हल्ला है कि मनमोहन सिंह बड़ा अच्छा कानून लाए थे, जिसने 118 साल बाद किसान को फिर से जमींदार बना दिया था. स्यापा है कि नरेंद्र मोदी एक ऐसा कानून ला रहे हैं जो किसानों को सडक़ पर ला देगा. बिलकुल वैसे ही जैसे आधी शताब्दी पहले आई फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में गरीब किसान का बने बलराज साहनी का परिवार सडक़ पर आ गया था.
मेरी अपनी हिकमत यही कह रही है कि मनमोहन का कानून मोदी के कानून से ज्यादा किसान हितैषी था. और संसद में बहुमत का संतुलन कह रहा है कि मोदी वालों को मनमोहन वालों के आगे आज नहीं तो कल झुकना पड़ेगा. लेकिन क्या इससे जमीन बच जाएगी. क्या जमीन बचाने वाले कानून बनाने से जमीन बच जाती है. और क्या खेती करने के बाद जो फसल उगती है, उससे किसान अपना पेट भर सकता है. अगर ऐसा है तो क्यों भारत के गिरमिटया शताब्दियों से देश ही क्या दूर देश में मजूरी करने जा रहे हैं. क्यों बिहार, पूर्वांचल, उत्तराखंड, उड़ीसा और अब बुंदेलखंड के गांववाले मजूरी के लिए बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं. जब मनमोहन अच्छा कानून ले आए थे तो यह पलायन बंद न सही, कम तो होना चाहिए था.
मुझे ऐसा ही लगता था. ऐसी ही किसी चुनावी रिपोर्टिंग के सिलसिले में झांसी के पास एक गांव में गया था. गांव को अंबेडकर गांव का दर्जा हासिल था. वहां तक पक्की सडक़ जाती थी. गांव के इंदिरा आवास भी ठीक बने थे. उनमें शौचालय भी थे, जिनके सरकारी विज्ञापनों में कहा जाता है-सोच नहीं शौचालय. इनके लिए अलग से पैसा मिलता है. लेकिन गांव वाले इन्हें स्टोररूम की तरह इस्तेमाल कर रहे थे और शंका समाधान के लिए दिशा-मैदान की परंपरा निभाए जा रहे थे. खैर, बात खेती किसानी की हो रही थी. खेतों में फसलें लहलहा रही थीं. पांच साल का सूखा खत्म हुए साल भर हो चुका था.
7000 करोड़ का बुंदेलखंड पैकेज अलग से खबरें बना रहा था. ऐसे में मैंने बूढ़े दलित किसान से पूछा- फसल तो अच्छी दिख रही है. उसने हां में सिर हिलाया. मैंने आगे जोड़ा- तो अब दिल्ली जाना बंद हो गया होगा. उसने बीड़ी बुझाते हुए मेरी बात से नााइत्तफाकी जता दी. फिर बोला- फसल अच्छी हो जाएगी तो भी क्या होगा. बाप के पास चार बीघा थी, अब इतने बड़े परिवार के लिए इतनी सी जमीन में गुजारा नहीं होगा. बिना दिल्ली जाए काम नहीं चल सकता. बाकी किसानों ने भी उस दोपहर उस बूढ़े किसान की हां में हां मिलाई थी.
मैं खेती किसानी का जानकार नहीं हूं, लेकिन मोटी बुद्धि भी लगाएं तो देश के 50 फीसदी से ज्यादा किसान इसी तरह छोटी जोत के किसान हैं. और जो थोड़ी बड़ी जोत के हैं, उनका हाल भी बहुत जुदा नहीं है. मुझे आज तक वह किसान सम्मेलन नहीं भूलता जिसमें मझोली जोत के कई किसान इसलिए हत्थे से उखड़ गए थे, क्योंकि मनरेगा ने चैत काटने वालों की मजदूरी का स्तर बढ़ा दिया था। ये किसान कह रहे थे कि इतना पैसा देंगे तो खेती करने का मतलब ही क्या है.
बहुत से ऐसे सरकारी नौकरी वाले लोगों को भी जानता हूं जो कहते हैं कि अगर तनख्वाह हटा दें तो खेती के सहारे गांव में इज्जत से रहना संभव नहीं है. अगर इन सब वर्गों को मिला लें तो यह देश का 90 फीसदी कृषक समाज हो जाता है. इस समाज के लिए खेती परंपरा है, जीने का एक ढर्रा है, एक किस्म की आदत है लेकिन खुशहाल जीवन जीने की गारंटी नहीं है.
यह कृषक समाज सदियों पीछे खड़ा है. उसे उसके आलू का, प्याज का, गेहूं का और तकरीबन हर उपज का सबसे कम दाम मिलता है. उसका आलू 2 रु किलो बिक जाए तो उसके नसीब जाग जाते हैं, भले ही बाजार में आलू टिक्की 25 रु की और एक आलू के वजन का अंकल चिप्स 100 रु का मिलता हो. अगर उसकी जमीन की कीमत हटा भी दें तो भी वह अपने सालाना मेहनताने का बमुश्किल 5 फीसदी ही उपज की कीमत के रूप में हासिल कर पाता है.
किसान इतने घाटे के धंधे में है कि अगर असली हिसाब पर उसे पूरा भरोसा हो जाए तो देश की बड़ी आबादी सीधे-सीधे डिप्रेशन में चली जाएगी. और अगर वह किसी तरह अपनी उपज का सही मोल मांग बैठे तो महंगाई सातवें आसमान पहुंच जाए. इसीलिए व्यवस्था एक धुंधलका तारी किए रहती है जिसमें किसान हित की बातें होती रहती हैं और किसान व्यवस्था को कोसते हुए भी उसे जीता जाता है.
मुंशी प्रेमचंद को तो 30 के दशक में ही दिख गया था कि छोटे किसान खेती नहीं कर पाएंगे. उनकी मशहूर कहानी ‘पूस की रात’ में हल्कू खेती छोड़ ही देता है. आजादी के बाद से सरकारें हर बार कुछ ऐसा करती रहीं कि हल्कू खेती छोड़ते-छोड़ते रह गया, लेकिन खेती करने की उसकी दुश्वारियां पहले से कम भी नहीं हुईं. ऐसे में तिल-तिल कर मरते किसान को एक धक्का देकर मोदी सरकार इस अजाब से मुक्त करना चाहती है.
खेती में मुनाफा सिर्फ आधुनिक खेती, बड़ी जोत, किसान के पास होर्डिंग की क्षमता, बीमा कवर और मनोवांछित बाजार तक पहुंच से ही आ सकता है. और इतनी सारी खूबियां किसान में नहीं सेठजी में ही हो सकती हैं. बड़ी कंपनियां बड़े खेतों में फसल उगाकर उसकी मोटी कीमत वसूल सकती हैं, वे उसे प्रोसेस कर सकती हैं. उनकी महंगी उपज दमदार मार्केटिंग के सहारे बाजार में टिक सकती है. यही वह मॉडल है जिसकी तरफ मनमोहन और जेटली दोनों की अर्थनीति हमें ले जाना चाहती है. जमीन के कानून तो झुनझुना हैं, असल ताकत तो इसी अर्थनीति में छुपी है. ऐसे में कानून कोई भी आ जाए- जमीन बचाना मुश्किल है.