दिल्ली चुनाव के नतीजों के बाद अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं को अहंकार से बचने की सलाह दी थी. तब उन्होंने कांग्रेस और बीजेपी की मिसाल देते हुए कहा था कि अहंकार ने दोनों को किस तरह बर्बाद कर दिया, सब देख रहे हैं. केजरीवाल का अहंकार से क्या अभिप्राय था? वो किस तरह के अहंकार की बात कर रहे थे? क्या अहंकार के साये से वो खुद बच पा रहे हैं?
एक ट्वीट में 'आप' नेता आशुतोष ने पार्टी की लड़ाई को विचारों का संघर्ष बताया था. क्या विचारों के संघर्ष और वर्चस्व की लड़ाई में कोई फर्क नहीं होता?
कैसा लोकतंत्र, कितनी पारदर्शिता?
जिस तरह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण पीएसी से निकाल बाहर किया गया उसके क्या मायने हैं? आखिर विरोध के स्वर इसी बात को लेकर तो उठे थे कि एक आदमी दो पदों पर न रहे. लेन-देन के साथ खर्चों के मामले में भी पारदर्शिता लाई जाए.
इस मामले पर वोटिंग हुई जिसमें कार्रवाई के पक्ष में 11 जबकि विपक्ष में आठ वोट पड़े. यानी ये आठ सदस्य वे थे जो मानते हैं कि योगेंद्र और प्रशांत की बातें सही हैं. क्या योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण का गुनाह इतना बड़ा था, जिसकी सजा इससे कम नहीं हो सकती थी? क्या यह फैसला होने के बाद उन आठ लोगों की राय बदल जाएगी?
एकला चलो रे या कुछ और...
क्या वाकई दूर रहे केजरीवाल?
योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण का कद छोटा किए जाने के मामले में क्या अरविंद केजरीवाल की जरा भी सहमति नहीं थी? आप के अंदर मची उठापटक के कई दिन बाद, पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से एक दिन पहले केजरीवाल ने ट्वीट कर अफसोस जताया कि पार्टी में जो कुछ भी चल रहा है उन बातों को लेकर वो दुखी हैं. उन्होंने ये भी कहा कि वो इस मामले में नहीं पड़ेंगे. संयोग कुछ ऐसा हुआ कि खराब सेहत के चलते वो कार्यकारिणी की बैठक में भी नहीं पहुंच पाए. तकनीकी तौर पर इस कार्रवाई में केजरीवाल की कोई भूमिका नहीं मानी जा सकती, लेकिन क्या इसमें उनकी कोई सहमति नहीं थी. क्या विरोध के स्वर से केजरीवाल को नहीं बल्कि बाकी लोगों को प्रॉब्लम थी?
केजरीवाल आंदोलन के रास्ते राजनीति में आये हैं. केजरीवाल की लड़ाई सिस्टम से थी. अब वो सिस्टम का हिस्सा हैं. आंदोलन विरोध का स्वर बुलंद करता है. क्या अब केजरीवाल को विरोध के स्वर बर्दाश्त नहीं हो रहे. केजरीवाल विरोध करें तो सही, उनके साथी विरोध जताएं तो गलत. ये कैसा लोकतंत्र है? दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल ने कुछ पुलिसवालों पर कार्रवाई को लेकर धरना और विरोध प्रदर्शन किया था. अब उनके रंगरूट उन्हीं के वरिष्ठ साथियों धक्का देकर दरवाजे से बाहर निकाल रहे हैं - और वो चुप हैं. केजरीवाल के अंहकार वाली लाइन का मतलब जो भी हो नतीजे तो अलग नहीं होते. माफी और भूल सुधार की गुंजाइश हमेशा नहीं बनी रहती.