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कूटनीति नहीं सेना के कड़े रुख से सुलझा था डोकलाम विवाद: पूर्व वायुसेना प्रमुख

राहा ने कूटनीति को ‘मजबूती’ मुहैया कराने में सेना की भूमिका को रेखांकित करते हुए आशंका जताई कि चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर डोकलाम जैसे घुसपैठ में बढ़ोतरी होगी.

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पूर्व वायु सेना प्रमुख अरूप राहा (बाएं, फाइल फोटो)
पूर्व वायु सेना प्रमुख अरूप राहा (बाएं, फाइल फोटो)

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भारत और चीन के बीच पिछले कुछ समय से विवाद बढ़ता रहा है. इनमें सबसे बड़ा मुद्दा डोकलाम विवाद था. मोदी सरकार ने इस विवाद को सुलझाने में लगातार अपनी पीठ थपथपाई है. लेकिन अब वायुसेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल अरूप राहा ने कहा है कि डोकलाम विवाद सेना के कड़े रुख के कारण सुलझा था, जिससे भारतीय कूटनीति इसे आगे बढ़ाने में मदद मिली.

पीटीआई की खबर के मुताबिक, राहा ने कूटनीति को ‘मजबूती’ मुहैया कराने में सेना की भूमिका को रेखांकित करते हुए आशंका जताई कि चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर डोकलाम जैसे घुसपैठ में बढ़ोतरी होगी.

राहा ने “स्टेटक्राफ्ट एंड डिप्लोमेसी: रोल ऑफ मिलिट्री पावर’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि डोकलाम में कूटनीति की वजह से नहीं बल्कि सेना द्वारा अपने स्थान से नहीं खिसकने और आंखों में आंखे डालकर खड़े रहने की वजह से गतिरोध सुलझा था.

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उन्होंने कहा कि सेना के रुख ने कूटनीति को इस मुद्दे को सुलझाने में मदद दी. सेना हमारे लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करता है. राहा को यहां एयर फोर्स एसोसिएशन, गुजरात ने ‘फ्लाइंग ऑफिसर निर्मल जीत सिंह शेखों सालाना व्याख्यान श्रृंखला’ के लिए आमंत्रित किया था.

क्या था डोकलाम विवाद?

बता दें, बीते साल जून से लेकर अगस्त के अंतिम हफ्ते करीब 72 दिनों तक भारत-चीन बॉर्डर के डोकलाम इलाके में देनों देशों की सेनाओं के बीच तनातनी देखने को मिली थी. ये माहौल काफी तनावपूर्ण था. ये विवाद सड़क बनाने को लेकर ही शुरू हुआ था. दरअसल भारतीय सेना के दल ने चीन के सैनिकों को इस इलाके में सड़क बनाने से रोका था.

चीन का दावा है था कि वह अपने इलाके में सड़क निर्माण कर रहा है. जबकि इस इलाके को भारत के लिहास से ये इलाके काफी महत्वपूर्ण है. चीन ये भी दावा करता है कि ये इलाका उसके डोंगलांग रीजन का हिस्सा है.

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