गुड मार्निंग लेडीज ऐंड जेंटलमेन,
आप सबका यहां हार्दिक स्वागत है. मुंबई में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के एक और संस्करण के साथ वापस आने पर बहुत अच्छा लग रहा है. इस साल मार्च में हम अपना नेशनल कॉन्क्लेव दिल्ली ले गए थे, क्योंकि यह केंद्र में चुनाव, राजनीति और सत्ता समीकरण के द्वारा परिभाषित करने वाला साल था.
लेकिन मुंबई फिर हमें खींच लाया है. आपका शहर उद्यम और गतिशीलता, लचीलेपन और नित नई खोज का शहर है, ऐसे गुण जिनकी देश को हर क्षेत्र में जरूरत है. इस साल अर्थव्यवस्था को लेकर बातचीत हावी रही, इसलिए हमारे लिए यह बिल्कुल उपयुक्त था कि कॉन्क्लेव का यह संस्करण देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में आयोजित किया जाए.
हमारे देश और कॉन्क्लेव में जो साझा चर्चा का विषय है, वह है बदलाव का. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना चुनाव अभियान एक नए भारत के निर्माण के वादे के साथ चलाया था. अपनी नई पारी की शुरुआत में उन्होंने यह वादा किया था कि अगले 5 साल में भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाएंगे.
लेकिन इसके तुरंत बाद ही पूरे देश में चिंता की आवाजें उठने लगीं. भारत का जीडीपी घटकर 5 फीसदी हो गया. मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ घटकर 0.6 फीसदी पर आ गया है. बेरोजगारी 45 साल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एमएसएमई पर तगड़ी चोट पड़ी है. ऑटो और एफएमसीजी सेक्टर की बिक्री में काफी गिरावट आई है. रियल एस्टेट संकट में है और कर्ज प्रवाह सुस्त पड़ गया है. उपभोक्ता और कॉरपोरेट जगत का सेंटिमेंट डाउन है. इसके साथ ही भारत को कई वैश्विक थपेड़ों का भी सामना करना पड़ रहा है.
आप अगले दो दिन में इन सब विषयों पर काफी चर्चा सुनेंगे...
इन सबकी क्या वजह है? और इसका उपाय क्या है? यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि: यह आर्थिक सुस्ती हमारे लिए एक अवसर है कि इस बारे में गहराई से आत्मनिरीक्षण करें और ठोस उपाय तलाशें.
मेरे भाषण के बाद आपको रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री शक्तिकांत दास को सुनने का अवसर मिलेगा जिनकी अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण भूमिका है.
संकट वास्तविक बदलाव का मंच होता है. आखिरकार, जैसा कहा जाता है, किसी को एक अच्छे संकट को कभी भी गंवाना नहीं चाहिए. लेकिन यह तब होता है जब लोग बदलाव करने की इच्छा रखते हैं.
मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि भारत गरीब लोगों वाला एक समृद्ध देश है. हम प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से काफी समृद्ध हैं और हम काफी स्मार्ट, रचनात्मक, कठोर परिश्रम करने वाले और महत्वाकांक्षी लोगों का देश हैं. पूरी दुनिया में भारतीय हर क्षेत्र में श्रेष्ठता दिखा रहे हैं. सही माहौल मिले तो हम कमाल करते हैं.
तो आखिर ऐसा क्यों है कि उसी तरह की शिक्षा और पृष्ठभूमि वाले लोग अपने देश में खिलने की जगह कुम्हला जाते हैं? हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए.
हम इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि हमारे देश में एक ऐसी बड़ी युवा जनसंख्या है जिसकी औसत आयु 29 साल है और अगले साल तक हम इस दुनिया के सबसे युवा देश होंगे.
हमें इस जबरदस्त ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए क्या करना होगा जिसका पूरी तरह से उपयोग नहीं हो पा रहा? ऐसी ऊर्जा जो लोगों के लिए और पूरे देश के लिए संपदा का सृजन कर सके. हमारे वातावरण में ऐसा क्या है जो हमें अपनी पूर्ण क्षमता को हासिल करने से रोकता है?
इस पर मेरा जवाब बहुत साधारण है. यह है हमारी सरकार और राजनीतिक वर्ग. और यह किसी एक पार्टी या सत्ता की बात नहीं है. यह एक ऐसी समस्या है जो दशकों से चल रही है.
इसका मतलब यह नहीं है कि मेरा संसदीय लोकतंत्र में विश्वास नहीं है. बात इससे बिल्कुल परे है. मेरा तो मानना है कि अपनी सभी खामियों के बावजूद यही एक रास्ता है जिससे भारत में शासन किया जा सकता है. यही एक रास्ता है, जिससे हमारे विविधता वाले देश की क्षेत्रीय और वर्गीय आकांक्षाओं की पूर्ति हो सकती है.
हालांकि, आजादी के बाद पिछले 7 दशक में, कुछ समय को छोड़कर, हमारे यहां जबरदस्त लोकलुभावनवाद, खुद को फायदा पहुंचाने वाले तुष्टीकरण, अतार्किक आर्थिक नीतियों और खराब नेतृत्व का दौर रहा है. इसका नतीजा यह हुआ है कि हमारी अर्थव्यवस्था तमाम अंतर्विरोधों से ग्रसित रही है और निहित स्वार्थों की वजह से सताई गई है. हमारे यहां ऐसा समाज भी रहा है जो अक्सर जाति, संप्रदाय या मजहब के नाम पर आपस में ही लड़ता रहा है. इन सबको बदलना एक दुरूह कार्य है.
यह इतिहास का ऐसा सौभाग्यशाली मोड़ है, जब हमारे पास अब सही जगह पर सही व्यक्ति है. वह ऐसी चीजें कर सकता है जो हम चाहते हैं. वह अपनी पार्टी और सरकार के शिखर पर है. हम यह जानते हैं कि उसके पास साहसिक निर्णय लेने की क्षमता है. वह उन दिशाओं में जाने की इच्छा रहता है जिधर अन्य राजनीतिज्ञ कदम बढ़ाने से डरते हैं. आप देखिए कि स्वच्छ भारत अभियान से कितना कुछ हासिल हुआ है. भारत इस साल के अंत तक खुद को खुले में शौच से मुक्त घोषित कर सकता है.
वह एक दृष्टि वाला नेता है. वह कुछ कर दिखाने वाला है. वह संवाद का गुरु है. वह भारत को बदलना चाहता है, आप इसे पसंद करें या नहीं. मैं जिस व्यक्ति की बात कर रहा हूं वह और कोई नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. पिछले 44 साल की पत्रकारिता में मैंने उनके जैसा नेता नहीं देखा.
इस मौके पर मैं शिक्षाविद प्रताप भानु मेहता की एक बात क्वोट करना चाहूंगा, जो मोदी के प्रशंसक नहीं हैं, लेकिन वह भी मोदी के प्रभाव को स्वीकार करते हैं. उन्होंने लिखा है: ‘उनके कट्टर आलोचकों को भी यह बात स्वीकार करनी होगी कि उन्होंने अपने को एक अपरिहार्य हस्ती बना लिया है, ऐसा व्यक्ति जिसने हमारी चेतना में इस तरह से जगह बनाई है कि उनकी आलोचना से भी उनका महत्व और रेखांकित होता है और उनकी परिकल्पना और मजबूत होती है. उनकी जीत इसमें नहीं है कि वह क्या करते हैं, बल्कि इसमें है कि आज हम जो कुछ भी कर रहे हैं वह उसके केंद्रबिंदु बन गए हैं.’
इस तरह के कद से हम कह सकते हैं कि इस बात की कोई सीमा नहीं है कि प्रधानमंत्री क्या कुछ कर सकते हैं.
मुझे यह देखकर काफी खुशी होती है कि प्रधानमंत्री ने भी यह बात स्वीकार की है कि समस्या सरकार ही है. इस स्वतंत्रता दिवस पर उन्होंने कहा था: ‘मैं बार-बार अपने अफसरों से यह कहता रहा हूं कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी क्या हम लालफीताशाही को कम करने और आम आदमी के दैनिक जीवन में सरकार की दखलंदाजी को कम कर पाने के लिए कुछ नहीं कर सकते?’
अब उन्हें इस दिशा में कदम बढ़ाना है. मैं विनम्रता से इस बारे में दो सुझाव देना चाहूंगा कि इसे किस तरह से किया जा सकता है.
पहला, कोई भी आर्थिक नीति वैचारिक ढांचे के भीतर होनी चाहिए. जब आप अपनी मूल मान्यताओं के लिए प्रतिबद्धता रखते हैं तो बाकी चीजें अपने आप सही हो जाती हैं. इसके अलावा नीतियां, सुसंगत होनी चाहिए, कामचलाऊ नहीं.
यह मूल मान्यता एक शब्द में बाजार हो सकती है.
आप सोचेंगे कि मेरा इस शब्द से क्या आशय है? मेरा आशय यह है कि बाजार की ताकतों को आर्थिक मसलों को हल करने का अवसर दिया जाए. मेरा मानना है कि यदि आप सरकार को जनता के रास्ते से दूर रखना चाहते हैं तो आपको बाजार पर भरोसा करना होगा. इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकारी नीतियां बनानी होंगी.
प्रतिस्पर्धा से कीमतें कम हों, न कि सरकारी हुक्म से. उपभोक्ता को यह तय करने दें कि वह किस कीमत पर कोई चीज खरीदना चाहता है. कई बार ऐसा लग सकता है कि बाजार क्रूर है, लेकिन नई इंडस्ट्री, नए उत्पाद और इनोवशन इसी तरह से हासिल किए जा सकते हैं. इसी तरह से आप एक जीवंत अर्थव्यवस्था हासिल कर सकते हैं. कंज्यूमर किंग है, सरकार नहीं.
सरकार का काम है मानक तय करना, गलत आचरण और एकाधिकार को रोकना. उसे यही काम करना चाहिए और किनारे रहना चाहिए. वह प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए, न कि उस पर अंकुश लगाने वाली. लेकिन सरकार यह भरोसा नहीं करती कि बाजार अपना काम करेगा. सच तो यह है कि बीजेपी दक्षिण की बात करती है और कदम वाम की तरफ बढ़ाती है.
इसके अलावा, स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में पीएम ने एक काफी महत्वपूर्ण बात कही. उन्होंने कहा, ‘आज समय की जरूरत है कि हम अपने देश के वेल्थ क्रिएटर्स को स्वीकार करें और उन्हें प्रोत्साहित करें. उन्हें ज्यादा सम्मान देना होगा. यदि संपदा का सृजन नहीं होगा, तो संपदा का वितरण भी नहीं किया जा सकता.’
इसलिए संपदा को भारत में गंदा शब्द नहीं मानना चाहिए, उसे संदेह और स्वाभाविक अविश्वास के साथ नहीं देखा जाना चाहिए. टैक्स का आतंक, छोटी गलती के लिए जेल में डाल देना, सुपर टैक्स, बिना व्यक्ति को चेतावनी दिए लुकआउट नोटिस जारी कर देना...इन कदमों की ऐसे समाज में जगह नहीं होनी चाहिए जो उद्यमिता का सम्मान करता है.
मानसिकता में यह बदलाव यदि सरकारी सिस्टम में निचले स्तर तक समाहित हो जाए, तो इससे निश्चित रूप से उस एनिमल स्पिरिट (उद्यमियों में) को बढ़ावा मिलेगा जिसको सरकार फिर से बढ़ाने के लिए बेकरार है.
एक प्रख्यात बैंकर ने इसे मुझे इस तरह से समझाया था: आपके पास यदि दागदार फटी शर्ट है तो आप उसका रफू करेंगे, धुलाई करेंगे, दाग मिटाएंगे न कि शर्ट फेंक देंगे. व्यवस्था की सफाई में सरकार को इस बात को ध्यान में रखना होगा. हमें अपनी शर्ट नहीं खोनी है.
जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, मैं भारत के अमीर लोगों से भी आत्मनिरीक्षण का आह्वान करता हूं. हमारे यहां भ्रष्टाचार, क्रोनी कैपिटलिज्म, एनपीए और विलफुल डिफाल्टर्स के बारे में खबरों की भरमार रही है. ज्यादा आजादी ज्यादा जवाबदेही भी लेकर आती है.
यदि कदाचार के द्वारा बाजार में छेड़छाड़ होगी तो हम मुक्त बाजार हासिल करने का आह्वान नहीं कर सकते. मैं सभी से यह बात याद रखने का आग्रह करता हूं कि भारत के लिए यह आंकड़ा वास्तव में संभवत: सबसे शर्मनाक है: देश के शीर्ष 1 फीसदी लोगों के पास कुल संपदा का 50 फीसदी हिस्सा है.
संपदा का इस तरह से एक जगह केंद्रित होना न केवल अश्लील है, बल्कि यह अदूरदर्शी बात भी है, इससे केवल ठहरी और अस्वस्थ अर्थव्यवस्था का निर्माण होता है. ऐसा नहीं हो सकता कि हम भारत में डेमोग्राफिक डिविडेंड की बात करें लेकिन उन्हें लाभांश देने से इनकार करें.
मेरा दूसरा सुझाव यह है कि आप यदि सरकारी दखल कम से कम करना चाहते हैं तो आपको इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी, मतलब केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्रालयों की संख्या कम करें.
जैसा कि हिंदी में कहावत है, ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी’.
इस समय केंद्र में 51 मंत्रालय, 53 विभाग और 83 आयोग हैं. इसकी तुलना में ब्रिटेन में सिर्फ 21 मंत्रालय और अमेरिका में 15 कार्यकारी विभाग हैं. तो आप देख सकते हैं कि हमारे यहां कितने ज्यादा मंत्रालय हैं.
अब जब लाइसेंस राज की जगह सुधार ले रहे हैं, ज्यादातर मंत्रालयों के अस्तित्व में रहने की उपयोगिता खत्म हो गई है. कई मंत्रालय तो ऐसी इकाइयों को देखते हैं जो स्वायत्त होने चाहिए, जैसे सेल, एयर इंडिया, कोल इंडिया, दूरदर्शन, ओएनजीसी आदि और वास्तव में इनकी जरूरत नहीं है.
इसके अलावा अब हम ऐसे युग में पहुंच चुके हैं, जिसमें कई इंडस्ट्रीज में रेगुलेटर कायम हो चुके हैं. हालांकि, इससे काफी कुछ नहीं बदला है, क्योंकि ज्यादातर के मुखिया पूर्व नौकरशाह होते हैं, जो उसी तरह की मानसिकता के होते हैं- नियंत्रित करो, न कि सक्षम.
करीब एक दशक पहले इंडिया टुडे ने इस मसले पर विचार के लिए प्रख्यात अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय की सेवाएं ली थीं.
वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हमें केवल 12 मंत्रालय चाहिए-इनमें पीएमओ, विदेश मामले, ग्रामीण, गृह, ऊर्जा, वित्त, सामाजिक न्याय, वाणिज्य एवं उद्योग और पर्यावरण मंत्रालय हो सकते हैं.
मुझे तो ऐसा लगता है कि कई मंत्रालय सिर्फ इसलिए अस्तित्व में बने हुए हैं, क्योंकि चुनाव जीतने वाले वफादार नेताओं को इन्हें पुरस्कार के रूप में सौंपना होता है. अब प्रधानमंत्री का अपनी पार्टी पर जिस तरह से प्रभाव है, उसे देखते हुए मुझे लगता है कि उनके लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं है.
लेकिन सच कहूं तो इस सरकार ने ठोस प्रयास किए हैं, टेक्नोलॉजी और गहन निगरानी के द्वारा, यह सुनिश्चित करके कि कल्याणकारी योजनाओं का फायदा सही लोगों तक कम से कम लीकेज के साथ पहुंचे.
हालांकि, एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की संख्या में करीब 5 लाख की बढ़ोतरी हुई थी. वे सही जगह पर पहुंचने वाले सही लोग हो सकते हैं, लेकिन बाकियो का क्या होगा?
न्यूनतम सरकार का मतलब है कम से कम नौकरशाह.
इसी से सार्वजनिक उद्यमों की भूमिका भी जुड़ी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर यह कहते हैं: ‘सरकार कारोबार करने के लिए नहीं होती.’
लेकिन दुखद यह है कि सरकार काफी कुछ कारोबार करती है. वैसे मोदी सरकार ने नेहरू युग की कई धारणाओं को खत्म किया है. यहां तक कि नेहरू जैकेट की जगह मोदी कुर्ता आ चुका है.
हालांकि, एक चीज को उन्होंने न केवल जिंदा रखा है, बल्कि फलने-फूलने दे रहे हैं जिसे नेहरू ‘आधुनिक भारत का मंदिर’ कहते थे. वे हैं हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (PSU). अब इनमें से कई तो बर्बादी के मंदिर बन गए हैं.
देश में फिलहाल 257 केंद्रीय पीएसयू चल रहे हैं जिनमें से 71 घाटे में हैं. मार्च, 2018 तक इनमें कुल मिलाकर सालाना घाटा 30,000 करोड़ रुपये का हो चुका था. इस राशि से देश में 12 करोड़ बच्चों को तीन साल तक मिड-डे मील दिया जा सकता है.
इससे भी बदतर हालात राज्य पीएसयू के हैं. राज्य सरकारों के 1,308 सार्वजनिक उद्यमों में से केवल 989 चालू हैं और उनमें सालाना 1 लाख करोड़ रुपये का घाटा होता है, यह भारत सरकार द्वारा शिक्षा पर खर्च होने वाली कुल राशि से थोड़ा ज्यादा ही है.
पीएसयू बैंकों की भी इसी तरह की पतित कहानी है. पिछले 2 साल में सरकार ने 2.7 लाख करोड़ रुपये लगाकर उनमें नए सिरे से पूंजी डाली है. यह राशि इतनी ज्यादा है कि इससे 26 करोड़ मनरेगा श्रमिकों को चार साल तक मजदूरी दी जा सकती है.
किसी भी बाजार अर्थव्यवस्था में पीएसयू और पीएसबी में इस तरह के घाटे को उन शेयरधारकों को वहन करना चाहिए जिन्होंने उसमें निवेश किया है. लेकिन हमारे देश में इस घाटे की भरपाई टैक्सपेयर को करनी होती है, जबकि उसका इन कंपनियों से जुड़े निर्णय में कोई दखल नहीं होता. आपका और हमारा पैसा बैंकर्स और उनके साथियों की गलतियों की भरपाई में जा रहा है.
यह देश की संपदा की जबरदस्त बर्बादी है. यह पैसा जरूरतमंद लोगों के कल्याण और विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के निर्माण में बेहतर इस्तेमाल हो सकता था.
सरकार को सभी स्तर पर कारोबार करने के काम से बाहर निकल जाना चाहिए. सरकार को यह बात समझनी होगी कि कारोबार पर उसके लगातार नियंत्रण से कारोबारियों को नुकसान हो रहा है. साफ कहूं तो मेरा विनम्रता से यह मानना है सरकार यदि बाजार में भरोसा नहीं करती और नौकरशाही की भूमिका को कम नहीं करती तो भारत में खास कुछ बदलने वाला नहीं है.
प्रधानमंत्री को अपने आर्थिक निर्णयों में भी उसी तरह की हिम्मत और दूरदर्शिता दिखानी होगी जैसी कि उन्होंने राजनीति में दिखाई है.
अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण हाल में उठाया गया ऐसा ही एक साहसिक कदम है जिससे जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म हो गया है. इसने कश्मीर के बारे में होने वाली पूरी चर्चा को ही बदल दिया है. अब हम पीओके पर बात करने की चर्चा कर रहे हैं. जहां तक पाकिस्तान की बात है, उसके लिए कश्मीर का अध्याय वास्तव में खत्म हो चुका है.
हमारा पड़ोसी अपने दावे के बारे में समर्थन जुटाने के लिए दुनिया के कोने-कोने में दौड़ लगा रहा है, लेकिन उसका प्रयास निरर्थक साबित हुआ है. यह प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत और उनकी कुशल वैश्विक कूटनीति की विजय है. यहां तक कि भारत की कार्रवाई पर उन्हें बड़े इस्लामी देशों का भी समर्थन हासिल हुआ है.
घरेलू स्तर पर हमारे लिए सवाल यह है कि कश्मीर में हालात सामान्य कब होंगे? प्रधानमंत्री की दृढ़ निर्णय क्षमता की लगभग पूरी दुनिया ने तारीफ की है. लेकिन लंबे समय तक जारी बंदिशें लोकतंत्र के हित में नहीं हैं.
इस निर्णय की असली परीक्षा इस बात में है कि कितनी तेजी से वहां नागरिक आजादी और संचार की बहाली होती है और कितनी तेजी से सरकार कश्मीरियों को विकास के द्वारा बेहतर जीवन देने के अपने वादे को पूरा कर पाती है. मुझे आशंका है कि यह एक लंबा और कठिन रास्ता है.
आप आगे कश्मीर पर डॉ. जितेंद्र सिंह (प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री) और इल्तिजा मुफ्ती (पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की बेटी) के विचार सुनेंगे.
इस कार्यक्रम में कई और जबरदस्त सत्र होंगे जो आपको जोड़ेंगे, जानकारी बढ़ाएंगे और आपका मनोरंजन करेंगे. इनमें इमिग्रेशन से लेकर सेक्स रोबोट्स, अत्याधुनिक दवाएं, जल संकट तक के विषय शामिल होंगे और निश्चित रूप से महाराष्ट्र के चुनावों पर भी बात होगी. कल भी आप कई दिग्गजों को सुनेंगे जिनमें राज्य के युवा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस शामिल होंगे, जो पिछले 5 साल से देश का सबसे औद्योगीकृत राज्य चला रहे हैं. इसलिए यह देश के सबसे महत्वपूर्ण मसले-हमारे राजनीतिक नेतृत्व की गुणवत्ता, पर चर्चा करने का उपयुक्त समय है.
किसी भी लोकतंत्र की जीवनरेखा उसकी मजबूत राजनीति होती है, और मैं पूरे दमखम के साथ यह बात कहना चाहूंगा कि भारत अपने नेतृत्व की गुणवत्ता की वजह से ही नीचे जा रहा है. हर तरफ, ऐसे नेता हैं जो कम जानकार, कम मुखर हैं और जिनका लोगों की आकांक्षाओं से कोई मतलब नहीं है.
हमारी नई लोकसभा में बड़ी संख्या में आपराधिक रेकॉर्ड वाले सांसद हैं. भ्रष्टाचार का बोलबाला है. दलबदल तो सर्दी-खांसी जैसा आम हो गया है. वास्तव में अब तो ऐसा लगता है कि देश में कोई विपक्ष ही नहीं बचा है. अब जब एक मजबूत सरकार सत्ता में है, भारत को एक ऐसा विपक्ष चाहिए तो भरोसेमंद, स्पष्ट, करिश्माई, मुस्तैद और ऊर्जावान हो.
भारत का तार्किक समाज और सत्ता में मौजूद राजनीतिक नेतृत्व गर्व करने लायक है और सत्ता से बाहर भी असहमति की जगह बनाए रखनी चाहिए. एक मजबूत सरकार-चाहे उसकी कोई भी परिभाषा हो- ऐसी होती है जो तथ्य आधारित आलोचना सुनने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास रखती हो.
लोकतंत्र हमारा सबसे बड़ा खजाना है. हमें इसे पालना-पोषना चाहिए, इसे संरक्षित करना चाहिए और बढ़ावा देना चाहिए. और यह सब करने का एक तरीका यह है कि हम प्रेस की आजादी को सुनिश्चित करें. संदेशवाहक को ही नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह से ठीक नहीं है. आज की दुनिया में संदेश बने रहते हैं और इससे संभवत: आप अपना ही नुकसान करते हैं. निश्चित रूप से जीवन में हर तरफ सड़े सेब (गलत लोग) होते हैं, लेकिन आप उसके लिए पूरे पेड़ की ही आलोचना नहीं कर सकते. मैं आपसे आग्रह करता हूं कि जहां तक आप कर सकते हैं एक स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें.
एक अच्छी तरह से जानकार देश एक स्वस्थ, सभ्य समाज का निर्माण करता है.
यह कार्रवाई, आत्मनिरीक्षण और बदलाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्षेत्र है. एक देश उतना ही अच्छा होता है, जितना उसके नेता.
मुझे उम्मीद है कि अगले दो दिनों में यहां होने वाली चर्चा बहुत से लोगों को नए विचारों को अपनाने और कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करेगी.
एक बार फिर, आप सबका हार्दिक स्वागत है और यहां उपस्थित होने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.