कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए मार्च महीने से ही लॉकडाउन लागू है. ऐसा माना जा रहा है कि यह अभी आगे भी जारी रहेगा. लेकिन इन सब के बीच कई लोगों की नौकरी चली गई है, जबकि कुछ लोगों की नौकरी तो चल रही है लेकिन उन्हें वेतन कटौती का सामना करना पड़ रहा है. वित्त मंत्रालय ने इन्हीं सवालों को लेकर आज श्रम मंत्रालय के साथ बातचीत की है. जिसके बाद श्रम मंत्रालय ने इस संबंध में डेटा निकालना शुरू कर दिया है. माना जा रहा है कि शुक्रवार की इस बैठक में वित्त मंत्रालय ने रोजगार खोने वाले लोगों का डेटा मांगा है.
हालांकि लॉकडाउन के बाद से यह पहली बार है जब दोनों मंत्रालयों के बीच कोई बातचीत हो रही है. जबकि कुछ दिनों पहले ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 लाख करोड़ के स्पेशल पैकेजे देने की घोषणा की थी. यह घोषणा पीएम मोदी के उस संबोधन के बाद हुई थी जिसमें बताया गया था कि आर्थिक मजबूती देने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से मदद के तौर पर स्पेशल पैकेज दिया जा रहा है.
बता दें, पिछले कुछ दिनों में रोजगार को लेकर केंद्र सरकार की काफी आलोचना हो रही है. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस यानी कि एनएसएसओ की एक लीक रिपोर्ट में बताया गया कि 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी तक पहुंच गई, जो 45 साल में सबसे ज्यादा है. जनवरी में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट में कहा गया कि 2016 में हुई नोटबंदी और 2017 के जीएसटी रोलआउट के साइड इफेक्ट के रूप में 2018 में करीब 1.1 करोड़ नौकरियां खत्म हो गईं.
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कोरोना की वजह से अर्थव्यवस्था को लेकर भारत के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. कोरोना का असर कितना है, इसका अंदाजा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़े से लगा सकते हैं. CMIE का कहना है कि 3 मई को भारत में बेरोजगारी की दर देश के इतिहास में सबसे अधिक 27.11 फीसदी हो गई है. यानी कि देश का हर चौथा नागरिक बेरोजगार है.
एनडीए सरकार ने कोरोना से राहत के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम पैकेज की घोषणा की है. पीएम नरेंद्र मोदी ने इस पैकेज का ऐलान करते हुए कहा था कि यह जीडीपी के करीब 10 फीसदी का होगा. लेकिन जानकार कहते हैं कि मॉनिटरी पैकेज ज्यादा है और फिस्कल पैकेज में कई पहले के ऐलान ही लागू किए गए हैं.
असल में किसी सरकारी राहत पैकेज का दो हिस्सा होता है. पहला फिस्कल पैकेज यानी राजकोषीय हिस्सा और दूसरा मॉनिटरी यानी मौद्रिक हिस्सा. राजकोषीय हिस्से को सरकार अपनी जेब से देती है और मौद्रिक पैकेज रिजर्व बैंक या बैंकों के माध्यम से दिया जाता है.
हमारे बजट को देखते हुए सरकार ने फिस्कल पैकेज के नाम पर बहुत कम दिया है. हमारे देश का एक साल का बजट 30 लाख करोड़ रुपये का है और रिजर्व बैंक करीब 3-4 लाख करोड़ रुपये सिस्टम में डालता है. यानी हमारी जीडीपी का करीब 35 फीसदी हिस्सा तो सिस्टम में ऐसे ही आ जाता है.
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अगर सरकार इस पैसे को थोड़ा पहले खर्च कर दे तो यही किसी बड़े राहत पैकेज का काम कर देगा. बाकी अगर राशि के हिसाब से देखें तो इसके कम से कम दोगुनी राशि का राहत पैकेज होना चाहिए था.