बदलाव के बीज तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता की चाबी मिलते ही बो दिए थे. जब लाल किले की प्राचीर से झंडा फहराने पहुंचे तो उन्होंने इरादों की घोषणा भी कर दी. अब नतीजे तो एक एक करके धीरे धीरे ही सामने आएंगे.
वैसे ज्यादा इंतजार भी नहीं करना पड़ा. शुरुआत योजना आयोग से हुई जो नेहरू के नाम पर तो नहीं था पर उनका नाम उससे जुड़ा जरूर था. उसकी जगह नीति आयोग ने ले ली है. अब इस नई पैकेजिंग में वाकई क्या होगा, फिलहाल कयास ही लगाए जा सकते हैं. ऊपरी तौर पर वैसे तो कोई खास बात नजर नहीं आती. एक बात जरूर है कि प्रधानमंत्री के सारे ड्रीम प्रोजेक्ट नीति आयोग की निगरानी में ही हैं. डिजिटल इंडिया से लेकर मेक इन इंडिया तक.
बताते हैं कि मोदी ने अपने दफ्तर में जिन तीन हस्तियों के नाम लगा रखे हैं उनमें एक पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी हैं. पहले इसे अलग तरीके से समझाने की कोशिश हुई. अब इसे फिर से समझने-समझाने की कोशिश हो रही है. गांधी के नाम पर मोदी सरकार ने स्वच्छता अभियान शुरू किया तो कांग्रेस मन मसोस कर रह गई. हालांकि बाद में कांग्रेस नेता शोर मचाने लगे. आरोप है कि कांग्रेस के प्रतीक पुरुषों को प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी हथियाने की कोशिश कर रहे हैं.
कांग्रेस शासन में नामकरण के मामले में सरकारी योजनाएं नेहरू-गांधी परिवार की मिल्कियत नजर आती थीं. अब उनकी जगह शायद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और बीजेपी के प्रतीक पुरुषों के नाम होंगे. वाजपेयी को भारत रत्न देकर नई सरकार ने उन इरादों पर मुहर भी लगा दी. थोड़ा और चल कर पता चला कि अब नेहरू के नाम पर चल रही योजनाओं के भी दिन लद गए.
अब अटल मिशनदेश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू के नाम पर चलने वाले 'जेएनएनयूआरएम' कार्यक्रम को अब अटल मिशन फॉर रिजुवनेट एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन (एएमआरयूटी) के नाम से जाना जाएगा. 'जेएनएनयूआरएम' का पहले चरण का कार्यक्रम पिछले साल आखिर में खत्म हो गया था. यूपीए-2 सरकार ने 'जेएनएनयूआरएम' ने दूसरे चरण की तैयारियां तो कर ली थीं, लेकिन स्कीम को मंजूरी नहीं मिल पाई थी. नई व्यवस्था को इसमें ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ी.
सुशासन के नाम पर
अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन को सरकार ने सुशासन दिवस के तौर पर मनाने की योजना बनाई. जब मीडिया में खबर आई तो बयानों का दौर चला – खूब बवाल हुआ. कार्यक्रमों में फेरबदल के साथ रस्म अदायगी से ही संतोष करना पड़ा.
जिन पर लटकी तलवार
जेएनएनयूआरएम की ही तरह केंद्र सरकार की स्कीम है - जवाहरलाल नेहरू रोजगार योजना. संभव है कुछ दिन बाद इसका भी नाम बदल दिया जाए [हालांकि, अभी ऐसी कोई खबर आई नहीं है]. इसके अलावा ऐसे सैकड़ों पुरस्कार, स्कॉलरशिप और संस्थान हैं जो नेहरू के नाम पर हैं. आइए अब नजर डालते हैं उन पर जिन पर तलवार लटकी दिखती है.
ये हैं - जवाहरलाल नेहरू अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार, जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडल, नेहरू बाल समिति बहादुरी पुरस्कार, जवाहरलाल नेहरू बाल कल्याण अवॉर्ड, जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड, सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड, जवाहरलाल नेहरू अवॉर्ड फॉर इंटरनेशनल अंडरस्टैंडिंग, जवाहरलाल नेहरू नेशनल साइंस कम्पटीशन अवॉर्ड्स, जवाहरलाल नेहरू प्राइज फॉर पॉपुलराइजेशन ऑफ साइंस आदि.
अटल और पटेल
मीडिया रिपोर्ट्स पर गौर करें तो पता चलता है कि सरकारी योजनाओं से नेहरू-गांधी परिवार का नाम हटाने के लिए केंद्र सरकार धीरे धीरे कदम बढ़ा रही है. जिस तरह नेहरू की जगह अटल के नाम पर योजना का नामकरण किया गया है, आने वाले दिनों में ऐसी तमाम योजनाएं होंगी जिनसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम हट जाएगा और उनकी जगह सरदार पटेल का नाम आ सकेगा.
बीजेपी कभी पार्टी विद डिफरेंस होने का दावा करती थी. उसी बीजेपी ने अब सरकारी कागजों में नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर धावा बोल दिया है. कल तक जिन बातों पर बीजेपी शोर मचाती थी, सत्ता में आने के बाद अब वो भी उसी को अमली जामा पहना रही है. नेताओं की नीयत चाहे जैसी भी हो – फितरत शायद एक ही जैसी होती है. वैसे भी सब बातें हैं बातों का क्या.