जोधपुर...! नीली छतों वाली तस्वीर जैसा शहर. छींटदार दुपट्टों वाला शहर. कालबेलिया नाच का शहर. विदेशी मुस्कानों और देसी ठहाकों का शहर. लेकिन, इसी शहर का एक हिस्सा और भी है. उड़ी हुई छतों वाला, जहां दुपट्टों पर रंगीन छींट नहीं, वक्त का मैल अटा है. जहां पांव नंगी-तपती जमीन पर चलकर पत्थर हो चुके हैं. रेत के बगूलों के बीच हंसी नहीं गूंजती, भांय-भांय करता इंतजार चीखता है.
अपनों... छत... और हिंदुस्तानी कहलाने का इंतजार...
चोखां की न्यू बकरा मंडी. शहर से लगभग 10 किलोमीटर आगे ये वो हिस्सा है, जहां पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थी बसे हुए हैं. बसे हुए यानी बांस की बल्लियों को झिल्लियों-चादरों से घेरकर झोपड़ीनुमा कुछ बनाकर रहने लगे हैं. तेज हवा चलने पर पूरा का पूरा घर उड़कर कहीं और बस जाता है.
काले पत्थरों की पहाड़ियों से घिरी हुई अनाम बस्ती. कुछ साल पहले यहां माइनिंग का काम होता था. अब काम बंद है, लेकिन पत्थर हर तरफ बिखरे हुए हैं. इन्हीं पत्थर-ईंटों को जोड़कर शरणार्थियों ने घर बनाया. कच्चे-पक्के घरों के सामने टांका (पानी की टंकी) बना. बस्ती के सामने पत्थर-पत्थर जोड़कर एक देवी मंदिर भी बनाया गया.
24 अप्रैल को जोधपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी ने पूरी की पूरी बस्ती तोड़ने का आदेश निकाल दिया. बकौल प्रशासन, ये अवैध लोगों का अवैध कब्जा था. घर टूटे. टांके टूटे और मंदिर भी टूटा.
इसके बाद से लगभग डेढ़ सौ लोग खुले आसमान के नीचे बल्लियां गाड़कर रह रहे हैं. दूर-दूर तक कोई पेड़ या झाड़ी नहीं. उड़ते हुए पंक्षी भुन जाएं, ऐसी सुलगाने वाली गर्मी. दहकते हुए काले पत्थर और गर्म हवा में फर्र-फर्र बोलती पॉलिथीन की छतें.
इन्हीं में एक था पूनम का घर. बांस और अधघिसी चादरों से बना हुआ. छत की जगह एयर कूलर के विज्ञापन वाले गत्ते, जो एसी से भी ज्यादा ठंडक का वादा कर रहे हैं. पथरीली जमीन का फर्श. पूनम वहीं बैठी हुई थीं. धूप और धूल में अटी हुईं. बेख्याल. हमारे पहुंचनेपर भी वो अपनी जगह से न हिलती हैं, न डुलती हैं. पति कंधे हिलाते हुए कहता है- 'ये मैडम मदद करेंगी'.
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पूनम की आंखें नींद से जाग जाती हैं. 'मदद! मेरा बच्चा दिला दीजिए.'
छोटी-सी चुप्पी के बाद वे कहना शुरू करती हैं- वो पेट में आया, उससे पहले से हम यहां आने की कोशिश में थे. दो बार सब बेच-बूचकर तैयार हो गए, लेकिन वीजा अटक गया. अबकी बार मिला तो मैं पूरे पेट से थी. जल्दी-जल्दी सामान बांधने लगे कि समय रहते निकल जाएं. तभी डिलीवरी हो गई. बस 4 दिन ही बच्चे को दूध पिला सकी, फिर यहां आ गई.
बच्चे का भी वीजा लगा लेते, थोड़ा इंतजार कर लेते!
जवाब मिला - वहां का क्या भरोसा. ये लोग रुक तो जाते, लेकिन फिर किसी को वीजा नहीं मिलता या फिर बच्चे को मिल जाता, मां को नहीं मिल पाता. तब तो मामला और बिगड़ जाता! सिंधी, मारवाड़ी में चारों तरफ से लोग बोलने लगे. सबके चेहरे पर हैरानी-घुला गुस्सा कि यहां बैठे लोगों को वहां के बारे में कुछ नहीं पता.
पूनम एकदम चुप हैं. मैं पूछती हूं- बेटे का नाम क्या रखा?
'राजकुमार.'
आखिरी याद क्या है उसकी?
‘उसकी गंध. दूध में भीगी हुई.’ जर्द-कर्राती हुई आवाज, जैसे पांव के नीचे सूखे पत्ते कुचल गए हों. बोलते-बोलते एकदम से भभककर रो देती हैं. 'मेरा बच्चा दिला दो. छाती भर-भरके दूध आता है, वहां वो भूख से तड़पता है.'
रोती हुई ये मां अकेली नहीं. जनवरी 2023 में पाकिस्तान से जोधपुर आए जत्थे में दो और जोड़ों की कहानी बिल्कुल यही है. वे तो आ गए, लेकिन बच्चा छूट गया. ताया-मामा-चाचा या पड़ोसियों के पास. पूनम के पति रायमल कहते हैं- ताऊजी के पास बच्चा धरा आए. वो खुद गरीब हैं. खाने के पैसे नहीं. बच्चे के लिए सूखा दूध कहां से आए. फोन पर बालक का रोना देखकर ये बावली हो गई. पहाड़ी से कूदने को भागती है. बेटी तक को भूल गई.
रायमल की बेटी, अब मां गले से नहीं लगाती
वो मिट्टी खोदकर घर बना रही है. बगल में सींक-फूस का ढेर. उसके लिए यही घर है. पिता गदबदे गालों वाली बच्ची को दुलारता है तो गालों पर छोटे-छोटे कटोरे बन आते हैं. रायमल झट से हाथ हटा लेते हैं. फिर कहते हैं- पांच महीनों में एक बार भी मां ने इसे छाती से नहीं लगाया. छूटे हुए की याद में वो सबकुछ छोड़ रही है.
आगे बढ़ने पर चेतावनी मिलती है- ‘संभलकर. पत्थरों से सांप-बिच्छू निकलते रहते हैं’. बात मजाक में नहीं कही गई थी. आगे रहता एक परिवार बताता है कि उनके बगैर ढकने (ढक्कन) के घड़े में सांप घुस गया था.
‘सांप को भी ठंडक चाहिए. ठौर चाहिए. लेकिन पाकिस्तान से आए हम हिंदू उनसे भी गए-बीते हैं.’ साफ हिंदी में बतियाती इस महिला से जब कैमरे पर आने को कहा गया तो उसने इनकार कर दिया.
कहा-पाकिस्तान में हमारा बचा-खुचा परिवार भी गर्द हो जाएगा.
आखिरकार ऑफ-कैमरा बात शुरू होती है. श्यामा देवी घर के भीतर बुलाती हैं. दो बांसों को टिकाकर बना घर. भीतर एक झूलती हुई चारपाई पड़ी है. बस, उतनी ही जगह.
‘ये जो घड़ा देख रही हो, इतना ही पानी ला सकी आज. इसी से कल तक काम चलाना है. खाना-पीना, धोना-धरना सबकुछ. चार बच्चे हैं. प्यास लगे तो खौलता पानी पीते हैं. ठंडे की जिद करें तो थप्पड़ मार देती हूं’. तुम लोग आते हो, वीडियो बनाकर चले जाते हो. दुबले-लंबे शरीर वाली श्यामा ये कहते हुए एकदम शांत हैं जैसे किसी और का दुख सुना रही हों. मानो किसी और को ताना दे रही हों.
पानी इतना ही मिलने की वजह भी है. दरअसल इसके लिए दूर जाना पड़ता है. पत्थरों वाली जमीन है. कई बार मटका फूट चुका है. कितनी बार घुटने फूटे हैं. बावड़ी अगले गांव में है. वहां कभी-कभी छूआछूत भी हो जाती है. दो बार घड़ा लेकर खाली लौटना पड़ा. एक टैंकर आता है, लेकिन इतने लोगों को पानी कहां से दे. फिर उसके पैसे भी लगते हैं. वो हमारे पास हैं नहीं.
श्यामा का चेहरा गर्द में सना हुआ. घाघरा-चोली धूल में चीकट पड़ चुकी. अनधुले-पसीने में डूबे कपड़ों की तेज गंध आ रही है. ‘तब तो आप लोग रोज नहा भी नहीं पाते होंगे!?’ शहरी आदत से उपजा ये सवाल क्रूर था. जवाब श्यामा के बदलते चेहरे से मिला. आंखों से कई मौसम एक साथ आकर गुजर गए.
फिर जैसे कुछ जोड़-घटा रही हों, अंगुलियां देखते हुए बुदबुदाती हैं- पांच-छह दिन में नहा लेते हैं. उधर (पाकिस्तान में) थे, तो बाढ़ में डूब रहे थे. खाने को भले न मिले, पानी भरपूर था. ‘अपने मुल्क’ आकर ये भी छिन गया.
पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों से मुलाकात हो तो कुछ खास चीजें दिखती हैं. बात की शुरुआत वे हरदम जय श्रीराम, या सियाराम से करते हैं. और लगभग हर वाक्य के खत्म होते-होते 'हमारा मुल्क' जैसे शब्द आ जाते हैं.
दिल्ली की हिंदू रिफ्यूजी कॉलोनी भी गई तो घरों के आगे धार्मिक प्रतीक दिखे. मानो यकीन दिला रहे हों कि वो भी अब इसी देश का हिस्सा हैं. जैसे, भगवान का नाम ही वो गोंद हो, जिससे पुराने और नए हिंदुस्तानियों का दिल जुड़ जाएगा. मानो ‘हमारा मुल्क’ सुनकर अघाए हुए हिंदू, सताए हुए हिंदुओं से बाहें पसारकर मिलेंगे. लेकिन दिख इसका उल्टा रहा है.
वे तो पाकिस्तान छोड़ आए, लेकिन पाकिस्तान का बेताल उन्हें छोड़ने को राजी नहीं.
‘पति 12वीं तक पढ़े हैं लेकिन यहां कोई मतलब नहीं. जहां जाओ, सब पाकिस्तानी कहकर दुत्कार देते हैं. एक दुकानवाले ने तो पुलिस बुला ली कि आतंकवादी आया है. जैसे-तैसे बचकर लौट सके. तब से कट्टा (सीमेंट की बोरी) उठाने का काम करते हैं.’
‘पहले-पहले आए तो हाथ में छाले पड़ गए थे. कंधे-पीठ पर लाल-लाल डोरे. रात में रोते थे तो बच्चे भी रोने लगते. फिर मैं सबको चुप कराती. जब से आई हूं. चार की बजाए पांच बच्चे संभाल रही हूं.’ सूखी हुई आवाज में श्यामा बता रही हैं.
अब पति ठीक हैं?
‘नहीं.’ छोटा-सा जवाब आता है.
वहां थे तो कपास का कारोबार करते. घर में फ्रिज-कूलर सब था. बच्चे सोफों पर सोते. यहां खटोला है और पथरीली जमीन. लकड़ी फूंककर खाना बनाती हूं. पिछली बार एक मैडम वीडियो बना गईं. पाकिस्तान में मां ने देख लिया और रोते हुए बेहाल हो गई. बुड्ढी (बुजुर्ग) है. उम्र से पहले दुख मार देगा.
तब पाकिस्तान छोड़ा ही क्यों?
बेटी के लिए. वो 10 की हुई. स्कूल जाना रोकना पड़ा. हिंदू लड़कियां देखते ही वे बाज की तरह झपट पड़ते हैं. धर्म बदल देते हैं. रेप करते हैं. शादी कर लेते हैं. और भी कितने ही मसल-मिसाइल (झंझट) हैं. यहां छत नहीं, लेकिन बेटी बेपरदा खेल रही है. वहां होती तो कब की गायब हो जाती.
श्यामा अब कुछ जल्दी में लग रही हैं. चूल्हा सुलगाने का वक्त हो चुका.
वे बिना कुछ बोले बर्तन सरियाने लगती हैं. एलुमीनियम की धुंधाई कड़ाही. प्लास्टिक के आड़े-तिरछे डिब्बों में भरा आधा-अधूरा सामान. सबकुछ बेमेल. श्यामा के कपड़ों और जिंदगी की तरह.
शाम ढलने के साथ पत्थरों का दहकता हुआ रेगिस्तान ठंडा पड़ रहा है. आसमान पर सूरज और चांद एक साथ झांकते हुए. मेरी उनसे बचपन की जान-पहचान है. लेकिन पाकिस्तान फर्लांगकर आए इन लोगों के लिए वो भी अजनबी हैं! काली पॉलिथीन से झरकर आता चांद पता नहीं उन्हें कितनी तसल्ली दे पाता होगा!
जल्दी-जल्दी पैर चलाते हुए आगे पहुंचती हूं, जहां ऑटोवाला बेसब्र हो चुका. बैठते ही कहता है- थोड़ा जल्दी करना था बहनजी. आगे रास्ता सूना रहता है.
हिंदू शरणार्थियों पर काम करने वाली संस्था निमित्तेकम के को-फाउंडर 'डॉ ओमेंद्र रत्नू' से फोन पर बात होती है.
वे एक-एक करके सारी फैक्चुअल बातें बताते हैं. जोधपुर के चोखां में 25 परिवार रह रहे थे. ये जोधपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी (JDA) की जमीन थी, लेकिन आसपास रहने वाली माइनोरिटी ने फर्जी पट्टे बना रखे थे. यही पट्टे 70 हजार से 1 लाख के बीच शरणार्थियों को बेच दिए. वे पाकिस्तान से आए लोग हैं. न तो ठीक से हिंदी आती है, नअंग्रेजी. पता ही नहीं चला कि वे गाढ़ी कमाई के पैसे नाली में बहा रहे हैं. अथॉरिटी ने बुलडोजर चलवा दिया.
पास में एक और इलाका है- गंगाणा, वहां 40 परिवार रहते थे. वो तो जमीन भी JDA की नहीं थी, तब भी उसी रोज वहां भी बुलडोजर चला. घर, मंदिर सब तोड़कर चले गए.
मैं उन औरतों का जिक्र करती हूं जो दुधमुंहे बच्चों को छोड़कर आईं. पता लगता है कि पाकिस्तान से हिंदुस्तान के लिए मिलने वाला वीजा 3 महीने के लिए वैध होता है, या कई बार इससे भी कम. मैं पूछती हूं- तब मांओं को अपने बच्चे छोड़कर आने की क्या जरूरत थी. थोड़ा इंतजार कर लेतीं!
तुरंत जवाब मिलता है- वहां कानून नहीं चलता. रातोरात कुछ भी हो जाएगा, फिर वीजा किसी काम का नहीं रहेगा. अक्सर ये होता है कि अगर 10 लोगों का परिवार है तो इस्लामाबाद में बैठे हमारे अधिकारी 7 को तो वीजा देंगे लेकिन 3 को अटका देंगे. ये अटके हुए लोग एक तरह का 'ट्रैप' होते हैं ताकि बाकियों का भी जाना टल जाए या जो जाएं वो इनके बहाने वापस आने को मजबूर हों, दोबारा कभी न जाने के लिए.
(नोट: पीड़ित परिवारों के नाम और चेहरा छिपाए गए हैं.)
जोधपुर में उजड़े शरणार्थी हिंदू कैंप से अगली कहानी पढ़िए, कल.