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी, नरोदा पाटिया और नरोदा गाम के करीब बेकाबू होने लगी.
तारीख- 28 फरवरी 2002, समय- दर्ज नहीं
पीसीआर संदेश (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)
कॉम/538
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो
पेज नंबर 258 (एनेक्चर III, फाइल XIX)
कारसेवकों की अंतिम यात्रा साबरकांठा जिले के खेडब्रह्मा में निकालने की इजाजत दी गई. हालात तनावपूर्ण, खेडब्रह्मा में एक खास वर्ग के 2 लोगों को चाकू मारा गया.
28 फरवरी 2002, समय- दर्ज नहीं
पीसीआर संदेश (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो: पेज नंबर 262
(एनेक्चर III, फाइल XIX)
खेडब्रह्मा के रास्ते में 150 बजरंग दल के कार्यकर्ता
फरवरी 28, 2002, समय- 3:32 शाम
पीसीआर मैसेज (खेडब्रह्मा, साबरकांठा)
स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो - पेज नंबर 254
(एनेक्चर III, फाइल XIX) कॉम/574
साबरकांठा में गोधरा कांड में मारे गए बाबूभाई पटेल की अंतिम यात्रा की इजाजत.
विशेष जांच दल ने अपने क्लोजर रिपोर्ट के पेज नंबर 59 से 64 के बीच अपनी रिपोर्ट दी कि वहां कोई अंतिम यात्रा नहीं निकाली गई और इसी आधार पर गुजरात सरकार को क्लीन चिट दी गई लेकिन पीसीआर संदेश अहमदाबाद में दंगा भड़कने से पहले गुजरात सरकार की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते है.