हमेशा से मैं लेखन की अवस्था के बारे जानने को व्याकुल रहा हूं. रचना जिस स्थान से उद्भूत हुई है, उसके बारे में एक बार मैं ठीक से जान लूं तो लिखी जाने वाली उस रचना के प्रति मेरी समझ बढ़ जाती है. मेरा मानना है कि भारत से बाहर रहकर भारत के बारे में लिखने वाले लेखक किसी-न-किसी तरह उस समाज को बदनाम करते रहे जिसके बारे में उन्होंने लिखाः उनके विकल्पों का मतलब था कि इस महाद्वीप पर आधारित पुस्तकों के लिए दस लाख डॉलर का एडवांस ले लेना मुनासिब है, लेकिन खुदा के वास्ते किसी भी व्यक्ति को पहले उस भीड़भरे और भ्रष्ट नरक के मुहाने पर जीवन जीकर देखना चाहिए.
यह मेरे लिए शर्मसार होने का वक्त है. मैं मुंबई पर यह आलेख-यह शहर क्या है और क्या हो सकता है-बोस्टन के एक उपनगर के ठंडे और हरे-भरे माहौल में लिख रहा हूं. मैं यहां एक महीने से हूं, अपने जन्म स्थान वाले शहर को छोड़े हुए एक महीना गुजर चुका है, शायद कभी नहीं लौटूंगा (कम-से-कम उसके निवासी के रूप में तो नहीं ही), और मुझे फौरन जो नए कौशल सीखने हैं, उनमें एक और बढ़ गया हैः किसी मंजे हुए एनआरआइ लेखक की तरह अपनी यादों के आधार पर कैसे लिखा जाए.
मुंबई में दशकों बिताने के बावजूद खास-खास बातों की यादें अभी से धुंधली होने लगी हैं: मानसून की सर्द हवा का भीना-भीना एहसास, पड़ोस की मस्जिद के लाउडस्पीकर की झनकारने वाली आवाज, भीड़ के समय ट्रैफिक जाम में फंसने की यातना. पिछले कुछ वर्षों के दौरान जब मैं अपनी उम्र के तीसरे दशक के शुरू में पहुंचा तो मेरे पिता का देहांत हो गया और मैं खुद पिता बन गया, मुंबई के साथ मेरा रोमांस खत्म होने लगा; उसकी हकीकतों को नजरअंदाज करना मुश्किल होने लगा, और फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे उस शहर के भाग्य की परवाह नहीं है. यह भ्रामक स्थिति थी. मैंने मुंबई के बारे में कई वर्षों तक लिखा है. लेकिन मुंबई से मेरा अलगाव रोमांस के खात्मे से बढ़कर था; यह जन्म-जन्मांतर के संबंध टूटने जैसा था. कोई अपनी मां से जल्दी अलग नहीं होता; जब इस तरह की नौबत आती है तो जीवन में बहुत खालीपन आ जाता है और उसे भरने में काफी वक्त लग सकता है.{mospagebreak}
मुझे लगता है कि पांच साल पहले मुंबई ने उस समय मेहमाननवाजी का एहसास खत्म कर दिया, जब मेरी पत्नी कविता और मैंने शादी के बाद पहली बार स्वतंत्र रूप से रहने के लिए घर तलाशने का फैसला किया. पहली बार घर तलाशने वालों की तरह हम बेहतर घर चाहते थे और उसे हासिल करने की उम्मीद कर रहे थे, और हमारा बजट उतना ही कम था जितनी ज्यादा हमारी आकांक्षाएं थीं. लेकिन उस शहर ने फौरन हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. मुंबई का रियल एस्टेट बाजार इस महानगर के जीवन का इकलौता सबसे ज्यादा कुंठित और दिल तोड़ने वाला पहलू है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अपने बजट को कितना बढ़ाना चाहते हैं और उसके बदले आप कितना कम स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, मुंबई के भू-माफिया आपके पैरों तले जमीन खिसका देंगे. यह शहर के चिरपरिचित आवासीय भेदभाव के बारे में कोई शिकायत नहीं है; उन जगहों की सीमाएं तय हैं जहां मुस्लिम संपत्ति खरीद सकते हैं या नहीं, और अगर मैं कभी-कभी उस सीमा के पार भटक गया तो इसके लिए मेरी अज्ञानता को ही दोषी ठहराया जा सकता था.
हमने उन क्षेत्रों-कोलाबा, मझगांव, भायखला और फोर्ट-में ही अपनी तलाश जारी रखी जो धर्मनिरपेक्षता के गढ़ माने जाते थे, वे ऐसी जगहें हैं जहां सूअर खाने वाले, मूर्ति पूजक तथा बकरे काटने वाले एक-दूसरे के प्रति उदासीन रहकर अपने काम से काम के अंदाज में एक साथ रहते हैं. हम इसे मुंबई की खूबी के रूप में जानते थे. धर्मनिरपेक्षता के इन गढ़ों के साथ समस्या यह थी कि वे मुंबई के सबसे पुराने इलाकों में शामिल हैं, जहां की इमारतें उतनी ही पुरानी हैं. 1 बीएचके की हमारी खोज से हमारे सामने दो विकल्प आएः एक घर 100 साल पुरानी इमारत में तीसरी मंजिल पर था, और दूसरा 80 साल पुरानी इमारत में दूसरी मंजिल पर था. दोनों इमारतों में लिफ्ट नहीं थी, न दरवाजे थे, न ही पार्किंग की जगह थी और उनके मालिक ऐसे असहाय लोग थे जो अपनी करोड़ों रु. की जायदाद के बावजूद शहर के किराया नियंत्रण कानून के चलते पहले ही काफी सताए हुए थे. एक इमारत मनस लकड़ी की शहतीरों पर खड़ी थी. वे ऐसी इमारतें थीं जो हमारे अधेड़ उम्र के होने तक भी नहीं खड़ी रहतीं, यह तो भूल ही जाएं कि कविता और मैं अपना बुढ़ापा कहां बिताते.{mospagebreak}
हमने घर की तलाश उपनगरों में शुरू कर दी, उसके साथ ही ऑटो-रिक्शे की सवारी शुरू हुई और अक्सर एजेंट के साथ अप्वाइंटमेंट का वक्त निकल जाता था. हमने कई बार खुशनुमा माहौल वाली इमारतों के विभिन्न बड़े-बड़े फ्लैट पर मन बना लिया, लेकिन तभी हमें मुंबई के उपनगरों में जीवन के बुनियादी ढांचों की खामियां दिखने लगीं-अनियमित जलापूर्ति, बिजली की महंगी दरें और मानसून के दौरान बिल्कुल अलग-थलग पड़ जाने का खतरा.
मैंने कई वर्षों तक अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को मुंबई के विभिन्न इलाकों में फ्लैट खरीदते देखा है. मुझे लगता था कि वे लोग इतने पैसे चुकाकर इतना कम स्वीकार करने के लिए क्यों तैयार हो रहे हैं. मुंबई और मैनहटन की तुलना दिखावटी और हास्यास्पद है. न्यूयॉर्क में आपका पैसा वसूल हो जाता है. मुंबई में आप बस पैसा चुकाते रहते हैं. और फिर आप कहीं फंस जाते हैं और वहां डरे-डरे रहते हैं.
कविता और मैं 2007 के दौरान समुद्र के किनारे एक फ्लैट में पेइंग गेस्ट की तरह रहते थे. तब तक मैंने घर की तलाश छोड़ दी थी और किराया चुकाकर खुशी के साथ जीने का तरीका सीख लिया था. हमारी इमारत और अरब सागर के बीच मछुआरों की एक बड़ी बस्ती थी. हमें लगता था कि हमारे आलीशान आशियाने के सामने यह बस्ती एक देहाती नजारा पेश करती है. अपने कमरे में प्रवेश करने के कुछ सप्ताह बाद हम सुबह 5 बजे लाउडस्पीकर पर भजन की आवाज से जग गए. यह आवाज उसी बस्ती से आ रही थी. बाद में सुबह हमारी मकान मालकिन ने बताया कि यह महीने में एक बार होता है. उन्होंने कुछ बताया जिसका मतलब यह था कि मछुआरे समुद्र के देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना कर रहे थे. होली के दौरान हमें एक सप्ताह तक दिनभर और देर रात तक संगीत बजने की आवाज बर्दाश्त करनी पड़ी. और फिर गणेश चतुर्थी आई तो लगता था कि लाउडस्पीकर कभी बंद नहीं होंगे. हमारी इमारत में एक फ्लैट की कीमत कई करोड़ रु. थी. उस कॉम्प्लेक्स में सीईओ, सेलिब्रिटी और उद्योगपति रहते थे. ढके हुए पार्किंग क्षेत्र में महंगी कारों की कतार वास्तव में बहुत आकर्षक लगती थी. इसके बावजूद, इतने नामी-गिरामी निवासियों में से किसी को भी नहीं लगता था कि उनके पास मछुआरों को सिरदर्द करने से रोकने का अधिकार था.{mospagebreak}
नवरात्र के दौरान जब मछुआरों की बस्ती से आने वाले संगीत की आवाज की वजह से मैं पढ़ या काम नहीं कर पा रहा था तब मैंने पुलिस को फोन करने की धमकी दी. मेरी मकान मालकिन ने कहा कि मैं ऐसा कर सकता हूं बशर्ते मैं अपने सेलफोन से कॉल करूं और अपना पता न बताऊं. मैंने ऐसा करने का फैसला कर लिया और पुलिस को फोन कर दिया. मेरे पास गंवाने के लिए कुछ नहीं था (पुलिस ने मेरा पता नहीं पूछा और संगीत बंद करा दिया गया. लेकिन क्या वे पड़ोस की मस्जिद के लाउडस्पीकर से आने वाली आवाज के खिलाफ शिकायत पर इतनी जल्दी कार्रवाई करते?). उसके बाद से मैं उस शहर की सांसारिक सफलता के दिखावे से प्रभावित नहीं होता था. यह स्पष्ट हो गया कि प्रत्येक टॉप-फ्लोर पेंटहाउस के भीतर और मर्सिडीज के टिंटेड ग्लास के भीतर बैठा हर व्यक्ति अपने निजी क्षेत्र और अपनी निजी संपत्ति पर शरारती तत्वों के अतिक्रमण से बुरी तरह डरा हुआ है. उन शरारती तत्वों को मुंबई में खुली छूट मिली हुई हैः कई तरह की सेनाएं, मुस्लिम प्रभुत्व वाला अंडरवर्ल्ड, और मुंबई पुलिस, जो सबसे बड़ी माफिया है. मैं इस तरह के शहर में सफल नहीं होना चाहता था, जहां आपको अपनी मेहनत के बदले कुछ नहीं मिलता और जीवनभर अपने होंठ सिले रखने पड़ते हैं.
बोस्टन के उपनगर में वह सब कुछ है, जो मुंबई में मेरे इलाके भायखला में नहीं था. मेरा परिवार और मैं नॉरवुड की शांति और खामोशी में खुशी और ऐश के साथ जी रहे हैं. लेकिन शांतिपूर्ण माहौल हमेशा नहीं रहता. मुझे अब दूसरी परेशानी का इंतजार है, और मेरा एक पड़ोसी हंगामेदार पार्टी या असंवेदनशील तरीके से टीवी देखने के असभ्य तरीके को अपना सकता है. मैं अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए 911 पर कॉल करूंगा, और फिर जब इस देश का कानून अपना काम करेगा तब मुझे पता चलेगा कि मुंबई छोड़ने की जहमत उठाना सही था या नहीं.
अल्ताफ टायरवाला नो गॉड इन साइट के लेखक हैं.