केन्द्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के जनसूचना अधिकारी को सूचना के अधिकार कानून के तहत मिले आवेदन पर गलत सूचना मुहैया कराने पर लताड़ लगाई है.
सूचना के अधिकार कानून का अनुपालन नहीं करने पर आयोग ने जनसूचना अधिकारी से पूछा है कि क्यों न उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और जुर्माना लगाया जाए. सूचना के अधिकार के तहत सुभाष चंद्र अग्रवाल ने एमसीडी से यमुना नदी के तट पर स्थित निगमबोध घाट पर कथित तौर पर भेदभावपूर्ण तरीके से उप-विशिष्ट लोगों के लिए शवदाह चबूतरे बनाए जाने के संबंध में जानकारी मांगी थी, जिसके चारों ओर ग्रिल लगी हुई है.
अग्रवाल का दावा है कि इन शवदाह चबूतरों के आसपास ग्रिल इसलिए लगाई गई है ताकि यहां चुनींदा लोगों का शवदाह संस्कार हो सके. जनसूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय प्राधिकरण के जवाब से असंतुष्ट अग्रवाल ने सीआईसी की ओर रुख किया. अग्रवाल ने सीआईसी से इस तथ्य पर ध्यान दिलाने की कोशिश की, कि यमुना नदी के किनारे स्थित निगमबोध घाट पर शवदाह संस्कार को लेकर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है. {mospagebreak}
इस क्रम में सीआईसी ने माना कि लोकतंत्र में सभी लोगों को समानता का हक है और अगर किसी सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा ऐसे प्रचलन को बढ़ावा दिया जाता है तो यह शर्म का विषय है. चौंकाने वाली बात यह है कि अग्रवाल द्वारा मांगी गई जानकारी में एमसीडी ने उप-विशिष्ट लोगों के लिए बने शवदाह चबूतरों को 25 वर्ष पहले का बना हुआ बताया है वहीं दूसरी ओर डीडीए के अनुसार उप-विशिष्ट लोगों के लिए बने इन शवदाह चबूतरों का निर्माण, वर्ष 2006 में किया गया था. डीडीए ने कहा है कि उसने उप विशिष्ट लोगों के दाह संस्कार के लिए ऐसे किसी चबूतरे का निर्माण नहीं किया है.
दरअसल, इस संबंध में जब डीडीए अधिकारियों ने तीन जुलाई को यमुना नदी के किनारे बने निगमबोध घाट का दौरा किया तो पाया कि तीन शवदाह चबूतरों पर अस्थाई तौर से ग्रिल लगाई गई है. ऐसे में अग्रवाल ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उप-विशिष्ट लोगों के शवदाह के लिए ऐसा किया है.
सीआईसी ने कहा कि प्रस्तुत किए गए सबूतों के अनुसार एमसीडी के जनसूचना अधिकारी ने अग्रवाल को गलत सूचना मुहैया कराई. ऐसे में सीआईसी ने एमसीडी के जनसूचना अधिकारी को समन जारी कर पूछा है कि क्यों न उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और जुर्माना लगाया जाए.