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हर्ष महाजन और संजय सेठ: दो सूबे, दो किरदार, कांग्रेस-सपा से आए दो नेताओं से BJP ने कैसे पलट दी बाजी!

हर्ष महाजन और संजय सेठ, इन दो नामों ने दो राज्यों की राजनीति में हलचल ला दिया है. खास बात ये रही है कि कभी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नीति-निर्माताओं में शामिल रहने वाले इन दो शख्सियतों ने राज्यसभा चुनाव में अपनी ही पुरानी पार्टी को झटका दिया है.

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राज्यसभा के लिए  निर्वाचित हर्ष महाजन (बाएं) और संजय सेठ
राज्यसभा के लिए निर्वाचित हर्ष महाजन (बाएं) और संजय सेठ

हिमाचल प्रदेश के पूर्व कांग्रेसी हर्ष महाजन और यूपी के एक्स सपाई संजय सेठ ने राज्यसभा चुनाव में खलबली मचा दी. इन दोनों नेताओं की उम्मीदवारी और दावेदारी ने कई जमे-जमाए समीकरण तोड़ दिए. एक राज्य यानी कि हिमाचल प्रदेश में स्थिति तो ऐसी है कि वहां सीएम बदलने की नौबत आ चुकी है, वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने तो सुक्खू सरकार से इस्तीफा दे दिया है. विक्रमादित्य सिंह ने कहा है कि इस सरकार में उनका और उनके पिता का अपमान हुआ है. बीजेपी का तो सीधा-सीधा दावा है कि सुक्खू सरकार विश्वास मत खो चुकी है. 

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वहीं उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव की वजह से समाजवादी पार्टी के कई विधायक बागी हो गए. बीजेपी ने आठवें उम्मीदवार के रूप में संजय सेठ को उतारकर 27 फरवरी के ट्रेलर की झलक पहले ही दिखा दी थी, इसका क्लाईमैक्स तब देखने को मिला जब संजय सेठ के समर्थन में समाजवादी पार्टी के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की. इस क्रॉस वोटिंग का नतीजा ये रहा कि संजय सेठ राज्यसभा पहुंचने में कामयाब रहे. 

हर्ष महाजन: वीरभद्र के रणनीतिकार ने कांग्रेस को फंसाया

सितंबर 2022 में जब जब हर्ष महाजन ने कांग्रेस से अपने लगभग 50 साल के जुड़ाव को खत्म करते हुए दिल्ली में बीजेपी ज्वाइन की थी तो उन्होंने कहा था कि वीरभद्र सिंह के निधन के बाद कांग्रेस अब दिशाहीन हो गई है. हर्ष महाजन ने कहा था कि वे 45 साल तक कांग्रेस में रहे, कभी चुनाव नहीं हारे, लेकिन अब ये पार्टी मां-बेटे से चलाई जा रही है. ऐसा कहते हुए उन्होंने दिल्ली और शिमला दोनों जगहों के कांग्रेस नेतृत्व पर हमला किया था. हर्ष महाजन ने कहा था कि वे सालों से पार्टी की नीतियों के केंद्र में रहे हैं और वे महसूस कर रहे हैं कि कुछ नेता टिकट और पार्टी पदों को बेच रहे हैं.

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67 साल के हर्ष महाजन को पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह का विश्वासपात्र लेफ्टिनेंट माना जाता था. दिल्ली के श्रीराम कॉलेज से पढ़े हर्ष महाजन ने पूर्व सीएम वीरभद्र के साथ लंबी सियासी पारी खेली. अलग अलग समय में वे यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष, विधायक और मंत्री रहे. 

कांग्रेस ने जब हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए अभिषेक मनु सिंघवी को उतारा तो पार्टी उनकी जीत को लेकर पूरी तरह से आशावान थी. पार्टी के सामने कोई संकट नहीं था. 68 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 40 विधायक थे जबकि बीजेपी के खेमे में मात्र 25 एमएलए थे. जबकि 3 निर्दलीय विधायक थे. पार्टी को कम से कम 43 विधायकों से समर्थन की उम्मीद थी. 

कांग्रेस को लग रहा था कि ये जीत किसी तरह से हाथ से जाने वाली है. लेकिन पहले तो कांग्रेस में ही अभिषेक मनु सिंघवी की उम्मीदवारी का विरोध हुआ और उन्हें बाहरी बता दिया गया. इसके बाद नई सरकार में मंत्री न बन पाने वाले 6 विधायकों ने इस चुनाव में अपनी पार्टी के खिलाफ भड़ास निकाली और कांग्रेस उम्मीदवार अभिषेक मनु सिंघवी को वोट नहीं दिया. इसके अलावा 3 निर्दलीय विधायकों को भी हर्ष महाजन और बीजेपी ने अपनी ओर करने में कामयाबी पाई. बता दें कि बगावत करने वाले ये 6 विधायक स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के खेमे से आते हैं, और लगातार सरकार के खिलाफ बोल रहे थे. लेकिन सरकार डैमेड कंट्रोल नहीं कर पाई.

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इसका नतीजा रहा कि कांग्रेस के वोट घटकर 40-6= 34 रह गए. जबकि बीजेपी के वोटों की संख्या 25+6+3=34 हो गई. 34-34 की बराबरी के बाद टॉस से जीत का फैसला हुआ. और यहां भी कांग्रेस की किस्मत साथ नहीं थी और टॉस बीजेपी के हर्ष महाजन के फेवर में रहा. इस तरह से हर्ष महाजन ने राज्यसभा में न सिर्फ जीत हासिल की बल्कि उत्तर भारत में कांग्रेस की एक मात्र सरकार में सुनामी ला दी. 

स्पष्ट है कि अगर कांग्रेस इनमें से एक भी वोट अपनी ओर करने में कामयाब होती तो ये नौबत नहीं आती. 

संजय सेठ:मुलायम के इनर सर्किल में रहे अब अखिलेश को झटका

अब रूख उत्तर प्रदेश की ओर करते हैं. उत्तर प्रदेश से 10 राज्यसभा सांसद जीतकर आने थे.इसमें से कायदे से 7 बीजेपी के कोटे से आने थे और 3 समाजवादी पार्टी से पहुंचने थे. लेकिन बीजेपी ने यहां 8वें कैंडिडेट के रूप में संजय सेठ को उतारकर राज्यसभा चुनाव में ट्विस्ट ला दिया.इसके बाद मुकाबला बीजेपी के संजय सेठ और सपा के आलोक रंजन के बीच हो गया.

हर्ष महाजन की तरह संजय सेठ भी कभी सपा के अंदरुनी सर्कल के नेताओं में गिने जाते थे. उन्हें सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबियों में गिना जाता रहा है. मुलायम के बाद वे अखिलेश के करीबी बने. लेकिन 2019 में  सपा के साथ उनका सफर खत्म हो गया और संजय सेठ बीजेपी में शामिल हो गए. 

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संजय सेठ को जिताने के लिए बीजेपी ने चक्रव्यूह रचना शुरू किया. इसमें विधायकों से अलग अलग तरीकों से संवाद तो साधा ही गया, इसके बाद सीएम योगी आदित्य नाथ की डिनर पॉलिटिक्स का भी रोल रहा. डिनर अखिलेश यादव ने भी रखी थी. लेकिन इस डिनर में सपा के आठ विधायक नहीं पहुंचे. इसी समय तय हो गया था कि राज्यसभा चुनाव में बड़ा खेल होने जा रहा है. 

राज्यसभा चुनाव के लिए वोटिंग के दौरान सपा के सात विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर बीजेपी के आठवें उम्मीदवार संजय सेठ के समर्थन में मतदान किया है. सूत्रों की मानें तो सपा के चीफ व्हिप रहे मनोज पांडेय और राकेश पांडेय के साथ ही राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य ने बीजेपी उम्मीदवार को वोट किया है. सपा को सबसे बड़ा झटका मनोज पांडेय के रूप में लगा है जो सपा के चीफ व्हिप थे. लेकिन उन्होंने चीफ व्हिप के पद से इस्तीफा दिया इसके बाद मतदान करने पहुंचे. 

बता दें कि संजय सेठ प्रदेश की राजनीति में पुराना नाम हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने बतौर बिल्डर काम करना शुरू किया और शालीमार ग्रुप बनाया. सपा ने उन्हें पहली बार राज्यसभा भेजा और इस जीत के बाद वे उच्च सदन में दूसरी पारी शुरू कर रहे हैं. 

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