बीते कुछ सालों में सरोगेसी को लेकर काफी सख्त नियम बने ताकि कमर्शियल सरोगेसी रुक सके. इस बीच ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामले भी आए, जहां गरीब लड़कियों को जबरन सरोगेट बनाया जा रहा था. एक्ट आने के बाद अब ऐसी खबरें तो नहीं मिलतीं, लेकिन भीतर-भीतर काफी कुछ खदबदा रहा है. पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे भारी पॉकेट वाला क्लाइंट अपने लिए सरोगेट खोज/छांट सकता है ( यहां पढ़ें). इस किस्त में जानिए, क्या है एक सरोगेट होने के मायने.
सरोगेसी के अंडरग्राउंड मार्केट में खुद को सरोगेट दिखाने के पहले मैंने होमवर्क करना चाहा.
इस काम में मेरी मदद कर रहे एक शख्स ने कहा- वे मजबूरी में आती हैं. शुरू में सिर्फ पैसे-पैसे करती हैं. लेकिन महीना बढ़ते-बढ़ते बदल जाती हैं. बार-बार पेट छुएंगी. अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट देखकर रोएंगी. दो बार तो ये भी हुआ कि बच्चे को एक बार देख लेने के लिए सरोगेट अपने पैसे लौटाने को तैयार हो गईं. वे पैसे, जिससे उनके असल बच्चे पलने वाले थे.
उत्तराखंड की एक सरोगेट से मेरी बात कराई गई.
6 साल की बेटी की मां कहती है- कई लाख का कर्जा चढ़ चुका था, तब पति खुद सरोगेसी का आइडिया लेकर आए. 'तुम्हें कुछ नहीं करना. बढ़िया से घर में रहोगी. मन का खाओगी और कई लाख भी मिलेंगे. बीच-बीच में बेटी को मिलाने लाता रहूंगा.'
फिर! कोई कॉन्ट्रैक्ट हुआ होगा आपका उन पेरेंट्स के साथ?
पता नहीं, कुछ कच्ची-पक्की सी लिखा-पढ़ी हुई और हफ्ताभर के भीतर मैं शहर के अस्पताल में थी. प्राइवेट अस्पताल. पैरों के निशान फर्श पर छपें, उससे पहले वहां पोंछा लग जाता था. आवाज करने, हंसने-बोलने की मनाही थी. तंदुरुस्त लगते लोग भी व्हीलचेयर पर दिखते हुए.
हमारा कमरा अलग था. मेरे साथ पहुंची एक दीदी (एजेंट) ने सारी जांच करवाई. फिर मुझे एक घर में भेज दिया गया, जहां पहले से ही मुझ जैसी औरतें थीं. 15 दिन तक मैं पूरी तरह बिस्तर पर रही. वहीं खाना मिला. वहीं पानी. फोन पर बात करने की भी मनाही थी कि बच्ची को देखकर मैं रो न दूं. 28 साल की उम्र हो गई. अपनी याद में ऐसा कभी नहीं देखा था. हमारे यहां तो बच्चे खेत में काम करते या चश्मे से पानी लेते-लेते हो जाया करते.
टेस्ट रिपोर्ट के बाद चॉकलेट खिलाकर एजेंट ने मुझे सरोगेसी होम भेज दिया. अब से अगले साढ़े नौ या दस महीने यही मेरा घर था.
दिल्ली. जिस शहर का कभी सपना भी नहीं देखा था, वहां एक फ्लैट में मैं अपने बच्चे को जन्म दे रही थी. उस बच्ची को छोड़कर, जो रोज मेरी याद में रोया करती. पति ने उसे मिलाने का वादा निभाया. दो बार लेकर भी आए लेकिन सरोगेसी होम की मालकिन ने झिड़क दिया. ‘पेट भारी है. कुछ हो गया तो करा-कराया पानी में चला जाएगा!’
फिर एक अल्ट्रासाउंड में वे लोग आए. होने वाले बच्चे के असल मां-पिताजी. दिल की धड़कन सुनकर दोनों रो रहे थे. मैं दम साधे पड़ी रही. बार-बार खुद को याद दिलाती कि ये उनका बच्चा है.
घर लौटी तो मालकिन ने मुझसे अलग से मीटिंग की. समझाते हुए कहा- तुम तुम एक घड़ा हो, जिसमें दूसरे के हिस्से का पानी रखा है. तुम्हें उसके बदले पैसे मिलेंगे. मैं सिर हिलाती रही. अल्ट्रासाउंड में सुनाई देती धड़कन अब हल्की पड़ गई थी.
लेकिन जैसे-जैसे प्रेग्नेंसी बढ़ती गई, मोह भी बढ़ता गया मैडम...जर्द आवाज वाली पहाड़ी महिला कहती है- पेट में हलचल होती तो हाथ अपने-आप उसे सहलाने लगता. जब अस्पताल ले जा रहे थे तो मैं गोलू देवता (पहाड़ी देवता) से मानता (मनौती) मांग रही थी.
होश में आने पर वहां खड़ी नर्स से पूछा- बच्चा कैसा है. लड़की है या लड़का? मेरे पास कोई खटोला नहीं था, जो खाली पड़ा हो. न ही बिस्तर से सटा कोई नन्हा शरीर था.
बिना कोई जवाब दिए वो ड्रिप देती रही. मैं आज तक नहीं जान सकी कि वो कहां है, कैसा है. मेरे पास नाम-पता भी नहीं. जो कुछ लाख रुपये मिले, पति ने कर्जा चुकाने से ज्यादा उसकी शराब पी डाली.
इस बातचीत के बाद अब मैं खुद सरोगेट थी, जो सोशल मीडिया पर इंटेडेट पेरेंट्स की तलाश में थी. इसी बीच एक शख्स से संपर्क हुआ, जो खुद को पंजाब का रहने वाला बताता है. उससे वॉट्सअप और कॉल दोनों पर लंबी बातचीत हुई.
मैं सरोगेट बन सकती हूं. फेसबुक पर आपका मैसेज देखा. आप एजेंट हैं या पेरेंट?
एजेंट नहीं. मैं और मेरी पत्नी बच्चा चाहते हैं.
आप अपना प्रोफाइल भेज सकती हैं क्या, और हमसे क्या एक्सपेक्ट कर रही हैं?
पिछले महीने मुझे 27 पूरे हो गए. एक बच्चे की मां और फिलहाल एकमुश्त पैसों की जरूरत है, लेकिन एजेंट नहीं, मैं सीधे पेरेंट्स से बात करना चाहती हूं.
ठीक है. लेकिन आपको पंजाब में रहना होगा. हमारे आसपास. हम आपके रहने-खाने-मेडिकल सबका खर्चा देंगे.
इसके अलावा आप क्या पे करेंगे सर?
आप कितना चाहती हैं? अमाउंट हमारे लिए कोई समस्या नहीं.
15 लाख अगर आप बाकी खर्च खुद उठाएं.
ओके. लेकिन मैम, अगर हम कॉल पर बात कर सकें तो ज्यादा अच्छा होगा. सारे पॉइन्ट्स क्लियर हो जाएंगे. शुरू में आपको दुबई भी विजिट करना होगा हमारे साथ IVF के लिए.
आगे हमारी बात वॉट्सअप कॉल पर होती है...
सर, आपने सरोगेसी के लिए दुबई जाने की बात कही. ऐसा क्यों?
हां. इंडिया में हो जाता लेकिन हम फैमिली बैलेंसिग कर रहे हैं. असल में मेरी दो डॉटर्स पहले से हैं. अब एक बेटा चाहिए. वाइफ की प्रेग्नेंसी रिस्की हो चुकी तो दुबई जाकर करवा लेंगे.
अच्छा तो दुबई में जेंडर की श्योरिटी हो जाएगी?
वहां एक बढ़िया हॉस्पिटल में मेरी बात हो चुकी. डॉक्टर बड़ी अच्छी हैं. मिलने पर आपको भी सब समझा देंगी.
मुझे तो इससे कोई हेल्थ कॉम्प्लिकेशन नहीं होगी?
अरे नहीं. आप पर नॉर्मल IVF प्रोसिजर ही होगा. उससे पहले ही सब लैब में हो जाएगा. वहां से 10-15 दिन में हम लौट भी आएंगे. आप बस एक बार मेरी वाइफ से भी बात कर लीजिए.
ठीक है. लेकिन एक कन्सर्न है सर, मैं नॉन-पंजाबी हूं. वेजिटेरियन. आप लोग बाद में कोई डायट फॉलो करने तो नहीं कहेंगे?
नहीं-नहीं. आप मेडिकली फिट हैं तो इसकी क्या जरूरत. वेजिटेरियन्स भी हेल्दी बच्चे पैदा करते हैं. उसकी आप चिंता मत कीजिए.
अलग नंबर पर हमारी वाइफ से भी बात होती है. वे शुरुआत से ही जोर देती हैं कि मुझे दिल्ली छोड़कर उनके पास पंजाब रहना होगा. आश्वस्त करते हुए वे कहती हैं- हमारे घर के पास ही एक फ्लैट है. वहीं रहिएगा. मेरी एक मेड चौबीसों घंटे आपसे साथ रहेगी. बाकी हफ्ते में दो-तीन बार मैं आपकी 'टेक-केयर' के लिए आती रहूंगी.
लेकिन मेरा खुद एक बच्चा है, उसे छोड़कर कैसे इतने समय के लिए आ सकूंगी?
तो आप उसे भी ले आइए. वहीं रह लेगा. बस, दुबई आप उसे नहीं ले जा सकतीं. हम भी अकेले ही जाएंगे.
एजेंट्स से बातचीत के बीच मुझे कई कागज मिले, जो दोनों पार्टियों के बीच सतही ही सही, करार करते हैं. इनमें पैसों का सीधा जिक्र कहीं नहीं.
कागजी कार्रवाई कैसे होगी मैम?
वो मेरे पति देख लेंगे.
लेकिन आपकी तो पहले से दो बेटियां हैं. फिर सरोगेसी तो गैरकानूनी हो जाएगी?
फोन पर कुछ सेकंड्स की चुप्पी के बाद आवाज आती है- अच्छा! ये तो मुझे नहीं पता. मेरे हसबैंड से बात कर लीजिए. वो जानते हैं सब. वकील भी जान-पहचान वाले हैं. अस्पताल भी.
बाकी आप एक बार अपनी प्रोफाइल भेज दीजिए. इंस्टा पर तो होंगी?
नहीं. मैं किसी भी सोशल प्लेटफॉर्म पर एक्टिव नहीं. आपको अपना बायोडाटा भेज दूंगी फोटो के साथ.
खाने-पीने और दवाओं के खर्च के अलावा मांगी गई रकम दे पाने वाले इन पेरेंट्स के लिए सरोगेट वाकई एक बैग है, जैसा गुड़गांव की डॉक्टर ने कहा था, या पानी से भरा मटका, जैसा सरोगेसी होम चलाने वाली समझाइश देते हुए कहती थी.
यहां बता दें कि जेंडर या फैमिली बैलेंसिंग एक टर्म है. जिन कपल के पास पहले से बेटा या बेटी हो और वो दूसरा जेंडर चाहें तो इस तकनीक की मदद ले सकते हैं. भारत में कन्या भ्रूण हत्या के चलते भ्रूण परीक्षण तक पर बैन है. ऐसे में जेंडर बैलेंसिंग के लिए लोग दुबई, थाइलैंड या कई दूसरे देश जा रहे हैं, जहां लैब में उसी तरह से स्पर्म और एग को मिलाया जाता है कि मनचाहा रिजल्ट मिल सके.
भारतीयों के लिए दुबई हॉटस्पॉट है. वहां के कई अस्पतालों की आधिकारिक वेबसाइट दावा करती हैं कि इंटरनेशनल इंटेंडेट पेरेंट्स बिना क्यू के फटाफट इलाज ले सकते हैं.
इस कपल का बाद में फिर फोन आता है. आखिरी बातचीत इस तरह थी-
सर, मैंने आपकी वाइफ से दो सवाल किए थे, अगर आप कुछ समझा सकें तो डिसाइड करने में आसानी होगी. एक तो आप पैसे कितने और किस तरह से देंगे? दूसरा, मेरा बच्चा भी है एक. उसे छोड़कर मैं आ–जा नहीं सकती.
तो उसे छोड़कर आने कहां कह रहे हैं हम. साथ लेकर आइए. वैसे भी हम अब्रॉड (दुबई) ही रहेंगे, पहले के तीन महीने छोड़कर. तो आप बच्चे को भी साथ रखिएगा. रही पैसों की बात, वो हम तीन इंस्टॉलमेंट में देंगे. सब कैश.
कॉल शायद स्पीकर पर था, वाइफ की आवाज आती है- गिफ्ट भी देंगे, आप जो चाहें.
अनसुना करते हुए मैं पूछती हूं- और लीगल पार्ट का क्या होगा. मैं इससे दूर रहती हूं?
हमारे बीच एक MoU साइन होगा…
लेकिन जब ये लीगल ही नहीं तो MoU कैसे साइन होगा.
ऊपरी लिखा-पढ़ी तो हो सकती है. वकील अपनी तरह से समझ लेगा. आपको हमसे और हमको आपसे कोई नुकसान न हो बस. देखिए मैम, हम आपकी तरह पढ़ी-लिखी सरोगेट चाह रहे थे. आखिर नौ महीने तो बेबी उसी के पास रहेगा तो ठीक…आप समझ रही हैं न!
मेडिकल स्टूडेंट भी बन रहे सप्लायर…
सरोगेसी की जांच-पड़ताल के दौरान एक एजेंट ऐसा भी मिला जो खुद एमबीबीएस फाइनल ईयर स्टूडेंट है. पहले प्रोफेशनल बातचीत करते हुए उसने हौज खास के पास मिलने के लिए बुलाया. लेकिन बात करते हुए खुलने लगा. यहां तक कि सवाल-जवाब का सिलसिला उलट गया.
आप तो पढ़ी-लिखी लगती हैं. फिर क्यों ये करने की सोच रही हैं?
मजबूरी है. बड़े अमाउंट की एक साथ जरूरत है.
हां वो समझता हूं. मैं खुद मजबूरी में ये काम कर रहा हूं. एमबीबीएस कर रहा हूं. घरवालों ने काफी पैसे लगा दिए. अब दिल्ली में रहना है तो दूसरे खर्चे भी लगे रहते हैं.
आपको इसका पता कैसे लगा कि सरोगेट्स को कनेक्ट करने पर पैसे मिलेंगे?
हम देखते रहते हैं अस्पताल में. गायनेकोलॉजी में कम आना-जाना है पर वहां की नर्सेज बता देती हैं. फिर हमने सोचा कि क्यों न ये ट्राय किया जाए. इससे पहले स्पर्म डोनेशन भी कई बार कर चुका. हम स्टूडेंट्स पॉकेटमनी के लिए ये करते रहते हैं.
तो अब तक आप कितने केस हैंडल कर चुके?
अभी तो ये तीसरा ही होगा अगर हमारा मामला बन जाए. इसमें भी बड़ा रिस्क है मैम. सरोगेट धोखा करती हैं. एक ने सारे टेस्ट करवा लिए और टोकन अमाउंट लेकर गायब. अब क्लाइंट मुझपर बिगड़ा हुआ है. कई बार सरोगेट जिद करती हैं, अपनी मर्जी से रहती हैं और मिसकैरेज हो जाता है. फिर हमारा लॉस.
क्यों मिसकैरेज क्यों हो जाता है, आप मेडिकल वाले हैं, गाइड नहीं करते?
मैं पूरी तरह एजेंट तो हूं नहीं. पार्ट टाइम करता हूं ये, तो उतना ध्यान भी नहीं दे पाता. सरोगेट कुछ भी खाती-पीती है. रेस्ट बोलो तो दिल्ली दर्शन करने निकल जाती है. फिर हो जाता है.
वो जो आपसे एडवांस लेकर भागी थी, उसका आईडी और नंबर नहीं था क्या आपके पास? अब तक ये पक्का हो चुका था कि कच्ची आवाज वाला ये कोई बच्चा ही था, भले ही मेडिकल स्टूडेंट हो, न हो.
वो सब तो फेक हो जाता है. अब आप और मैं ही बात कर रहे हैं. कैसे मान लूं कि आप सच बता रही हैं, या आप ही मुझपर क्यों भरोसा कर लेंगी. रिस्क तो दोनों साइड है. पैसों के लिए भरोसा करते हैं, और पैसों के लिए ही भरोसा तोड़ते हैं.
अच्छा सर. मुझे थोड़ा टाइम दीजिए. पति से डिस्कस करके आपको कॉल करूंगी.
ठीक है लेकिन जल्दी बताइएगा. अभी एक सही क्लाइंट पकड़ा है. फिर लेट न हो जाए.
कुल मिलाकर, एक पूरा सिस्टम है जो सरोगेसी एक्ट को कमजोर करने में जुटा हुआ है. कानूनी एंगल समझने के लिए हमने वकीलों की भी मदद ली.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के एडवोकेट ईशान झा कहते हैं- सरोगेसी एक्ट के तहत कमर्शियल तो पूरी तरह से बैन है. अगर किसी को सरोगेट मदर चाहिए तो उसे मेडिकल एक्सपर्ट से वैसा लिखवाना होगा. यही बात सरोगेट पर भी लागू होती है. उसे मेडिकल सर्टिफिकेट देने होंगे कि वो सरोगेसी के लिए फिट है और इसके बदले कोई पैसे या रिवॉर्ड नहीं ले रही.
ये आवेदन ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट के पास जाएगा. वहां बेसिक इंक्वायरी के बाद ऑर्डर पास हो जाएगा. ये ऑर्डर लेकर इंटेंडेड पेरेंट्स ऐसे क्लीनिक जाते हैं, जो IVF के लिए रजिस्टर्ड हो और काम हो जाता है.
एक्ट में कमर्शियल सरोगेसी करने वालों के लिए 10 साल की कैद या/और 10 लाख जुर्माना है लेकिन मामले पकड़ में नहीं आ पाते. इसकी वजह भी ये है कि एक्ट में इंक्वायरी के लिए मजिस्ट्रेट के पास अलग से कोई ताकत नहीं. पेरेंट्स और सरोगेट दोनों जाते हैं. उनसे पूछा जाता है कि आप लोग एक-दूसरे को जानते हैं. रटा-रटाया जवाब दिया जाता है और आमतौर पर मंजूरी मिल जाती है.
मजिस्ट्रेट के पास ऐसा कोई पावर नहीं कि वो रुककर बैकग्राउंड चेक करवाए कि क्या वाकई दोनों पार्टियां आपस में परिचित हैं.
अब बात करते हैं बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट की तो उसका तोड़ भी है. अस्पताल में डिलीवरी के केस में वे एक नॉर्मल स्लिप देते हैं कि हमारे यहां फलां तारीख को फलां कपल के बच्चे का जन्म हुआ. आप उसे लेकर नगर निगम जाइए और बर्थ सर्टिफिकेट बन जाएगा. कागज बनते समय माता-पिता तक का सामने रहना जरूरी नहीं.
अगर होम डिलीवरी दिखाई जाए, जैसा कई बार गांवों में होता है तो लोकल पार्षद के लिखकर देने पर सर्टिफिकेट बन जाता है. इसे भी क्रॉस चेक करने का कोई सिस्टम नहीं.
(aajtak.in की इस पेशकश में आपने पढ़ा कि कैसे दिल्ली और एनसीआर में सरोगेसी का बाजार सजा है, जहां सरोगेट खोजने वाले कपल, सरोगेट बनने वाली महिलाएं, सरोगेट तलाशने वाले एजेंट और सरोगेट बनाने वाले अस्पताल सब एक्टिव मोड में हैं. कल पढ़िए उस महिला की कहानी जो अपने एग बेचने गई थी लेकिन बन गई सरोगेसी सेंटर की कर्ताधर्ता.)