डॉक्टर्स डे पर बात उन रिश्तेदारों की जो किसी भी मायने में डॉक्टर से कम नहीं होते हैं. हर रिश्तेदार पोटेंशियल डॉक्टर होता है, जो आपके बीमार पड़ते ही असली रूप में आ जाता है.
डॉक्टर्स अगर भगवान का दूसरा रूप हैं, तो रिश्तेदार भी उन्हीं का कोई मायावी रूप होते होंगे. डॉक्टर्स डे पर एक-एक बधाई सन्देश उन तमाम रिश्तेदारों को भेजा जाना चाहिए, जो इबोला से लेकर हाड़े के बुखार तक का इलाज करना जानते हैं. रिश्तेदारों की एक आदत होती है, वो आपकी सेहत को लेकर हमेशा फिक्रमंद होते हैं, दो घंटे बाद भी आपको देखें, तो सेहत में आई गिरावट भांप सकते हैं. हर रिश्तेदार खुद में पैथालॉजी होता है, जो बिना एक बूंद खून निकाले सारे रोग बता सकता है, आंखों से बॉडी मॉस इंडेक्स निकाल सकता है और माथा छूकर तापमान जान सकता है.
रिश्तेदार खतरनाक होते हैं, बीमारी के मामले में वो और खतरनाक हो जाते हैं. भगवान न करे, वही बीमारी अगर उन्होंने खुद झेली हो तब आपको खुद भगवान भी नहीं बचा सकते. रिश्तेदार समदर्शी होते हैं, उनकी आंखें सूक्ष्मदर्शी होती हैं. अगर उनके ताऊ के साले की चाची को भी पैंतीस साल पहले अर्ध कपारी हुआ हो, तो उन्हें सारी दुनिया सिर पकड़े नजर आने लगती है. आपकी आंखें भारी हैं, सिर दर्द कर रहा है, गले में जरा सी ऐंठन है, वो इसे भी अर्ध कपारी बता डालेंगे. भले आप मिमिया पड़ें, आपको पता हो कि दर्द सिर्फ कंप्यूटर के सामने देर तक बिना आराम किये काम करने से हुआ है, वो नहीं मानेंगे ये अर्ध कपारी ही है, क्योंकि उनके ताऊ के साले की चाची को भी पैंतीस साल पहले हुआ था.
रिश्तेदारों का फेवरेट रोग वात होता है, सिर घुमाकर पूछ लीजिये आपको हर दूसरा रिश्तेदार वात रोग का स्पेशलिस्ट मिलेगा. वो आपको केस हिस्ट्री बता सकते हैं, दसियों अनुभव गिना सकते हैं, मरीज के नाम से लेकर इलाज में लगे दिन और कुल खर्च बता सकते हैं. इस रोग के इलाज भी बड़े मजेदार होते हैं, कोई मछली का तेल लगाने की सलाह देगा, तो कोई सरसों के तेल में गरम कर पपीते के पत्ते लगवाएगा. एक रिश्तेदार ऐसे ही मौके पर मेरी दादी को वो तेल दे गए, जो रात को लगाने पर रेडियम सा चमकता था, इलाज क्या खाक होना था हमने उसे हर रात लगा-लगा मैट्रिक्स-मैट्रिक्स खेल डाला.
सबसे ज्यादा जो मार जाता है वो रिश्तेदारों का कॉन्फिडेंस है, हर आने वाला इतने विश्वास से इलाज बताता है कि बीमारी खुद कांप जाती होगी. इलाज बताने वाला खुद इतनी तैयारी से आया लगता है कि बीमारी को होमवर्क में कमी सी लगती है. बीमारियों का मानवीकरण होना चाहिए, उन्हें भी शब्द मिलने चाहिए, वो बताएंगी कि कई लक्षण तो पहले उनमें पाए ही नहीं जाते थे, रिश्तेदारों को सुन बाद में डेवलप करने पड़ गए.
ऐसे रिश्तेदारों के सामने कभी ढंग के डॉक्टर का नाम नहीं लेना चाहिए. अपने अनुभवों से वो उसे नाकारा साबित कर देंगे, नजले में रिश्तेदारों के बताए अनुसार कैंसर का इलाज कराते रहना चाहिए, भले आप हफ्ते की तीन सुईयां टुन्चवाकर ठीक हुए हों. रिश्तेदार जब पूछें तो तुलसी के पत्ते में घी-कत्था खाकर ही ठीक हुआ हूँ बताइए. आप बीमारी से बच सकते हैं, डॉक्टर से बच सकते हैं, रिश्तेदारों से नहीं बच सकते.