हिंदुस्तानी टाइगर को चीनी ड्रैगन से खतरा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि टाइगर के लिए ड्रैगन की भूख बढ़ती जा रही है. चीन से टाइगर के जिस्म की बढ़ती मांग हिंदुस्तान में बची बाघों की 1400 की आबादी पर सबसे बड़ा खतरा बन गया है, लेकिन चीन भारत के तमाम आग्रहों के बाद भी बाघों के अवैध व्यापार पर रोक लगाने को तैयार नहीं है.
साजिश में जुटा है चीन
एक तरफ दुनिया इस शानदार औऱ ताकतवर जानवर को खत्म होने से बचाने में जुटी है और दूसरी तरफ ड्रैगन है जो लगातार इस साजिश में जुटा है कि कैसे दुनिया से बाघों का सफाया हो जाए. चीन के रईस अब टाइगर की शराब पीने लगे हैं. वे टाइगर का कबाब भी खाने लगे हैं. टाइगर की खाल अपने ड्राइंग रूम में वो सजा रहे हैं. टाइगर की हड्डियों को गला कर वो मर्दानगी बढ़ाने वाली दवाएं बना रहे हैं.
बाघों के जिस्म की बाजार में मांग
चीनी बाजार में बाघों के जिस्म की मांग लगातार बढ़ती जा रही है औऱ जैसे-जैसे ड्रैगन अमीर हो रहा है, हिंदुस्तान के बाघों पर खतरा बढ़ता जा रहा है. चीन में बाघों के व्यापारी हिंदुस्तान के अवैध शिकारियों से बाघों का जिस्म मुंहमांगी कीमत पर खरीद लेते हैं. यही वजह है कि चीन हिंदुस्तान के बाघों का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है. सबसे खतरनाक बात ये है कि बाघों के संरक्षण में जुटी दुनिया की तमाम संस्थाओं की कोशिशों के बावजूद चीन बाघों के अवैध व्यापार पर रोक लगाने को तैयार नहीं है.
चीन की मंशा पर सवाल
हाल ही में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने चीन के पर्यावरण मंत्री से इस बारे में बात की लेकिन चीनी मंत्री के रुख से ये साफ हो गया कि उसकी मंशा क्या है. भारत ने चीन से बाघों के व्यापार को रोकने और संरक्षण के नाम पर चलने वाले ऐसे फार्म पर रोक लगाने की मांग की थी जो असल में बाघों के जिस्म का अवैध कारोबार करते हैं, लेकिन चीन के पर्यावरण मंत्री ने बाघों के व्यापार को शहतूश के अवैध व्यापार से जोड़ दिया. चीन ने मांग की पहले भारत शहतूश की खाल के व्यापार पर रोक लगाए.
चीन ने उठाया शहतूश का मसला
हालांकि हकीकत ये है कि भारत ने पहले ही शहतूश की खाल के व्यापार को अवैध घोषित कर रखा है, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद चीन बाघों के संरक्षण को लेकर संजीदा नहीं है. फिर तिब्बत में पाए जाने वाले शहतूश और बाघों की तुलना इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि बाघों की आबादी अब पूरी दुनिया में सिर्फ 4 हजार के आसपास बची है और पूरी दुनिया इस शानदार जानवर के संरक्षण के लिए एकजुट हो चुकी है. बाघ भारत का राष्ट्रीय जानवर भी है, जबकि शहतूश की आबादी सिर्फ तिब्बत मे ही 75 हजार से ऊपर है. जाहिर है कि टाइगर की तुलना शहतूश से करके चीन बाघों के अवैध व्यापार को रोकने की अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है.
दुनियाभर में बाघ को लेकर चिंता
जब पूरी दुनिया बाघों की घटती तादाद को लेकर चिंतित है, और इस प्रजाति को बचाने के लिए तमाम कोशिशें की जा रही हैं. चीन में बाघों पर अत्याचार की एक वजह चीन के ज्योतिष से जुड़ी हुई है और इसी वजह से आने वाले साल के दौरान, चीन में बाघों पर होने वाला ज़ुल्म और बढ़ने का पूरा अंदेशा है.
चीनी ज्योतिष में जानवरों का महत्व
चीन की कुंडली में ज्योतिष का पूरा हिसाब-किताब जानवरों के नाम से जुड़ा है, जैसे हमारे देश में मेष, वृष, मिथुन कर्क वगैरह राशियां हैं, उसी तरह चीन में चूहा, बैल, बाघ, ख़रगोश और ड्रैगन जैसे 12 जानवरों को राशियों का प्रतीक चिन्ह माना जाता है. चीन में हर साल किसी ना किसी जानवर के नाम पर होता है. चीनी मान्यता के मुताबिक जिस जानवर के नाम पर साल होता है, उस जानवर का किसी ना किसी तौर पर इस्तेमाल करना शुभ होता है. लिहाज़ा लोग उस जानवर के अंगों का इस्तेमाल करते हैं. कोई अपने घर में चमड़ी रखता है, कोई दांत या हड्डियां, तो कोई जानवर का नाख़ून ही अपने पास रख कर, सुख-समृद्धि की कामना करता है.
2010 होगा टाइगर ईयर
मौजूदा साल, यानी 2009 चीन में चूहों का साल है. चूंकि चूहे आसानी से हर जगह उपलब्ध हैं और उनकी कोई कमी नहीं है, ना ही उनकी प्रजाति के ख़त्म हो जाने का डर है, लेकिन भारत की चिंता का विषय है आने वाला साल. चीन में आने वाला साल होगा टाइगर ईयर. यानी साल 2010 में चीन के लोग अपनी किस्मत बाघ से जोड़ेंगे. पूरे साल के दौरान वहां के लोग बाघ के अंगों को अपने घर में, दफ़्तर में, या फ़िर अपनी जेब में रखकर ख़ुद को भाग्यशाली महसूस करेंगे. {mospagebreak}इतनी बड़ी आबादी वाले मुल्क में अगर हर आदमी को बाघ के अंगों को साथ रखना चाहेगा तो ज़ाहिर है ज़्यादा बाघों की ज़रूरत पड़ेगी. ज़्यादा बाघ मारे जाएंगे और इसका असर भारत पर भी पड़ेगा, क्योंकि भारत में सक्रिय बाघ के शिकारियों का नेटवर्क चीन तक जुड़ा हुआ है.
बढ़ सकती है चीन की आक्रामकता
बाघ के शिकार को लेकर तो भारत की चिंता है ही, चिंता इस बात की भी है कि क्या टाइगर इयर में चीन पहले से ज़्यादा आक्रामक हो जाएगा. दरअसल, चीन में मान्यता ये भी है कि जिस जानवर के नाम पर साल होता है, उसके स्वभाव का असर भी लोगों पर पड़ता है. चूंकि चीन में आने वाला साल बाघ के नाम पर होगा तो तो ये सवाल जायज़ है कि कहीं चीन इस साल बाघ जैसा ही हमलावर रुख तो नहीं अपनाएगा?
चीन कर रहा दिखावा
चीन दिखाने के लिए तो यही कहता है कि वो टाइगर फार्मिंग करके बाघों की घटती तादाद को बढ़ा रहा है, लेकिन हक़ीकत इससे बिलकुल अलग है. यहां बाघों को पैदा ही इसलिए किया जाता है ताकि उन्हें बेमौत मारा जा सके. उनके एक-एक अंग का सौदा किया जा सके. चीन में देसी दवाइयां बनाने में बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है. कहा जाता है कि इन तमाम कामों के लिए चीन बाघ की फार्मिंग करता है. भारत जैसे मुल्कों से शिकारियों का नेटवर्क भी, चीन को बाघों की सप्लाई करता है.
बाघों को बचाने के लिए समझौता
बाघों की प्रजाति को बचाने के लिए 1981 में एक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ था. समझौते के बाद पूरी दुनिया में शिकारियों पर कड़ी निगरानी रखी गई, उनकी धर-पकड़ हुई और नतीजा ये हुआ कि बाघ के शिकार में काफ़ी हद तक कमी आई. इस समझौते पर चीन ने भी दस्तख़त किए थे, लेकिन जब समझौते की शर्तों को मानने में दिक्कत हुई तो अगले ही साल यानी 1982 में चीन ने इस तरह ही टाइगर फार्मिंग शुरू कर दी.