वो सब चुपचाप एक कतार में मुंबई के मरीन लाइन के बड़े कब्रिस्तान की तरफ बढ़ते जा रहे थे. कब्रिस्तान का मैदान अब तक भर चुका था. पुलिस ने मुख्य दरवाजा भी बंद कर दिया था. लेकिन भीड़ इन सबसे बेपरवाह अंदर दाखिल होती जा रही थी. वहां कोई नारेबाजी नहीं हो रही थी, बल्कि एक उदासी सब पर सरमाया थी.
हवा में गुस्सा महसूस किया जा सकता था. उस रोज बड़ा कब्रिस्तान पहुंचने वालों में अधिकांश युवा थे, 18 से 34 साल के बीच के युवा. उनमें कोई धार्मिक उन्मादी नहीं था, दूर-दूर तक नहीं. कई तो सीधा दफ्तर से आ रहे थे. कुछ को इस बात का अफसोस था कि वे समय पर नहीं पहुंच पाए. भीड़ में मौजूद इस्माइल खान और युनूस सुल्तान से मैंने पूछा, क्या वे याकूब या उसके परिवार में किसी को जानते हैं? उनका जवाब ना था. मैंने उनसे पूछा फिर कौन सी वजह उन्हें यहां खींच लाई? उन्होंने छूटते ही जवाब दिया, 'हम यहां याकूब के समर्थन में मौजूद हैं.'
इतना कहते ही इस्माइल की आवाज में और जोश भर चुका था. उसने कहा, हमें याकूब की फांसी से कोई ऐतराज नहीं है. वह एक आतंकवादी था, उसे उसके गुनाहों की सजा मिलनी ही चाहिए. लेकिन आखिर क्या वजह है कि पिछले 15 सालों में सिर्फ एक धर्म के आतंकवादियों को ही फांसी पर चढ़ाया गया है. आखिर खलिस्तानी या तामिल आतंकवादी सुप्रीम कोर्ट के सजा सुनाने के बावजूद कैसे बच जाते हैं. भारत में कानून भी सबको बराबरी से नहीं देखता.'
यहां कुछ ऐसे युवा थे जिनकी रोजाना की दिक्कतें वहीं हैं जो आपकी और मेरी दिक्कतें हैं. ऐसे ही युवा भारत सरकार से एक ऐसा सवाल पूछ रहे थे जिसका माकूल जवाब हुक्मरानों के पास नहीं है. शुक्रवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, सरकार धर्म के आधार पर तय नहीं करती कि किसे सजा देनी है और किसे छोड़ना है. हालांकि सच्चाई यह भी है कि अपने राज्यों से राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण ही देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर, बलवंत सिंह राजोआना और राजीव गांधी के हत्यारे फांसी के तख्ते से बचने में कामयाब हो गए.
सियासी खेल में बचा CM का हत्यारा!
भुल्लर का ही उदाहरण लीजिए. सुप्रीम कोर्ट ने उसे 1993 में दिल्ली में धमाकों का दोषी ठहराया था. इन धमाकों में 9 लोगों की जान गई थी और 25 घायल हुए थे. घायलों में यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष एमएम बिट्टा भी थे. 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी. 2011 में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उसकी दया याचिका भी खारिज कर दी. इसके बाद 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने उसके फांसी को उम्र कैद में तब्दील करने की याचिका भी खारिज कर दी. जाहिर है भुल्लर को याकूब से पहले ही फांसी दे दी जानी चाहिए थी. लेकिन पंजाब से अकाली दल के विरोध के कारण यह केस लगातार लंबा खिचता रहा. आखिरकार 2014 में मानसिक बीमारी की वजह बता कर उसकी फांसी उम्र कैद में तब्दील कर दी गई. फिलहाल वह अमृतसर जेल में बंद है.
बलवंत सिंह रजोआना का केस भी इससे मिलता-जुलता ही है. उसे 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या की साजिश रचने के लिए गिरफ्तार किया गया. बेअंत सिंह को एक बम धमाके में मारा गया था, इसमें 16 अन्य लोगों को भी जान गंवानी पड़ी थी. 1996 में चंडीगढ़ कोर्ट ने बलवंत सिंह के लिए सजा-ए-मौत मुकर्र किया. कोर्ट ने उसकी फांसी की तारीख भी तय कर दी थी. हालांकि पटियाला जेल प्रशासन ने न्यायिक और कानूनी दिक्कतों का हवाला देकर डेथ वारंट वापस कर दिया. 2012 में पंजाब के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में अकाली दल का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मुलाकात करने पहुंचा. इसके बाद केंद्र ने बलवंत सिंह की फांसी पर स्टे लगा दिया.
पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारे भी बच निकले!
अब जरा राजीव गांधी के हत्यारों का मामला भी जान लीजिए. पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के आरोप में चार आतंकियों, नलिनी, संतन, मुरगन और पेरिवेलन को मौत की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सजा में देरी की वजह से इनकी फांसी उम्र कैद में तब्दील कर दी गई. यह देरी तामिलनाडु के राजनेताओं की वजह से हुई. तामिलनाडू एसेंबली ने राष्ट्रपति से चारों दोषियों की फांसी की सजा माफ करने की अपील की. राज्य सरकार ने तो 2014 फरवरी में चारों दोषियों को छोड़ने तक का आदेश जारी कर दिया था. वह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का उसने इस विवादित ऑर्डर पर स्टे लगा दिया. 2015 में उनकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया गया.
श्रीकृष्ण कमेटी का क्या हुआ!
अरुण जेटली कहते तो हैं कि दंगाइयों को भी आतंकियों की ही तरह कठोर सजा से गुजरना होगा लेकिन तथ्य यह है कि महाराष्ट्र में सरकारें बदलती रहीं श्रीकृष्ण कमेटी की सिफारिशों पर अमल नहीं हो पाया. 900 से ज्यादा हत्याओं के गवाह बने मुंबई दंगों पर श्रीकृष्ण कमेटी ने 15,000 पृष्ठों की रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें दंगों में बाला साहेब ठाकरे और शिव सेना की भूमिका की साफ-साफ चर्चा की गई थी. अभी तक दंगों के मामले में सिर्फ तीन दोषियों को सजा हुई है. शिवसेना के पूर्व सांसद मधुकर सरपोतेदार और दो अन्य पार्टी के कार्यकर्ताओं को एक साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी. सरपोतेदार को तुरंत जमानत भी मिल गई और 2010 में बिना सजा पूरी किए उसकी मृत्यु भी हो गई. कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक 31 पुलिसवाले भी दंगों के दोषी थे. इनमें से एक को भी सजा नहीं हुई.
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर याकूब की फांसी पर आयोजित एक बहस में मुंबई के आला पुलिस अधिकारी वाईसी पवार ने इंडिया टुडे से खुलकर कहा, 'आतंकी हमले को दंगों से ज्यादा गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि इसमें बाहरी दुशमन शामिल होता है. दंगा समुदायों के आपसी झगड़े के कारण होता है. पुलिस की जिम्मेदारी हालात को संभालना है. दंगों में शामिल लोगों को सजा देने से इनके दोबारा भड़कने का खतरा भी पैदा हो जाता है.' इसी मानसिकता के खिलाफ बड़ा कब्रिस्तान की भीड़ में गुस्सा था.
याकूब की फांसी के बाद भले ही राज्य प्रायोजित हत्या और तमाम किस्म की बहसें निकल पड़ी हों लेकिन तथ्य किसी और तरफ इशारा कर रहे हैं. पिछले 15 सालों में अदालतों ने 1600 में से सिर्फ 4 लोगों को ही फांसी के तख्ते पर लटकाया है. यह साफ है कि हमारी न्यायपालिका खून की प्यासी नहीं है जैसा कि अभी अपने भावुक बहसों में कई लोग कह रहे हैं. भारत के बरक्स आप एक ज्यादा खुले लोकतंत्र अमेरिका को रखें. अमेरिका ने सिर्फ 2014 में 35 लोगों को फांसी पर लटकाया है. चीन में पिछले साल 607 लोगों को चीन में 90 को सउदी अरब में और 61 को इराक में फांसी दी गई.
याकूब की फांसी के बाद मोदी सरकार को पंजाब में अपने सहयोगियों पर दबाव बनाना चाहिए कि वह बलवंत सिंह का समर्थन छोड़ें और उसे फांसी पर लटकाने की तैयारी करें. 30 जुलाई की इस शाम बड़ा कब्रिस्तान से भीड़ छंटने लगी थी. मैंने युनूस और इस्माइल से पूछा, तो अब आगे क्या' उनका जवाब था, 'अब तो हम घर जा रहे हैं इससे पहले कि यहां कोई लफड़ा हो जाए. पुलिस को तो लगता है कुछ भी हो हम ही जिम्मेदार हैं.'