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कहीं नरेंद्र मोदी के गले की फांस न बन जाए मध्यप्रदेश में विचाराधीन SIMI कैदियों का एनकाउंटर...

मध्यप्रदेश के भोपाल सेंट्रल जेल से फरार होने वाले SIMI के विचाराधीन कैदियों के पुलिसिया एनकाउंटर के बाद भले ही राज्य सरकार आश्वस्त दिखने की कोशिश कर रही हो, लेकिन इस आग की लपटें किस तरह नरेंद्र मोदी के सारे किएधरे को तबाह करने की क्षमता रखती हैं. पढ़ें पूरा लेख...

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Narendra Modi
Narendra Modi

भारत के तीन सबसे बड़े सूबों में शुमार किए जाने वाला मध्यप्रदेश इन दिनों भारत में प्रतिबंधित इस्लामिक संगठन- स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) के विचाराधीन सदस्यों व कैदियों के पुलिसिया एनकाउंटर की वजह से सुर्खियों में है. राज्य के मुखिया शिवराज सिंह चौहान, गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ठाकुर, इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस और जेल मंत्री के बयानों में साम्य नहीं दिख रहा. राज्य पुलिस का कहना है कि यह सारे विचाराधीन कैदी भोपाल के सेंट्रल जेल से भाग निकले थे. जेल से भागने के क्रम में इन्होंने एक हेड कॉन्सटेबल की हत्या भी कर दी. जितने मुंह उतनी बातें जारी हैं.
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का असर सीधे-सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जाता दिख रहा है. वे अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय या फिर कहें कि दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यक समुदाय का विश्वास हासिल करने में नाकाम होते दिख रहे हैं.

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विपक्ष के लिए बैठेबिठाए मिल गया मौका...
मध्य प्रदेश के मरणासन्न हो चुके विपक्ष की आखों में फिर से चमक आ गई है. वे फिर से राख में फूंक मारने लगे हैं. दिग्विजय सिंह ट्विट और बयानों से सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. वे पूछते हैं कि आखिर सिर्फ मुसलमान ही क्यों जेलों से भाग रहे हैं. कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता कमलनाथ भी हावी होने की कोशिश में लग गए हैं. कांग्रेस के राज्य प्रभारी मोहन प्रकाश भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ रहे तो वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया भी फिर मोर्चे पर आ डटे हैं.
आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल भी इस मुठभेड़ को फर्जी बता रहे हैं. उन्हें ट्विटर के माध्यम से मोदी सरकार पर खुल कर हल्ला बोला है. इसके अलावा देश के अग्रणी शिक्षण संस्थान जेएनयू से एक अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र (नजीब अहमद) का आरएसएस के छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद् से भिड़त के बाद पिछले 16-17 दिनों से लापता होना भी विपक्ष को हमलावर होने के मौके दे रहा है.

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नरेंद्र मोदी के सारे किए धरे पर पानी फिर जाना...
साल 2014 के मई में नरेंद्र मोदी के देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी सरकार हमेशा ही 'सबका साथ सबका विकास' नारे के साथ आगे बढ़ने और दिखने की कोशिश में लगी है. वे आए दिन अल्पसंख्यक समुदाय के लिए नई-नई स्कीम घोषित कर रहे हैं. चाहे वह 'नई मंजिल' योजना हो या फिर मुसलमान कारीगरों के लिए शुरू की गई 'उस्ताद' योजना हो. भाजपा के प्रमुख अल्पसंख्यक चेहरे के तौर पर शुमार किए जाने वाले मुख्तार अब्बास नकवी द्वारा मुसलमानों के बीच भाजपा और नरेंद्र मोदी की साख स्थापित करने के लिए प्रोग्रेसिव पंचायत अभियान का शुरू किया जाना और 'मदद हमारी मंजिल आपकी' जैसे नारों के सहारे उन्हें भाजपा की ओर आकर्षित करना भी है. वे इसे वोट के सौदे से बाहर निकलकर विकास के मसौदे पर चलने की सियासत बता रहे हैं.

इसके बावजूद समय-समय पर नरेंद्र मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय पर होने वाले हमलों पर साधी गई चयनात्मक चुप्पी बहुतों को नागवार गुजरी है. चाहे वह उत्तर प्रदेश में गौरक्षकों के हमले में मारा जाने वाला अखलाक हो या फिर झारखंड के लातेहार में गौरक्षकों द्वारा मुसलमान पशु व्यापारियों की हत्या के बाद उन्हें सरेआम पेड़ से लटका देने का मामला हो. उनके वक्तव्य और कृतित्व में फर्क साफ-साफ दिख रहा है. इसके अलावा पुलिसिया मुठभेड़ के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का भाजपा के भीतर और बाहर बढ़ने वाला कद भी तो अलग ही बखेड़ा खड़ा करेगा.

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मुसलमानों की कहानी, आंकड़ों की जुबानी...
ऐसा भी नहीं है कि भारत के मुसलमानों पर होने वाला यह पुलिसिया दमन कोई पहला मामला है. वे इस देश के दूसरे सबसे बड़े बहुसंख्यक समुदाय हैं. उन्हें अगर इस देश के दलितों और आदिवासियों के साथ शामिल करने के बाद राष्ट्रीय क्राइम रिपोर्ट्स ब्यूरो (2015) के आईने में देखें तो 55 फीसदी मामले देश के विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं. हालांकि, इन तीनों समुदायों की कुल जनसंख्या भारत के जनसंख्या की 39 फीसदी है. इसके अलावा इन विचाराधीन कैदियों के अपराधी घोषित होने के आंकड़े सिर्फ 50.4 फीसदी हैं.
देश की अलग-अलग अदालतों में ऐसे मामले सालों लटके रहते हैं. कई बार तो इन कथित आतंकियों को कोर्ट ने कुछ साबित न होने की हालात में छोड़ा भी है. जाहिर है कि ऐसे वाकये अल्पसंख्यक समुदाय को आश्वस्त करने के बजाय डराने वाले ही साबित होंगे. वे भाजपा के नजदीक आने के बजाय उससे दूर ही जाएंगे.

कोर्ट और कानून की साख पर बट्टा...
इस जेल से फरार होने और फिर पुलिस द्वारा उनके एनकाउंटर पर विपक्ष तो मुखर हुआ ही है. इसके अलावा यह कानून की साख पर भी बट्टा है. आखिर विचाराधीन कैदी तो राज्य और ज्यूडिसियरी के जिम्मे होते हैं. पुलिस और सरकार भी ऐसे में केवल पार्टी होते हैं. जब तक किसी पर आरोप साबित न हो जाएं तब तक वह निर्दोष ही माना जाता है. ऐसे में वैसे क्रिमिनल्स तो कभी भी सरेंडर करने से रहे जिन्हें ऐसा शक होगा कि राज्य की पुलिस अतंतोगत्वा उन्हें मार ही देगी और न्यायालय से तो उन्हें न्याय मिलने से रहा.
यह एनकाउंटर जहां नरेंद्र मोदी के अल्पसंख्यकों को रिझाने की कवायद को तबाह करने की क्षमता रखता है वहीं इस देश की कोर्ट और कानून के लिए एक केस स्टडी भी साबित होगा.

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