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इस महाभियोग प्रस्ताव को संसद में फेल होने के लिए लाया गया?

महाभियोग का प्रस्ताव ऐसे दुर्लभ मामलों में किया जाता है जहां किसी जज के दुराचार का गंभीर प्रकरण हो और उसके खिलाफ ठोस और पर्याप्त सबूत मौजूद हों. लेकिन महज कही सुनी बातें और अफवाह को महाभियोग प्रस्ताव का आधार नहीं बनाया जा सकता है.

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विपक्षी नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस (फाइल फोटो)
विपक्षी नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस (फाइल फोटो)

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कारोबारी और उद्योगपतियों पर अक्सर संसदीय प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने का आरोप लगता है. कारोबारी हितों को ध्यान में रखते हुए सांसदों द्वारा कुछ प्रेरित प्रश्न किए जाते हैं और चिट्ठियां लिखी जाती हैं. हालांकि कारोबारी फायदे के लिए संसदीय प्रक्रिया का इस्तेमाल करने का यह पूरा तरीका है. इनमें से कुछ तरीके समय के साथ बेनकाब हो चुके हैं और संसदीय व्यवस्था कुछ तरीकों के प्रति अगाह हो चुकी है. नीतियों को प्रभावित करने का एक नया तरीका इनसे कुछ अलग है.

मौजूदा समय में बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिवक्ता संसद में सदस्य हैं. ज्यादातर राजनीतिक दल इन्हें तरजीह देते हैं क्योंकि इनसे कोर्ट के काम के साथ-साथ संसद की बहस जीतनी भी आसान हो जाती है. इसका प्रासंगिक असर यह देखने को मिला कि अधिवक्ता सांसदों ने कोर्ट के आपसी विवाद को संसदीय प्रक्रिया में घसीटने का काम किया. देश के मुख्य न्यायाधीस के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव इसका एक उदाहरण है.    

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क्यों गलत है ये महाभियोग?

महाभियोग का प्रस्ताव ऐसे दुर्लभ मामलों में किया जाता है जहां किसी जज के दुराचार का गंभीर प्रकरण हो और उसके खिलाफ ठोस और पर्याप्त सबूत मौजूद हों. लेकिन महज कही-सुनी बातें और अफवाह को महाभियोग प्रस्ताव का आधार नहीं बनाया जा सकता है. मौजूदा महाभियोग प्रस्ताव बिना किसी ठोस सुबूत के लाया गया है और इसका मकसद सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश समेत अन्य जजों को डराना है.

कांग्रेस पार्टी यह काम बखूबी जानती है कि किस तरह ऐसे जजों पर विवाद खड़ा कर दिया जाए जिनके फैसलों से कांग्रेस को फायदा नहीं पहुंचेगा. एक सामान्य सा राजनीतिक जानकार भी यह जानता है कि मौजूदा महाभियोग प्रस्ताव को संसद में दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सकता. इसीलिए इस प्रस्ताव के जरिए कांग्रेस का मकसद मुख्य न्यायाधीश को हटाने का नहीं बल्कि उन समेत अन्य जजों को डराने का था.

कमजोर था प्रस्ताव का ड्राफ्ट

विपक्ष द्वारा लाया गया महाभियोग प्रस्ताव का ड्राफ्ट बेहद कमजोर था. ऐसे संवेदनशील ड्राफ्ट का जहां त्रुटियों से मुक्त रहना जरूरी था उसका आधार एक पुख्ता सुबूत होना था. लेकिन ड्राफ्ट यदि सबूत खोजने की बात करे, जांच की बात करे तो जाहिर है कि महाभियोग प्रस्ताव के लिए पर्याप्त दलील नहीं है.

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दलील 1: संसद के 64 सदस्य प्रस्ताव देते हैं कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संभवत: भ्रष्टाचार में लिप्त हो सकते हैं.

दलील 2: संसद के 64 सदस्य प्रस्ताव में दावा करते हैं कि देश के मुख्य न्यायाधीश 'जांच के घेरे में आ सकते थे'. क्या यह महज अंदाजा है या इसका कोई सबूत मौजूद है.

दलील 3: महाभियोग प्रस्ताव लाने वाले 64 सांसद लिखते हैं कि 'ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य न्यायाधीश ने बैक डेट में प्रशासनिक आदेश पारित किया'. क्या यह महज शक के आधार पर है?

दलील 4: क्या किसी अधिवक्ता को जमीन आवंटित करने का 33 साल पुराना मामला मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ साबित हुआ दुराचार माना जा सकता है?

दलील 5: क्या जजों को केस आवंटित करने का दूसरा नजरिया रखना या वैकल्पिक नजरिया रखना साबित किया जा चुका दुराचार है?

कांग्रेस पार्टी दलील दे रही है कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ उनके आरोप की सत्यापन सिर्फ जांच के बाद किया जा सकता है तो क्या इस आधार पर लाए गए महाभियोग प्रस्ताव का मकसद उसे संसद में पास कराने से अलग है?

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