संयुक्त सचिव स्तर पर लेटरल एंट्री के लिए केंद्र की ओर से उठाए कदम ने बेशक नौकरशाही के अंदर और बाहर कई लोगों को बेचैन किया है. लेकिन पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) ने बुधवार को कहा कि लेटरल नियुक्तियों से नौकरशाहों के मनोबल पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा.
पीएमओ में राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में लिखित जवाब में ये जानकारी दी. केंद्र ने लोकसभा को बताया कि ये लेटरल एंट्री का कोई पहला मामला नहीं है. जितेंद्र सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉ मनमोहन सिंह के नाम का लेटरल नियुक्ति के तौर पर हवाला दिया.
वी पी सिंह के प्रधानमंत्री रहते डॉ मनमोहन सिंह को आर्थिक मामलों पर प्रधानमंत्री का सलाहकार नियुक्त किया गया था. मार्च 1991 में डॉ सिंह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के चेयरमैन बने.
पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने टीएमसी सांसदों- सजदा अहमद और प्रसून बनर्जी के नौकरशाही में सुधारों को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में ये जानकारी दी. डॉ मनमोहन सिंह के अलावा कुछ और व्यक्तियों को भी पहले लेटरल एंट्री के जरिए नियुक्त किया गया. ये वक्त-वक्त पर खास जरूरत के आधार पर किया गया.
पीएमओ की ओर से गिनाए गए ऐसे नामों में योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ मोंटेक सिंह अहलूवालिया, वित्त मंत्रालय के पूर्व सलाहकार विजय केलकर, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान, पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन, पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद विरमानी शामिल हैं.
मोदी सरकार के दौरान की गई कुछ लेटरल नियुक्तियों का भी पीएमओ की लिस्ट में उल्लेख किया गया. ये नाम हैं- हाल में नीति आयोग के उपाध्यक्ष का पद छोड़ने वाले अरविंद पनगढ़िया, आयुष मंत्रालय में विशेष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा, पूर्व आईएएस अधिकारी परमेश्वर अय्यर जिन्हें स्वच्छ भारत मिशन का प्रमुख बनाया गया, ऊर्जा मंत्रालय में सचिव के तौर पर सेवा दे चुके राम विनय शाही.
लेटरल एंट्री के कदम का बचाव करते हुए मंत्रालय ने प्रधानमंत्री के हवाले से कहा कि नीति आयोग ने 2017-18 से 2019-20 के अपने तीन साल के एजेंडा में ये हाईलाइट किया है कि विशेषज्ञों को सिस्टम में ‘फिक्सड टर्म कॉन्ट्रेक्ट’ के आधार पर लेटरल एंट्री के जरिए जोड़ा जाए.
सेक्टरोल ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज (SGoS) की ओर से फरवरी 2017 में सौंपी गई रिपोर्ट में इंगित किया गया कि वर्ष 1995-2002 के दौरान संयुक्त सचिव/निदेशक/उप सचिव के स्तर पर अधिकारियों की कमी पाई गई. इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने दस संयुक्त सचिवों की लेटरल नियुक्ति के लिए कदम उठाया. इससे दो उद्देश्यों की पूर्ति होती है, पहला सिस्टम में ताजा टेलेंट का समावेश और मानव संसाधनों की उपलब्धता को बढ़ाना.
सरकार ने ये भी साफ किया है कि ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए नौकरशाही में सुधार के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं.
प्रोविजनल नियुक्तियों में जब तक पुलिस की ओर से चरित्र का वेरीफिकेशन लंबित रहता है तब तक आवेदकों को स्वयं घोषणापत्र और अटैस्टेशन फॉर्म भर कर देना होगा.
सरकार के मुताबिक इस कवायद का मकसद सीनियर लेवल पर पोस्टिंग के सिस्टम को स्ट्रीमलाइन करना, निष्ठा और योग्यता को वरीयता देना, नौकरशाहों के कामकाज से जुड़े अप्रैजल सिस्टम को मजबूत करना, विजिलेंस सिस्टम को मजबूत करना, आल इंडिया सर्विसेज (अनुशासनात्मक और अपील) रूल्स को संशोधित करना आदि है.
इसके अलावा ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारियों के खिलाफ जांच की स्थिति में जांच पूरी होने के लिए समयसीमा बांधना, इन अधिकारियों के मनमाने निलंबन को रोकने के लिए सेफगार्ड्स लाना, निचले स्तर की पोस्ट के लिए इंटरव्यू खत्म करना, अयोग्य और प्रदर्शन ना करने वालों का अनिवार्य रिटायरमेंट जैसे सुधार भी शामिल हैं.
केंद्र ने ये भी साफ किया कि सरकार असिस्टेंट/ एसोसिएट/प्रोफेसर लेवल पर एजुकेशनल कैडर भी संचालित करेगी. ये उन सभी के लिए खुला होगा जो योग्यता के मापदंड को पूरा करेंगे. ये मायने नहीं रखेगा कि कि वो मौजूदा समय में शिक्षण संस्थान में कार्यरत है या नहीं. प्रोफेसरों की कमी को दूर करने में इससे मदद मिलेगी.