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इंदिरा ने लगा दिया था आपातकाल, तब जेल में अटल ने लिखीं ये कविताएं

अटल बिहारी वाजपेयी एक महान नेता होने के साथ ही बेहतरीन कवि भी थे, जिनकी कविताओं में दर्द भी दिखता था और विरोध भी. जब 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया, तब वाजपेयी ने इसके खिलाफ कविताएं लिखीं.

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अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)
अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हो गया है. उन्होंने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अखिरी सांस ली. भारत छोड़ो आंदोलन के जरिए 1942 में भारतीय राजनीति में कदम रखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी एक महान नेता ही नहीं, बल्कि एक अच्छे कवि भी थे.

जब 25-26 जून 1975 की रात को पूरा हिंदुस्तान सो रहा था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया. इस आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के काले दिनों में से एक माना जाता है. इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी जैसे विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था. वाजपेयी ने जेल में रहकर आपातकाल के विरोध में कविताएं लिखी. पूरे देश को जेल में तब्दील कर दिया गया था और विरोधी स्वर को दबा दिया गया था.

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अटलजी को श्रद्धांजलि देने के लिए यहां क्लिक करें

रातो-रात अखबारों पर पाबंदी, लोगों के इकठ्ठा होने पर रोक, विरोध जताने पर पाबंदी और ऐसा करने वाले संभावित जननेताओं की गिरफ्तारी के फरमान जारी हुए. 25 जून 1975 की उस काली रात ने 26 जून के समाचार पत्रों के संपादकीय लेखों को निगल लिया. रातो-रात सैंकड़ों दिग्गज नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया.

इसके विरोध में 14 नवंबर 1975 से 26 जनवरी 1976 तक चलने वाला महासत्याग्रह, लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया दुनिया का सबसे बड़ा अहिंसात्मक सत्याग्रह माना जाता है. इस दौरान कई भूमिगत कार्यकर्ता अपनी असली पहचान उजागर होने के कारण पकड़े भी गए और कई प्रकार की यातनाओं के शिकार भी हुए. कैदी रहे नेता और कवि अटल बिहारी वाजपेयी देश में हो रहे इन भूमिगत आंदोलनों से अवगत होते रहते थे. इस पीड़ा से निकली उनकी पहली कविता पढ़िए...

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गूंजेगा भारत माता की जय का नारा.

अटल की यह कविता सबको प्रेरणा देती थी, नए आंदोलनकारियों को बल देती थी. आपातकाल के एक वर्ष पूरे होने पर भी अटल बिहारी जेल में थे, तब उन्होंने यह कविता लिखी...

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झुलसाता जेठ मास

शरद चांदनी उदास

सिसकी भरते सावन का

अंतर्घट रीत गया

एक बरस बीत गया.

सींखचों में सिमटा जग

किंतु विकल प्राण विहग

धरती से अम्बर तक

गूंज मुक्ति गीत गया

एक बरस बीत गया.

पथ निहारते नयन

गिनते दिन पल छिन

लौट कभी आएगा

मन का जो मीत गया

एक बरस बीत गया.

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