दिल्ली में आप की सरकार बन गई. पहले भी आपकी थी, अब भी आपकी है पर इस बार 'आप' की है. आपकी और आप की में फर्क है एक स्पेस का. एक खाली जगह जिसे आम आदमी पार्टी ने भर दिया. जब से आम आदमी राजनीति करने लगे एक ख़ास बात आ गई है राजनीति में. एक प्रकार के विश्लेषक बताते हैं भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया इसलिए जीते, दूसरे किस्म के विश्लेषक कहते हैं कि बिजली-पानी-रोजगार के मुद्दे पर जीते हैं. दोनों को है खुशफहमी, दोनों ही हैं गुम. सच तो ये है कि दिल के जीते जीत है. मुद्दों से प्रचार होता है. वोट तो दिल का मामला है.
जब से नुक्कड़ सभाएं रैलियों में तब्दील हुईं, रैलियां रैला बन गईं, लाउड स्पीकर शोर लाया, इंटरनेट और एसएमएस नई क्रांति लाए. साथ में ये भ्रांति लाए कि लोगों तक पहुंचने के रास्ते बहुत हैं. सब एक गणित का खेल हो गया. नेता कैलकुलेशन करने लगे कि हम किस माध्यम से कितने लोगों को कवर कर चुके हैं. कहीं जाति का, कहीं धर्म का, कहीं झुग्गी का कहीं बंगले का. आदमी टारगेट ऑडिएंस हो गया. बस यहीं सब नॉनसेंस हो गया. जब कौन कितनी बड़ी रैली कर सकता है, इसका कंपटीशन चल रहा था तब आम आदमी पार्टी का उम्मीदवार दरवाजे खटखटा रहा था. जब रैली के रंगबाज मंच से हाथ हिला रहे थे, अरविंद केजरीवाल लोगों से हाथ मिला रहे थे. दो दिल मिल रहे थे, मगर चुपके-चुपके. नतीजे ने परदा उठा दिया. आम आदमी को बिठा दिया.
वोट किसको दें, ये बड़ा फैसला है. बड़े इनवेस्टमेंट करने जैसा, बड़ी इंडस्ट्री लगाने जैसा, कुछ नया कर दिखाने जैसा, जिंदगी बदल देने वाला फैसला. लोग ये समझते हैं कि बड़े फैसले लेना बहुत समझदारी की बात है. उसमें दिमाग लगाना पड़ता है. नफा-नुकसान तौलना पड़ता है. आगे की सोचना पड़ता है. हकीकत अलग है, दिमाग लगाना दिखावा है. मनुष्य भावनात्मक प्राणी है. जब मामला बड़ा हो तो पासबान-ए-अक्ल फ़ेल हो जाता है. जीवन के बड़े फैसले दिल से करता है. बताना-बतियाना, कानों में फुसफुसाना, कह कर छूना, छू कर कहना दिल तक जाता है. आम आदमी पार्टी के लोग घर-घर गए, दर-दर गए, कुछ अपनी कही, कुछ उनकी सुनी. इतने करीब से जब कोई तुम कहता है, तो आप से ज्यादा अपना लगता है. दूर से कोई आप भी पुकारे तो क्या लगता हैं. कुछ बता गए, कुछ छुपा गए. आप ने लोगों से पूछा कि दर्द कहां होता है. इक जगह हो तो बताए कि यहां होता है. फिर भी गरीब आदमी कुप्पा था कि उसे ट्रकों में भरकर रैली ग्राउंड तक ले नहीं जा रहे. खुद आ रहे हैं. मिजाज़ पूछ रहे हैं. इतने में ही खुश. चाहे कितनी तकलीफ हो अगर मुस्कुराकर पूछो तो जवाब में ‘अच्छा हूं’ ही आता है, मुस्कराहट के साथ.
दुआएं दीजिए बीमार के तबस्सुम को, मिजाज़ पूछने वाले की आबरू रख ली!
केजरीवाल शपथ गए मेट्रो रेल में. सुरक्षा का घेरा नहीं. फ्लैट में रहेंगे तो चारदीवारी और लंबी लॉन की दूरियां नहीं होंगी. वह लोगों से बोल पाएंगे, बतिया पाएंगे, छू पाएंगे और मिल पाएंगे. मुख्यमंत्री बन जाने के बाद कुछ बदलेगा, सुरक्षा शायद मजबूरी बन जाए. पर दूरी कभी मजबूरी नहीं होती. फासले की चाहत होती है तभी स्पेस घर बनाता है रिश्तों में. जब तक केजरीवाल ग़ुरबत से कुरबत बनाए रखेंगे, अमीर-ए-शहर होंगे. नए कद का मद हद के अन्दर रहेगा तो दिल्ली ही नहीं पूरा देश दुआ करेगा कि ये बीमारी संक्रमणकारी हो जाए.
बात निकली है तो बेहतर है कि दूर तलक जाए. दिल्ली से कन्याकुमारी तक, जामनगर से ईटानगर तक. नेताओं को इतना तो करना ही चाहिए कि अहंकार के केंचुल छोड़ दें. अभी-अभी कर्नाटक के कुछ विधायक गण विदेश-भ्रमण पर निकलने वाले थे, आम लोगों के गुस्से ने उनकी योजनाओं पर पानी फेर दिया. पानी कमर तक था तो अमर रहे के नारे बहुत लगे अब जल-स्तर नाक तक आ गया है, तो अच्छा है नेताजी अपनी नहीं कटाएं. अब मामला पीछे रह जाने का, विकसित और पिछड़े राज्य का, गबरू और बीमारू का नहीं रहा. अब बात सम्मान पर आई है. ये दिल का मामला है, कुछ तो करो सजन. तौबा कर लो. क्योंकि तौबा पर माफी का प्रावधान है. जो अकड़ते हैं, उनके लिए अलग प्रावधान है.
जब सरकारें उपलब्धियां गिनाते हैं, तो हम इस गणित पर सिर्फ सर हिलाते हैं. सडकें, विकास दर और सॉफ्टवेयर क्रांति आदि के बारे में गंभीरता से सोचते हैं. सारे आंकड़ों पर कड़ी नज़र डालते हैं. पर फैसला लेने के वक्त इन्हें किनारे कर देते हैं, दिल की कही सुनते हैं. इसमें कभी नफा है, कभी नुक्सान भी है. सब्जी खरीदने हो तो मोल भाव भी करें. आप अपनी जिंदगी के बड़े फैसलों पर गौर कीजिएगा. जितना सोच समझ के लिया था, उसमें सोच-समझ कितनी थी? बड़े फैसले दिमाग से नहीं लिए जाते. यह मनुष्य की प्रकृति में है. ये नहीं बदलेगा. और नेताओं को निशाना वहीं लगाना चाहिए. और लग जाए तो लगे रहना चाहिए.